सोमवार, जुलाई 16, 2012

Quick Management Lesson (त्वरित प्रबंधन सबक)



एक दिन एक कुत्ता जंगल मैं रास्ता खो गया . तभी उसने देखा एक शेर उसकी तरफ  आ रहा है.कुत्ते की साँस रूक  गयी. "आज तो काम तमाम  मेरा!" उसने सोचा. फिर  उसने सामने  कुच्छ  सूखी  हड्डियाँ पड़ी देखी.वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हड्डी  को चूसने लगा और ज़ोर ज़ोर से बोलने लगा, "वा ! शेर को खाने का मज़ा ही  कुछ  और है.  एक और मिल जाए तो पूरी दावत हो जाएगी!"  और उसने ज़ोर से   डकार मारा. इस बार शेर सकते में आ गया.  उसने सोचा "ये कुत्ता तो शेर का शिकार  करता है! जान बचा करा भागो!"  और शेर वहाँ से चंपत हो गया . 


पेड़ पर बैठा एक बंदर यह सब तमाशा देख रहा था. उसने सोचा यह मौका अच्छा है शेर को सारी कहानी बता देता हूँ - शेर से दोस्ती हो जाएगी और उससे ज़िंदगी भर के लिए जान का ख़तरा दूर हो जाएगा. वो फटाफट शेर  के पीछे  भागा . कुत्ते ने बंदर को जाते हुए देख लिया और समझ गया की कोई लोचा है. उधर बंदर ने शेर को सब बता दिया की कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ़ बनाया है. शेर ज़ोर से दहाडा ,"चल मेरे साथ अभी उसकी लीला ख़त्म  करता हू" और बंदर को अपनी पीठ पर बैठा कर शेर कुत्ते की तरफ लपका.   


Can u imagine the quick management by the DOG......... ......... ...    


कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर  उसकी  तरफ पीठ करके बैठ  गया और ज़ोर ज़ोर से बोलने लगा, "इस बंदर को भेज के 1 घंटा हो गया , साला एक शेर फाँस कर नही ला सकता!" 


 "अपने आस पास भी ऐसे बंदर होते है... पहचानना सीखो !"

-विक्रम 

रविवार, जुलाई 08, 2012

-- मेरा जीवन --




गृहस्थ  के झंझटों से 
कुछ वक़्त निकालकर 
में अक्सर ...

चुपके से 
तुम्हारी यादों को 
छु  आता हूँ...

मेरा जीवन 
नदी के 
उन  दो किनारों 
के दरमियाँ बहते 
पानी सा है  ...

जो दोनों की छुवन 
से  सामंजस्य  बैठा 
लेता है , जीवन को
जीने का  ....

सच है की 

नदी के किनारे 

नही मिलते,मगर  

दिल तो  नादाँ है , 

  समझाए कौन ?...

"विक्रम"

गुरुवार, मई 24, 2012

अनर्थ-शास्त्री

सुखहर्ता-दुखकर्ता
 हे जनता ! क्या कष्ट है तुम्हे ? क्यों नाहक एक अनर्थ-शास्त्री को बुरा भला कहती हो ?वो तो अन्तर्यामी है ,पालनहार है ,तुम्हे महंगाई के भवसागर से उबारने में अपनी अनर्थ-शास्त्रीयत के ऐसे ही जलवे दिखाता रहेगा वो सुखहर्ता-दुखकर्ता है उसकी 'महिमा' अपरम्पार है , सबकुछ जानता है, और उसे ये भी पता है की, उसके भक्त पेट्रोल में सात आठ रूपये की तुच्छ भेंट सहर्ष स्वीकार कर उसे तृप्त करेंगे वो आपके कष्टों को चरम सीमा तक पहुंचाकर आपको इस योग्य बनाने में जुटा है की आप सुनामी जैसे झटके भी हँसते रोते सहन कर सको, और फिर दुनिया की कोई ताकत आपको नेस्तनाबूत नहीं कर पायगी और आप जीवन भर ऐसे ही हिचकोलों को प्रशाद स्वरूप लेते रहोगे कांग्रेस को क्यों कोसते हो ? क्या नहीं दिया इस बेचारी  अबला  सरकार ने आपको ?

अरे वैट, सर्विस टैक्स जैसे २ अनमोल रत्न दिए , पेट्रोल के रेट को आसमान की बुलंदियों पे पहुंचाकर आपकी सहन शक्ति में बेतहाशा इजाफा कर आपके हार्ट को मजबूत किया. भ्रष्टाचार जैसा ससुर और महंगाई जैसी अर्धांगिनी दी जिसकी बदौलत मिलावट जैसी सुन्दर संतान आपकी झोली में डाल दी

अब और क्या चाहिए ? कहाँ ऐसी सराकर मिलेगी जो आपको अन्दर से इतनी मजबूती दे ? वैसे ऐसा नहीं की आपको ही फौलाद सी मजबूती प्रदान की है , खुद को भी बड़े बड़े घोटालों से नवाजा है. भई जब नेता ही मजबूत नहीं होंगे तो भला आपको कैसे सहारा देंगे , तभी तो आज इस महंगाई के दौर में गिरे से गिरा नेता भी २०० , ३०० करोड़ बना कर बैठा है . आज सरकार में माने हुए 'अनर्थशास्त्री' आपको और आपकी अर्थव्यवस्था को लगातार 'मजबूती' प्रदान कर रहे हैं. आपकी छोटी से छोटी कराहट उनके कानों तक पहुँच जाती है और सरकार आपको महंगाई की थपकी देकर सुला देती है जिस से आपको चुटकी बजाते ही तुम्हे परमसुख की अनुभूति होती है

इस से आप छोटी मोटी तकलीफ को हँसते हँसते झेल लेते हो | अभी पेट्रोल के हलके हलके झटके देकर आपको रसोई गैस के  जलजले से निपटने के लिए तैयार किया जा रहा है |आपकी सरकार जानती है की बकरे को खिला पिला के हलाल करने का मजा ही कुछ और है | इसलिए हे प्राणी ! निकट भविष्य में ऐसे छोटे मोटे झटकों की पुनरावृति  कदाचित जारी रहेगी | तूं सयम रख , होश मत गवां |  अपने दुखों की चिंता मत कर ,और तन मन धन से उस मन-मोहन घनश्याम  के सम्मोहन में अपने आपको को समर्पित कर परमसुख  की अनुभूति कर |

जय हो !
"विक्रम"

रविवार, अप्रैल 08, 2012

मेहमानवाजी

सुना है आज पड़ोसी मुल्क से कोई बहुत बड़ी हस्ती का पदार्पण होने वाला है . मिडिया से लेकर सरकारी तंत्र तक पलक पावड़े बिछाये बैठा है.वैसे तो इस पड़ोसी मुल्क से अक्सर आतंकवादी ही इधर घुमने आते हैं, मगर इस बार एक खीसे निपोरते हुए एक राष्ट्रपती आ रहा है , वो आ तो रहा है अपनी निजी (धार्मिक) यात्रा पे जियारत के लिए मगर हमारे नेता तलुवे चाटने का ये हसीन मौका हाथ से नहीं जाने देंगे . तलुवे चाटते हुए चाटुकारिता भरी हुई नज़र से अमेरिका को देखेंगे और मन ही मन कहेंगे की 'देखो ,जैसा आपने कहा उस से भी ज्यादा कर रहे हैं '.

टीवी पे सुबह से उसके कार्यक्रम का एक एक पल का व्रतांत सुनाया जा रहा है . (मेरा ये लेख लिखे जाने तक वो बाथरूम में सायद नहा रहा है ) . दोपहर के खाने के मेनू में ऐसे ऐसे व्यंजनों के नाम गिनाये जा रहे हैं जिनमे बहुतों के कभी नाम सुने ही नहीं . खाने में  शाकाहारी ,मासाहारी दोनों ही शामिल किये गए है . जो इस प्रकार हैं :
शाकाहारी व्यंजन : मेलन-मिंट का ठंडा सूप, सरसों के फूल, सब्ज शम्मी कबाब, मिनी मसाला डोसा, तोरई भुजिया, मकई पालक, भिंडी कुरकुरी अवियाल, मंूग दाल तड़का, सब्ज बिरयानी, कई तरह की रोटियां, ब्लूबेरी मूसे, गुड़ का संदेश, फिरनी, फल।
मांसाहारी व्यंजन : जैतूनी मुर्ग सीख, गोश्त बड़ा कबाब, करेली दाल गोश्त, मुर्ग कोफ्ता मखनी, सिकंदरी खुश्क रान, कच्ची गोश्त बिरयानी।

बेचारी जनता को अप्रत्यक्ष रूप से बता दिया गया है की कम से कम आज के दिन अपना मुंह बंद रखे और रोज की तरह भ्रष्टाचार,महंगाई ,बिजली,पानी की चिल्लमचिल्ली मचाकर मूड ख़राब न करे . हमारे नेता मेहमान नवाजी में हमेशा अव्वल ही रहे हैं , पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति के स्वागत लिए दिन रात एक कर दिया था ,मगर हाथ कुछ नहीं आया . खैर वो तो शक्तिशाली राष्ट्र का शक्तिशाली नुमाईन्दा था मगर ये साहब जो आज तसरीफ ला रहे हैं इन बेचारों की तो कभी अपने घर में भी नहीं चली . पिछले दिनों मुशरफ आया तो तोहफे में कारगिल दे गया , अब देखते हैं ये साहब क्या तोहफा देते हैं.

बहुत दुःख होता है ,दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अमन शांति के लिए दहशतगर्दों के आगे हाथ फ़ैलाने पड़ते हैं. हर बार अपनी तरफ से शांति की पहल करके हम अपन कह्जोरी ही जता रहे हैं . हम कमजोर नहीं हमारी नुमाइंदगी कमजोर है जिसकी बदौलत कारगिल, संसद, 26 /11 ,आगरा क्रिकेट, अजमेर, हाफिज़ सईद ......जैसे शब्दों की इबारत लिखी जाती है .



गुरुवार, मार्च 15, 2012

ताऊ श्रवण

( लेख थोडा लम्बा है, मगर एक इंसान की सच्ची कहानी है जिसका सम्पूर्ण जीवन सामाजिक कु-प्रथाओं की भेंट चढ़ गया )




गाँव के मुख्य चौक के किनारे बने चबूतरे पर हम अक्सर ताऊ श्रवण को पसरे हुए पाते थे . वो या तो कुछ पढ़ रहे होते या रेडियो में फ़िल्मी गाने सुन रहे होते . गाँव के बच्चे उन्हें सिर्फ "ताऊ" का संबोधन करते थे क्योंकि हरियाणा और सीमावर्ती इलाके राजस्थान ( जहाँ मेरा गाँव है) में "जी" या "आप" लगाना व्यंग्य की श्रेणी में आता था . ताऊ श्रवण शारीरिक रूप से काफी हट्टे कट्टे और बलिष्ठ काया के स्वामी थे .उन्होंने अपनी  उम्र को स्थिर  मान लिया था. वो अपने आप को आज भी युवाओ का मुख्य प्रतिद्वन्द्वी मानते थे, हालाँकि वो 65 बसन्त गुजार चुके थे .

अपने हमउम्र बूढों लोगों से ताऊ को सबसे ज्यादा चिड़ होती थी , वो ताऊ को सठियाया हुआ समझते थे ,और ताऊ उनके सम्पूर्ण जीवन को ही निरर्थक समझते थे . इसका एक खास कारण जो मुझे लगता था वो था , ताऊ का थोडा बहुत पढ़ा लिखा होना और अन्य का अंगूठा छाप होना , बाकि सब ताश खेलते रहते मगर ताऊ को ताशों के खेल से बहुत नफरत थी .

किताबों से ताऊ ने काफी ज्ञान अर्जित कर रखा था जिसको वो समय समय पर बखान करने से नहीं चुकते थे .  उनके बखान से  अंगूठा छाप ग्रामीणों के लिए तो भैंस के आगे बीन बजाने वाली स्थिति होती थी . ताऊ श्रवण को किताबें पढने का बहुत शौक था , मगर धार्मिक किताबों से उनका छत्तीस का आंकड़ा था I उनकी पसंदीदा किताबों में कादम्बनी, गृहशोभा, रोमांटिक उपन्यास होते थे मगर चंदामामा
और बालहंस जैसी किताबों से भी परहेज नहीं करते थे .   

गाँव का कोई न कोई युवा शाम को शहर से लौटते वक़्त पढ़ा हुआ अखबार ताऊ के हाथ में ऐसे थमा देता जैसे  ये  उन्ही के लिए ही ख़रीदा हो , और बदले में ताऊ उसको अपनी कोई पढ़ी हुई किताब देना नही भूलते ताकि ये लेन देन का सिलसिला निरंतर चलता रहे . वो अपने आप में एक छोटी लाईब्रेरी थे , अपनी किताबें एक दुसरे को देते रहते मगर बदले में उनसे किताब लेना कतई नहीं भूलते .

उनके दो ही शौक थे, किताबें और रेडियों . उम्र के हिसाब से उनको चलने फिरने में मुश्किल तो होती थी, मगर वो किताब के लिए गाँव के हर युवा के घर तक पहुँच जाते . अक्सर चौक में लेटे रहने वाले इस प्राणी को अकस्मात अपने घर के सामने देखकर घर की महिलाये संकोचवश इधर उधर छुप जाती . उन दिनों गाँव में औरतें अक्सर बड़े बूढों के सामने नहीं आती थी , आज तो हालात काफी बदल चुके हैं.  अपने मोह्हले में ताऊ को आया देख मोह्हले के बच्चे कोतुहलवश पीछे लग जाते , और ताऊ मस्त हाथी की तरह लहलहाते हुये चले जाते. बच्चो का हुजूम कुछ दूर पीछे पीछे चलता और बाद में लौट आता मानो किसी सर्कस से लौटे हों .



ताऊ आंशिक रूप से कुवारें थे . सुना था उनके बड़े भाई के निधन के बाद उनकी भाभी को उनके पल्ले लगा (बांध) दिया था l ताऊ जिस जाति से सम्बन्ध रखते थे उसमे अक्सर परिवार के छोटे लड़के को कुंवारा रखने का रिवाज था ताकि कभी शादी शुदा के साथ कुछ अप्रिय घटना घट जाये तो उसकी विधवा को उसके नाम की चूडियाँ पहनाई जा सके.   मगर ताऊ को सायद औपचारिक विवाह रास नहीं आया और वो अपना मलंग जीवन ही जीते रहे  .

ताऊ का मकान हमारे स्कूल जाने के रास्ते में पड़ता था .  शरारती बच्चे आते जाते वक़्त ताऊ पे एक सरसरी नजर डालते और उसके बाद उनके घर की दीवारों पे लटके अमरबेल के पोधे की कुछ बेलें तोड़ कर भाग जाते l ताऊ उनके पीछे पीछे गलियां देते हुए जाते और कुछ दूर तक उनको भगाकर वापिस आ जाते . बच्चे इस क्रिया को महीने में ३ य ४ बार दोहराते इसलिए ताऊ को उनकी हरकतों का पूर्वानुमान लगाने में खासी परेशानी होती थी . 

गाँव में पढ़े लिखे बुजर्गों में एक मात्र ताऊ ही थे इसलिए हमारे स्कूल के प्रधानाचार्य १५ अगस्त या २६ जनवरी जैसे उत्सव में उन्ही को आमंत्रित करते थे l ताऊ जैसे इसी मौके की तलाश में रहते थे l वो वक़्त पर पहुंचकर मुख्य अतिथि वाली कुर्सी पर अपने भरी भरकम शारीर को रख देते और चश्मे को ऊपर निचे करके सामने पक्तियों में बैठे उन शरारती बच्चो को तलाशने लगते l बच्चे भी कम नहीं थे, वो एक दुसरे के पीछे ऐसे छुपकर बैठते जहाँ ताऊ की दिव्य द्रष्टि नहीं पहुँच पाती थी l जब ताऊ को अभिभाषण के लिए कहा जाता तो ताऊ अपना भाषण शुरू करते . वो बताते की कैसे अंग्रेजो ने हम पे सितम ढाए थे और कैसे हम लोगों ने आजादी के लिए संघर्ष किया . इसके साथ साथ वो समाज में फैली सामाजिक कुप्रथाओं की भी खुलकर धजियाँ उड़ाते रहते . वो क्रांतिकारियों के कारनामों की तारीफ करते मगर बीच बीच में उन बच्चो को भी कोसते जो उनकी बेल तोड़कर भाग जाते थे l उनकी इस बात पर छुपकर बैठे बच्चे एक दुसरे की तरफ देखकर मुस्कराते और उधर सभी अध्यापकगण तथा अन्य
अतिथि भी मुस्कुराने में उनका साथ देते .



ताऊ से मेरी स्कूल के दिनों से ही अच्छी पटरी बैठती थी . वो मुझे बेटे और एक दोस्त की तरह मानते थे l मेरे और उनके बीच किताबों का लेन देन चलता रहता था में अक्सर समय बिताने के लिए उनके पास बैठ जाया करता था l में जितनी देर उनके पास बैठता था उस दरमियाँ अगर गाँव का कोई भी वृद्ध उधर से गुजरता तो ताऊ फुसफुसाकर उसके बारें में बुरा भला कहते और उसके दूर चले जाने के बाद मुझ से पूछते ,"किसलिए पैदा हुए ये लोग ? साले खा पी के सो जाते हैं , दुनिया में क्या हो रहा है कुछ पता है इनको ? ,धरती के बोझ " में मुस्करा के ताऊ का समर्थन करता .

ज्यादातर लोग उनके एकाकी और अक्खड़ स्वभाव के कारण उनको पसंद नहीं करते थे लेकिन वो भी अन्दर से एक आम इंसान की तरह ही थे l बस लोग उनको समझ नहीं पाए . एक बार किसी किताब में लिखी प्रेम कहानी के बारें में मेरे और ताऊ के बीच वार्तालाप चल रहा था . किताब की कहानी इतनी भावुक थी की ताऊ खुद बहुत भावुक हो गए और वो अपने जीवन का एक वाकया मुझे बताने लगे .

उन दिनों श्रवण अपनी युवा अवस्था में थे . किसी परिचित मारवाड़ी के साथ आसाम चले गए और वहां उसकी दुकान में काम करने लगे . मारवाड़ी ने श्रवण के लिए एक किराये का मकान खोज कर दिलवा दिया था l वो दिनभर दुकान में और शाम को अपने मकान में आकर सो जाते.  मकान एक स्थानीय निवासी का था जिसमे मकान मालिक अपनी पत्नी तथा एक जवान बेटी बिनोदिनी के साथ रहता था. वो लोग ताऊ का खास ख्याल रखते थे , यहाँ तक की उनका खाना भी वही लोग बनाते थे.  धीरे धीरे
बिनोदिनी 25 वर्षीय श्रवण के प्रति आकर्षित होने लगी . 

युवा दिलों को प्रेम करना सीखना नहीं पड़ता वो स्वत: ही सीख़ जाते हैं l गृह स्वामी और स्वामिनी को दोनों के परस्पर मिलने से कोई आपति नहीं थी l उन्होंने मन ही मन ताऊ को अपना दामाद मान लिया था l वक़्त बीतता गया और ताऊ अपनी दुनिया में बहुत ख़ुशी से जीवन बसर करने लगे. कहते हैं की किस्मत कब बदल जाये किसी को कुछ पता नहीं होता . श्रवण और बिनोदिनी की किस्मत ने भी एक करवट ली . एक साल बाद अचानक ताऊ को पता चला उनके बड़े भाई की एक हादसे में मौत हो गई . वो आनन फानन में वहां से आ गए . गाँव पहुंचकर स्वछंद जीवन जीने वाले श्रवण के पैरों में सामाजिक बेड़िया पहना दी गई l उनकी भाभी को उनके नाम की चूड़िया पहना दी गई l युवा इच्छाएं परिवार और समाज की भेंट चढ़ चुकी थी l किस्मत की एक करवट ने दो युवा दिलों की हसरतों को एक झटके में मसलकर रख दिया था l देखते देखते पाँच साल गुजर गए मगर श्रवण आज तक बिनोदिनी को नहीं भुला पाए थेl

 एक दिन अचानक घरवालों को बिना बताये आसाम के लिए निकल गए l दो दिन बाद वहां पहुंचे तो पहले मारवाड़ी के पास गए . मारवाड़ी उनको देखते ही चौंक गया और उनका हाथ पकड़कर दुकान के अन्दर ले गया l " अरे ! , तुम यहाँ क्यों आये हो ? वो लोग तुम्हे मार डालेंगे " , मारवाड़ी ने डरते हुए कहा . बाद में वो श्रवण को अपने घर ले गया तथा उसके जाने के बाद से अब तक का सारा हाल बताया.  वो लोग श्रवण के ऐसे चले जाने और फिर कई दिनों तक ना आने से बहुत नाराज हो गए तथा अपने परिचितों को लेकर अक्सर दुकान में आ धमकते थे .

उन लोगों के हाथों में खुखरीनुमा हथियार होता था जिसको ऊपर उठाकर वो अपनी स्थानीय भाषा में काट डालने की धमकी देते थे . दो सालों तक ये सिलसिला चलता रहा बाद में बिनोदिनी की शादी उन्ही के समाज के एक दबंग के साथ करदी . श्रवण थे तो युवा मगर पराये देश में ऐसे हालात ने उनको बहुत डरा दिया था और वो उसी दिन वहां से भागकर वापिस गाँव आ गए .

 इतना कहकर ताऊ चुप हो गए ..... फिर ना जाने कब कहाँ से वक़्त की दरारों में फंसे कुछ आसूँ, ताऊ की आँखों से निकल किताब पे आ गिरे . एक अक्खड़ आज अबोध बच्चे सा सुबक कर रह गया था . आज चालीस सालों से दबे तूफान ने सिर उठाया तो मलंग  ने फिर से उसे अपने अन्दर ही कुचल दिया.

आज से करीब दो साल पहले गाँव गया तो पता चला श्रवण ताऊ नहीं रहे . सुनकर बहुत दुःख हुआ l आज जब भी गाँव जाता हूँ , तो उस चौक में गाँव की पंचायत द्वारा छोड़ा गया सांड जुगाली करता हुआ मिलता है जो अक्सर गाँव के बूढों की तरफ फुंकारता रहता है.  मुझे ना जाने क्यों उसको देखकर ताऊ की याद आ जाती है. ताऊ भी ऐसे ही मस्त मौला की तरह इसी चौक में जमे रहते थे. में ताऊ के जीवन की कहानी याद करके अक्सर अपने आप से कह देता हूँ की "कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता ...कभी जमीं तो कभी आसमान नहीं मिलता" .


( मेरा ये स्मृति लेख ताऊ श्रवण को श्रधांजली है l अगले जन्म में भगवान उनको वो सब खुशियाँ दे जो उनको इस जन्म में मयस्सर नहीं हुई )

"विक्रम"







मंगलवार, मार्च 06, 2012

अनुशासन


घटना आज से करीब एक साल पहले की है .में अपने ऑफिस के किसी काम से पूना से बंगलोर आ रहा था. एअरपोर्ट के वेटिंग हाल में अन्य यात्रियों के साथ मैं भी सिक्योरिटी चेक का इन्तजार कर रहा था . मेरे सामने एक विदेशी जोड़ा अपने पांच छ: साल के बच्चे के साथ खेल कर टाइम पास कर  रहा था  . कुछ समय बाद बच्चे के पिता ने पास के काउंटर से एक चॉकलेट खरीदा और  उसका Wraper (कवर) उतार कर बच्चे की तरफ बढ़ाया . खेलते हुए बच्चे ने अपने पापा के दोनों हाथो को बारी बारी से देखा .एक में चॉकलेट और दुसरे में उसका खली कवर था. बच्चे ने तुरंत चॉकलेट से उतारा गया कवर लिया और उसको पास के डस्टबिन में डाल दिया और फिर वापिस आकर दुसरे हाथ में पकड़ी चोकलेट को लेकर खाने लगा .

कहने को एक छोटी सी घटना है मगर अपने आप में बहुत बड़ी है . उस पाँच साल के बच्चे में कितना अनुशासन है वो अपने आप में बहुत बड़ी बात है .हम चाहे विदेशी लोगों के रहन सहन में कितने ही मीन मेख निकालें मगर अनुशासन में वो हमसे काफी आगे हैं. आज आप किसी ट्रेन ,बस रेलवे स्टेशन याबस स्टैंड में जाकर देखें. मूंगफली के छिलके ,बीडी सिगरेट के टुकड़ों का अम्बार मिलेगा , उत्तर प्रदेश या बिहार में देखिये , सार्वजानिक  स्थानों में पान थूककर बेहूदगी की हदें पार की जाती हैं . सिंगापोर जैसी जगह में सड़क पे थूकने से आपको जेल की हवा खानी पड़ सकती  है . मगर यहाँ आपको पूरी आजादी है कहीं भी थूकने की  और थूकने के बाद आप  बड़े रौब से ये जुमला  उछाल सकते हैं की "इस देश की जनता और सरकार ने  देश का क्या हाल  कर रखा है ,  कितनी गंदगी है इसको   साफ़ भी नहीं किया जाता ".      .........  मेरा भारत महान ?
-विक्रम

बुधवार, जनवरी 25, 2012

टूटे फूटे अरमान




टूटे फूटे से अरमान उठा  लाया हूँ  
ताकि  पहचान  सको बरसों बाद  मुझे  
वो खिड़की ,वो पगडंडी ,वो छत की मुंडेर ...  
कुछ भी तो नहीं बदला |

फिर क्यों है अनजाना सा  हर एक लम्हा,
क्यों पसरी है ख़ामोशी 
उस खिड़की से लेकर 
सामने के बंद दरवाजे तक  |     
जहाँ कभी निष्प्राण से निहारते थे ,
लयबद्ध  धडकते  दो जवां दिल |
नजरो की  कोमल सलाइयों  से
बुना करते थे  हसीन खवाब |

सामने की वो झील सूख  चुकी है   
जहाँ रात भर झींगुर गाते थे  |
धुप या बरसात का बहाना  बना  
पीछे खड़ा  वो पेड़  भी मुरझा  चूका है |


छत का वो कोना   मायूस  पड़ा   है 
जहाँ कभी हसीन  ख्वाब मचलते थे 
वो मुंडेर भी उन संजीदा यादों को
बचा न सकी वक्त के थपेड़ों  से   


सड़क  बन  चुकी वो पतली सी पगडंडी ,
पथरों में दब गई  किनारों की वो हरी घास
प्रतिस्पर्धा रखते हैं  मेरे अरमानों से
छत पे खाली पड़े  टूटे फूटे से  गमले 

"विक्रम"

गुरुवार, जनवरी 12, 2012

उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत



में उत्तर भारत से सम्बन्ध रखता हूँ मगर पिछले लगभग एक दशक से दक्षिण भारत में रह रहा हूँ .इस दौरान मैंने उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में बहुत सा फर्क देखा है , जिसमे खान पान, रहन सहन , वेशभूषा से लेकर आचरण तक शामिल है .आज में कुछ खास बातों का जिक्र करूँगा जो हमें उत्तर भारत में देखने को नहीं मिलती.यहाँ के लोग बहुत धर्मिक प्रवर्ती के होते हैं . यहाँ पर चोरियां बहुत कम होती है. लोगों को सरेआम झगड़ते हुए शायद ही कभी देखा जाता है . बस या रेल की टिकिट के लिए आपको बहुत कम इन्तजार करना पड़ता है , तथा टिकिट के लिए आपको छुट्टे पैसे देने के लिए मजबूर नहीं किया जाता जैसा की उत्तर भारत में अमूमन देखा जाता है . यहाँ के सरकारी कर्मचारी भी आप से बहुत अपनत्व से बात करते है .


नई तकनीक को इन राज्यों ने बहुत अपनाया है , राशन कार्ड , गैस बुकिंग ,टिकटिंग ,टैक्स , टेलीफ़ोन बिल जैसे काम ऑनलाइन कर सकते हैं .शिक्षा के क्षेत्र में तो दक्षिण भारत के ये ४ राज्य सदा अवल ही रहे हैं . अकेले कर्नाटक में इतने इंजीनियरिग कोलेज हैं जितने पुरे भारत में नहीं होंगे .


एक से एक भव्य मंदिर यहाँ के हर शहर में देखने को मिलेंगे , मगर एक बात जो यहाँ चुभती है वो है मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए आपको पैसे देने पड़ते हैं . और उसपे भी अगर आपको दर्शन करने की जल्दी है तो आप जितने ज्यादा पैसे देंगे उतनी जल्दी आपको दर्शन करने को मिलेंगे . मंदिरों में दान देने के मामले में यहाँ के लोग सबसे आगे हैं .

कोई चाहे कितना भी गरीब हो अगर उसकी मनोकामना पूर्ण हो गई तो वो अपने पास के पुरे पैसे जेवरात तक मंदिर के दान बॉक्स में डाल देता है , यानी भगवान को दान देने में तो भामाशाह जैसा दिल है .तिरुपति बालाजी का मंदिर पूरी दुनिया में सबसे धनाढ्य मंदिर है , जहाँ साल में करोड़ो रुपयों के तो बाल बेचे जाते हैं जो दर्शनार्थियों द्वारा मुराद पूरी होने पर कटवाए जाते है. यहाँ तक की औरतें भी अपने पुरे बाल कटवाकर आती हैं मंदिर में . यहाँ पर ९०% लोग सुबह पूजा करने के बाद ही चाय नाश्ता करते हैं पूरा परिवार सुबह नहाकर पूजा करता है . औरतें बिना घर के आगे रंगोली बनाये कोई काम नहीं करती , उनके द्वारा कुछ ही मिनिटों में घर के आगे बनी गई रंग बिरंगी रंगोली हर किसी का दिल मोह लेती है .

चाय से लेकर सब्जी बेचने वाला तक अगर हिंदी ना भी समझे तो भी आपको अंग्रेजी में वन टू थ्री बोलकर समझा देगा , लेकिन ज्यतादर आपसे हिंदी में वार्तालाप की कोशिश करेंगे . क्या हम उत्तर भारत में कभी किसी दक्षिण भारतीय से उसकी भाषा में एक शब्द भी बोलते हैं ? नहीं


शराब के मामले भी दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत के लोगों से आगे हैं .पूजा पाठ के साथ शराब के भी बहुत शौकीन है यहाँ के लोग यहाँ पे आपको जहाँ शराब का ठेका मिलेगा उसके आस पास कोई ना कोई मंदिर भी जरुर मिलेगा , और दो चार कदम पे मीट की दुकान भी मिलेगी यानी धर्म और निजी जीवन दोनों का बखूबी तालमेल यहाँ देखने को मिलेगा .दक्षिण भारत के ४ राज्य ( आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु,कर्नाटका और केरल ) बाकि देश से कुछ बातों में काफी भिन्न है .तमिलनाडु में हिंदी भाषी लोग ना के बराबर है. पुरे तमिलनाडु में आपको सायद ही कोई हिंदी बोलने या समझने वाला मिलेगा लेकिन इसके विपरीत आंध्रप्रदेश,केरल और कर्नाटका में हिंदी की स्थिति बेहतर है . एक और खास बात है जो  में  आपसे  बाँटना  चाहूँगा  वो है   इन चारों  राज्यों की अलग अलग भाषा. उत्तर भारत  में अधिकतर राज्यों की भाषा एक दुसरे से मिलती जुलती है ,या फिर वो हिंदी बोलकर एक दुसरे से संवाद कर लेते हैं . मगर इधर एक दुसरे की भाषा बिलकूल नहीं समझते ,यहाँ तक की लिपि भी पूरी तरह से अलग है .

 
खान पान के मामले में ४ राज्यों में चावल और चावल से बने अन्य पकवान ही बहुतायत में मिलेंगे केरल में नारियल का तेल सब्जी बनाने में उपयोग में लाया जाता है जो को उत्तर भारतीयों को शायद

ही पसंद हो , दक्षिण भारत में कुछ खास पकवानों के नाम इस तरह हैं , लेमन राईस ,सांभर राईस , इडली , मेदू वडा , रश्म ,डोसा ,उपमा , पोंगल आदि मगर इन सब में ९९% चावल और नारियल जरुर मिलेगा .




यहाँ के त्यौहार भी अलग ही हैं पोंगल, ओणम ,पूरम ,चितिरै कुछ खास त्यौहार हैं . उत्तर भारत की तरह यहाँ होली दिवाली जैसे त्यौहार को लोग कम जानते है इसलिए ना के बराबर ही मनाते है .यहाँ तक की दक्षिण भारत में  पंचाग भी अलग होता है.

मगर चाहे जो भी हो , यही तो पहचान है हिंदुस्तान  की . "विभिन्नता  में एकता "

//विक्रम//


रविवार, जनवरी 08, 2012

दस्तक

  
     स्थिर,निष्प्रभ,निश्तब्ध दिल पे
    गाहे बगाहे दे जाती हो दस्तक
    और छेड़ जाती हो हलचलों का 
     एक अंतहीन सा सिलसिला...




 

इस कशमकश में बटोरने लगता हूँ
उन हसीन पलों को, जो साक्षी थे
कभी उस सफ़र के जो बसर हुआ
बिना कुछ कहे बिना कुछ सुने





बस यही मुसलसल रिश्ता है
हमारे दरमियाँ निभाने को ,
जो बसर हो रहा है शिद्दत से
एक तन्हा सफ़र की तरह .....



में जिंदा हूँ तो बस, वक़्त बेवक्त की
आहटों ,दस्तकों और धडकनों
के धमाकों से गिरी यादों के पलों
को उठाकर सहेजने को ,क्योंकि
कुछ तो बहाना हो नीरस सा जीवन
व्यतित करने को ... . . . .

"विक्रम"





















रविवार, जनवरी 01, 2012

चेहरा




आता है नजर 
वक़्त की धुंध में  एक धुंधला सा चेहरा 
   

बना लेता हूँ   उसके   नयन नक्श फिर
धीरे से उभर आता है तेरा अक्श फिर


हर  रोज यूँ में ख्यालों  में  बनाकर तुम्हे   
बस बैठा लेता हूँ  सामने  सजाकर तुम्हे

रोज की भांति  गिले-शिकवों का  एक दौर
चला हमारे दरमियाँ  इस और  से  उस ओर

 
अंत में हम अनन्त मनुहार के उत्कर्ष पे
जा मिले फिर यूँ प्यार के चरमोत्कर्ष पे

जाता है निखर
यूँ  प्यार के द्वंद  में  दूध सा धुला  चेहरा 

"विक्रम"
    

सोमवार, दिसंबर 19, 2011

यादें


  वक़्त के साहिल से
  विचारों  के जाल
   अतीत में फेंक कर ,
 निकाल लेता हूँ
  कुछ डूबती  हुई
 यादें .....

  फिर ....

उन्हें जोड़कर ,
सिलसिलेवार....
और दोहराकर,
बना लेता हूँ मजबूत ,
यादों की हिलती बुनियाद

    और फिर ...


छोड़ देता हूँ विचारों को पुन:
अतीत के गहरे गर्त में
ताकि
ला सकें अपने साथ
किसी भूले बिसरे पल को .
सुनी हैं आज फिर
तल से आती फरियादें ...

"विक्रम"
                             
                                                                           : - :




शुक्रवार, दिसंबर 16, 2011

ब्लोगिंग वार ( तीसरा महायुद्ध )

इन्सटाइन ने कहा था की तीसरे युद्ध का तो पता नहीं मगर चौथा पथरों से लड़ा जायेगा.लेकिन आजकल तीसरे युद्ध की शुगबुगाहट शुरू हो गई है.इस युद्ध में किसी अस्त्र शस्त्र की जरुरत नहीं और ना ही किसी परमाणु या ड्रोन की , ये तो चुपके चुपके लड़ा जा रहा है.

आमतौर पर हर युद्ध के पीछे कोई ना कोई कारण होता है , और ठीक उसी तरह इसके पीछे भी कई कारण है. आज भाषा , राज्य ,धर्म और धार्मिक ग्रंथो के नाम पे लड़ा जाने वाला ये है ब्लोगिंग वार. अगर आपकी भाषा सामने वाले से मिलती नहीं तो आप उसके ऊपर कमेन्ट करते हो ,आपका राज्य ,धर्म सामने वाले से अलग है तो आप उसपे टिक्का टिप्पणी करते हो , सामने वाले के ग्रंथों में कही गई बातों को ब्लॉग में उठाकर बहस खड़ी  करते हो.



मैने कुछ ब्लॉग में पोस्ट पढ़ी तो पाया की ब्लॉगर ने इतना गहन शोध अपने मजहब की पुस्तकों को पढनें में नहीं किया होगा जितना दुसरे मजहब की पुस्तकों में, और वो भी सिर्फ इसलिए , की कुछ मसाला मिले जिसे अपने ब्लॉग में लगा सके . दुसरे के धार्मिक ग्रंथों से अच्छी बातें उठाने की जगह कुछ भर्मित तथ्य उछाल कर हंगामा खड़ा करने वाले कोनसे युद्ध की तैयारी में लगे हैं भगवान जाने .

कमोबेश धार्मिक ग्रंथों में कुछ ना कुछ ऐसा जरुर है जो आज सभी को हजम नहीं होता ,कुछ इसको धार्मिक ग्रंथों से की गई छेड़-छाड़ बतातें हैं , कुछ इसको अपने तर्कों से सही ठहराता है .आज एक ब्लॉगर की एक सवेंदनशील टिप्पणी ,हजारों लोगों में शब्दों की खामोश बहस खड़ी कर देती हैं . निकट भविष्य में येही ख़ामोशी तूफान से पहले की ख़ामोशी सिद्ध होगी . फिर आखिर लोग इस तरह के वक्तव्य देकर कोनसी मंजिल पा लेना चाहते हैं.? क्या प्रसिद्धी के लिए इंसानों को गुमराह किया जा रहा है. ? क्या गुमराह होने वाले लोगों की अपनी कोई राय या सोच नहीं क्या उनके पास अपना दिमाग नहीं.? क्यों लोग ऐसे समाज कंटकों की किसी भी बात को सच मान भ्रमित हो जाते हैं.? किया उन्हें अपने धार्मिक में कहीं बातों पे विश्वास नहीं. ? अगर ऐसा है तो क्यों नहीं "इंसानियत धर्म" को अपनाया जाये , जिसमे आपसी भाईचारे  से नकारात्मक   सोचों को धोया जाये.?

अपने धर्मं को ऊँचा और दुसरे के धर्म को नीचा बताने वालों पहले जरा खुद तो इस ऊँच-नीच से  बाहर निकलों ताकि अपने वजूद से रूबरू हो सको .बस एक बार दुसरे के मजहब की इज्जत कर, और फिर देख ,वो तुझे और तेरे धर्म को कितनी इज्जत बक्सता है.
"विक्रम"

सोमवार, दिसंबर 05, 2011

पिता

घुटनों पर हाथ रखकर उठने वाले रघु चाचा आज हवा से  बातें कर रहे थे । घर से बाज़ार और बाजार से घर के बीच दिनभर दोड़ते रहे । घर के कोने कोने में झांक कर हर एक चीज की कई कई बार तसल्ली कर चुके थे । रसोई के सभी बर्तन साफ करके करीने से सजा दिए गए थे ,गन्दा सिंक भी आज अपने वास्तविक रूप में आ गया था तथा उसके चारों तरफ जमी काई (सिवार) उतर चुकी थी।  घर के आगे बने चबूतरे पर सोने वाला कुत्ता भी आज अपनी मनपसंद जगह पर नहीं सो पाया रघु चाचा ने वहां पर आज अपनी चारपाई डाल रखी थी तथा कुत्ते को पिछवाड़े खड़े एक पेड़ से बांध दिया था।

घर का एकलौता शयन कक्ष आज अपनी पहचान पाकर खुश लग रहा था । रघु चाचा की पिछले 10दिन की मेहनत आज घर के कोने कोने से नजर आ रही थी आज सालभर बाद उनका बेटा नवीन और बहु सुमन महीने भर के लिए शहर से गाँव आ रहे थे। रघु चाचा के बेटे नवीन ने अपनी मनपसंद की लड़की से पिछले साल विवाह कर लिया था। विवाह से ठीक एक दिन पहले रघु चाचा को फ़ोन से इतल्ला करदी थी। उस दिन रघु चाचा बहुत रोये थे , मगर बेटे की ख़ुशी के आगे घुटने टेक दिए और फोन पर ही बेटे को आशीर्वाद देकर पिता होने का फ़र्ज़ पूरा कर दिया था।

वक़्त के साथ साथ रघु चाचा , बेटे द्वारा की गई उपेक्षा को भूल गए और आज बेटे के स्वागत के लिए तैयार होने लगे। निर्मला चाची के देहांत के समय नवीन मात्र 10साल का था ,तब से रघु चाचा ने नवीन को माँ बनकर पाला था । नवीन पच्चीस साल का हो चूका था मगर रघु चाचा उसे आज भी 10 साल का बच्चा समझ खुद उसके लिए खाना बनाते थे । मगर आज रघु चाचा अपनी बहु के हाथ का बना खाना खायेंगे। बरसों बाद पका पकाया खाने को मिलेगा। खाने का ख्याल आते ही रघु चाचा फिर से रसोई में रखी हर सामग्री का मुआयना करते की कहीं कुछ कमी ना रह जाये वरना बहु  क्या सोचेगी।

पूरी तस्सली होने के बाद बाहर चबूतरे पे पड़ी चारपाई पर आकर बैठ गए और बहु के आने के बाद की घटनाओं को मन ही मन सोचकर मुस्कराने लगे। आते ही बहु रसोईघर में घुस गई ,कुछ पलों बाद खाने की महक घर की दीवारें लांघकर चबूतरे पर बैठे रघु चाचा के नथुनों तक जा पहुंची और इसके बाद रघु चाचा एक लम्बी साँस लेकर मुश्कराए और पैर फैलाकर लेट गए।

अचानक बजी फ़ोन की घंटी ने रघु चाचा को यथार्थ के धरातल पर जोर से पटका और उसके बाद आँख मलते हुए अन्दर भागे । फ़ोन का चोंगा उठाते ही दूसरी तरफ से नवीन की आवाज़ आई,  "पापा..." , पापा....वो.., आज सुमन की मम्मी हमारे पास आई हुई हैं , वो अभी चार पांच महीने हमारे साथ ही रहेंगी, .. तो.. इसलिए , इस बार हम नहीं आयेंगे पापा , आप अपना ख्याल रखिएगा । इतना कहकर दूसरी तरफ से बिना कुछ सुने फ़ोन काट दिया।


विक्रम

रविवार, नवंबर 27, 2011

गाँवों की फेसबुक (ताश)



आजकल ताशबूक का चलन पहले की अपेक्षा काफी बढ़ गया है आज जिस तरह क्रिकेट सभी खेलों पर हावी हो रहा है उसी तरह ताश भी बाकि खेलों जैसे चोपड़,लूडो,शतरंज पर हावी हो चुकी हैं. चोपड़ बहुत पुराना खेल है , जो राजा महाराजाओं के दौर में चरम सीमा पे था , मग़र आज अपना अस्तित्व खो रहा है. मुझे याद है आज से करीब २० साल पहले हमारे गाँव में बुजर्ग लोग बहुत जोश खरोस से दिनभर चोपड़ खेलते थे. वक़्त के साथ साथ हर चीज बदलती है , मगर कुछ का खाली स्वरूप ही बदलता है और वो लम्बे समय तक अपने अस्तित्व में रहती हैं.

इस जद्दोजहद में ताश क खेल अपना अस्तित्व बचाए रखने कामयाब रहा इसका मुख्य कारण है भिन्न भिन्न प्रकार की पारियां जो इसमे खेली जाती हैं. पहले गिनती के तीन या चार खेल ही थे जो अक्सर खेले जाते थे. वक़्त के साथ साथ लोग उन खेलों से बोर होने लगे थे की अचानक एक क्रांति का आगाज हुआ और अनेकों नई नई तरह के खेल खेले जाने लगे

ऐसा नहीं की नए खेल आसमान से टपके थे , वो पहले भी थे ,मगर एक सिमित क्षेत्र में, वक़्त के साथ साथ यातायात के साधनों की बहुतायत ने दूरियों को कम किया और लोग एक दुसरे के जुड़ने लगे. कहते हैं खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है , ठीक उसी तरह हम भी एक दुसरे के रहन सहन , खान-पान से प्रभावित हुए एक दुसरे की देखा देखी परिवर्तन शुरू किये तो जिन्दगी में भी परिवर्तन का दौर चल पड़ा . आज ताश में ऐसे ऐसे नए खेल आ गए हैं की दिनभर उनके पास बैठे रहो मगर फिर भी भेजे में कुछ नहीं आयेगा. पहले के खेलों में रमी,फ़ीस,तीन-दो-पांच,रंग आदि काफी मशहूर थे जिनमे प्राय: दो,तीन या चार जन खेल सकते थे , मगर आज तो अकेला बंदा भी पूरी तन्मयता से खेलता हुआ मिल जायेगा. अब वो क्या खेलता है ये तो पता नहीं मगर जब तक कोई दूसरा निठल्ला ना मिले तो अकेले खेलकर थोडा अभ्यास करने में क्या हर्ज़ है .

गर्मियों में ताश का खेल अपने पुरे यौवन पर होता है ,चाहे कितनी ही गर्मी हो , कितनी ही लू चलें मगर ताश खेलने वाले पूरी श्रर्दा से खेलते हैं. खेल के दौरान घर से काफी बुलावे आते हैं , मगर "आता हूँ , अभी आया , तुम चलो में आता हूँ " कहकर फिर से ताश वंदना शुरू हो जाती है. खेल के दौरान सलाहकारों की भी भरमार रहती है , जो बिना मांगे सलाह की बौछारें फेंकते करते रहते हैं .

इस खेल में साम दाम दंड भेद , सभी हथकंडे अपनाये जाते हैं अपने साथी से गुप्त इशारों में ही हाथ मे पकडे पतों के ब्यौरे का आदान प्रदान हो जाता है कुछ नौसिखिये अक्सर पकडे जाते हैं तो दंडस्वरूप उनको फिर से पत्ते बाँटने जैसी सजा मिलती है. मगर सबकुछ इशारों में ही संभव नहीं होता तो ऐसे हालात में सलाहकारों से सलाह ली जाती हैं जरुरी नहीं की खुद के पास बैठे सलाहकार की मदद ली जाये , आप इशारों में सामने वाले के सलाहकार को भी पटा सकते हैं.
इस खेल का सबसे बड़ा फायदा है आपको किसी मैदान की जरुरत नहीं , बस बैठने भर की जगह मिल जाये तो पूरा दिन आराम से खेल खेल में रुखसत हो जाता है. वो बैठने भर की जगह चाहे ट्रेन,बस,मंदिर,सड़क,घर,खेत कुछ भी हो इस खेल में उम्र और समय कि कोई सीमा नहीं होती,क्योंकि इसमे जिस्मानी ताकत की जरुरत नहीं होती इसलिए आप कैसी भी उम्र और कद काठी के साथी के साथ खेल सकते हैं ..खेलता जा बाजियों पे बाजियां

"विक्रम"

बुधवार, नवंबर 23, 2011

पिता



          पिता ,
         अपनी जड़ों को
         जमीन के सिने में
         पेवस्त कर बनाता है घरोंदा ,
         ताकि ,
         बचा रहे आँधियों से और ,
         सुरक्षित रहे ज़माने की
         बुरी नजर से
         और....
 



जूझता है ताउम्र ,
जीवन के उतार चढ़ाव से,
मां संग घर के रखरखाव में,
और.... ,
लड़ता है ताउम्र,
करता है खबरदार ! वो मेरे बच्चे हैं ,
दुनिया के बच्चों से बहुत अच्छे हैं ,
और..... ,
सर पर हाथ घुमाकर ...
बताता है जीने के उपाय
पलट पलटकर ,
अपने अनुभव की किताबें ,
जो खरीदी थी कुछ खट्टे मिट्ठे
अनुभवों के बदले ,
जिन्दगी से


कहता है ताउम्र,
सुनो बेटे ! ये दुनिया बड़ी बेरहम है ,
कल तुम अकेले हो ,आज भर को हम है,


और....

 
फिर.. ,
पास बैठाकर , सर पर हाथ घुमाकर ...
बताता है जीने के उपाय ,
पलट पलटकर ,
अपने अनुभव की किताबें ,
जो खरीदी थी कुछ खट्टे मिट्ठे

अनुभवों के बदले , जिन्दगी से .

"विक्रम"

सोमवार, नवंबर 21, 2011

वक़्त के अंधड़

नसीहत से सरोबर आवाज ,
पूर्वजों की...,
अकसर आती है..., जो ,
चोकस खड़े है,
आज भी.
उन वीरान खंडहरों के चहुँ और..,
....जिनको सींचा था ,
शाका और जौहरकी ज्वाला से..,
और बचाकर रखा था,
...ताकि सौंप सकें
भविष्य के हाथों में ...
और बचा रहे अस्तित्व ,
मगर आज .....?
लुप्त हो रहा है अस्तित्व ,
इन आँधियों में ,
सुनो ! ,

बुधवार, नवंबर 09, 2011

ठाकुर साहब की बारहवीं


आज ठाकुर साहब की हवेली पे लोगों की बहुत भीड़ थी रिश्तेदारों के साथ साथ गांववाले भी बड़े खुश नजर आ रहे थे हवेली के पिछवाड़े से मिठाइयों की खुशबु तथा मसालों की तीखी महक दूर दूर तक जा कर लोगों को खिंच खिंच कर हवेली ला रही थी सामने के हिस्से में बड़ा सा सामयाना लगा कर उसमे दरियाँ बिछा दी थी कुछ युवा मेहमानों के खाने पीने का जिम्मा संभाल रहे थे , तथा कुछ हलवाइयों के इर्द गिर्द रहकर उनको सामग्री मुहया करवा रहे थे ताकि खाने पीने के सामान की कमी ना हो , आखिर इज्जत का सवाल था कहीं कुछ भी कम हुआ तो परिवार वाले जिंदगीभर ताना देंगे की हमें खाने में वो नहीं मिला , या फिर देर से मिला , ताज़ा नहीं था आदि आदि|

सोमवार, सितंबर 26, 2011

टांग खींचना एक कला







टांग खींचना आजकल उच्च दर्जे की कलाओं में शुमार किया जाता है ये वो संपदा है जो कुछ नसीब के धनी लोगों को विरासत में और कुछ ने अपनी मेहनत से अर्जित की है आने वाले दिनों में इसको जीविका के मुख्य उद्गम के तौर पे देखा जा रहा है एक वक़्त था जब चमचागिरी का बोलबाला था तथा चमचा लोगों का यत्र तत्र सर्वत्र बोलबाला था


आजकल भी येदा कदा नजर आ जातें हैं मगर गुणवत्ता में वो पहले वाला निखरापन नहीं है मगर इसका मतलब ये कतई नहीं है की चमचों का अस्तित्व ही ख़त्म हो गया वो आज भी हमेशा की तरह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं , मगर इस बार उनका मुकाबला "टांग खिंचाऊं" संगठन से है जो अपने इस हुनर की बदोलत तेजी से फलफुल रहा है निकट भविष्य में टांग खींचने की इस कला पर काफी शोध होने है , और MBA जैसे संस्थान भी अपने अध्ययन में इस कला को इज्जत से नवाजेगें इस कला में अभी निपुण लोगों का आभाव है

मगर कोशिश जारी है, और जल्द ही इस विषय में पी.एच.डी की हुई पहली खेप बाजार में आएगी प्राचीन काल मे भी इसके सबूत मिलते हैं उस वक़्त ये कला अपने शैशव काल में थी और अलग अलग रूपों में विधमान थी मगर आज ये जवानी की दहलीज पे कदम रख चुकी है और अपने पुरे शबाब में हैं इसके अनुयायी प्राय: दो श्रेणियों विभाजित किये जाते हैं पहले नौसिखिये दर्जे के जो इस कला की ABCD सीख रहे हैं

दुसरे जो इस कला में पारंगत हैं नौसिखिये ज्ञानाभाव के चलते अक्सर बचकानी हरकत करते रहते हैं , उनकी हालत ऐसी होती है जैसे "बंदर के हाथ में आइना" ऐसे लोग टांग खींचने के साथ साथ सामने वाला का हाथ ,गर्दन ,बाल सबकुछ खींचने लगते हैं ,जिसके चलते कोई इनकी सेवा लेना उचित नहीं समझता दूसरी श्रेणी में पारंगत अनुयायी आते हैं जो सही मायनो में इस कला के सच्चे
पारखी है

इनकी सेवा लेने में बड़े बड़े उद्योगपति और राजनीतिज्ञ खासी दिलचस्पी लेते हैं,इसीलिए ये अमूमन मशरूफ ही रहते हैं इसका मुख्य कारण है कि जब अनुभवी लोग टांग खींचते हैं तो अपने पुरे तजुर्बे का इस्तेमाल करते हैं और उस वक़्त सामने वाले को पता ही नहीं चलता कि उनके निचे से टांगे निकाल दी गई हैं , और जब आभास होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है

"विक्रम"

बुधवार, सितंबर 21, 2011

दारु एक दवाई है करती चोखो काज



दारु एक दवाई है करती चोखो काज !
आज भर भर बोतल पिवन बेठ्यो समाज !
ई दारू में रजवाड़ा गया और गया राजाओ का राज !


अब भी सुधर जाओ थे मत होवो बर्बाद !
गहनों बिक गयो गांठो बिक्ग्यो बिकगी जमी जायदाद !
एक रिपिया री पैदा कोनी क्यूँ हो रया बर्बाद !

घरां पेली पावना आता बान चाय पानी री मनवार कराता !
अब मेहमाना न बोतल प्याओ !
नहीं मिले तो दो चार थैली ल्याओ !

नहीं मिली तो इज्जत जावे !
खाली रोटी घालता शर्म सी आवे !

पाड़ोसी के फोजी आयो दो चार बोतल जरुर ल्याओ !
कह लुगाई बेगा ल्याओ पावना न तो कीया जिया ही पाओ !

दारु आपां थ्री एक्स ले स्यां रिपिया रोकड़ी १५० देस्या !
रिपिया जेब में घाल्या घरां सु खाता खाता चाल्या !

घरां सु ठेके पर आया बा कुणसी है थ्री एक्स दे रे भाया !
घरां पावना आया चोखी दे जे रे भाया !

बाबोसा अबार ही गाडी आई थैली आपां २०० गिरवाई !
रिपिया में था सुं नगदी में ले स्या जना माल चोखो ही दे स्या !
दो चार बोतला अंग्रेजी में आई बे था खातर ही रखवाई !
बोतल कन्टेसा री आई बाने काढ पकड़ाई !

थैली दो दे दे कलासी बां न घाल ले स्यूं निरवाली !
थैली पेट में एक गेरी आयां हु गी घनी देरी !
घरां घरवाली खड़ी उडीके कठे आता दिखे !
आज सगली काली हु ज्यासी अब कुन सी हालत में आ सी !
अब मुस्किल सी घरां पुग्या घर का स लाल ताता हुग्या !

ले बोतला घरां पुग्या जना दो चार लुंका सागे हो ग्या !
आज पावना आया दिखे जना ही लुंका मन उडीके !
दो चार पेग मिल ज्य़ासी जना आज को काम बन ज्यासी !
अब बोतल अंग्रेजी री आई बोतल बाजोटा पर सजाई !

भायो गिलास कांच को ल्यायो लोटो पानी को पकडायो !
दारु गिलासा में घाली जतान प्लेट पापड की आली !
प्याला चाले है चोखा घरवाली बैठ गी है झरोखा !
अब सगा सगा करे है बात पीता पीता ढलगी रात !
अंग्रेजी दारु खत्म होगी अब खोल दी है थैली !


डाकिवाड़ो सूझ गयो आ ने आ शान कियां रेली !
टाबर फिरे आगे आगे कँवर सा रोटी कणा सी मांगे !
रोटी आधी रात मंगवाई बा भी ऊपर छात पर आई !
थाल बाजोटा पर आयो थाल ने चोखो घनो सजायो !
म्हारे घरां बटेऊ आया भोजन खीर खांड का बनाया !
फुलकी दूपडती बनवाई घी घाल र गल्घच करवाई !

सान्ग्र्या को रायतो बनायो टीटा को अचार !
अब पीकर हो गया बावला खानों गयो बेकार !

अब सगा गास्या दिरावे बेरियाँ ने मुंडा नजर न आवे !
सगा सगा आपस में बतलावे बात बा री समझ नही आवे !
अब रोटी जीमन रो होश नही है खानों निचे ढुल रियो है !
पीकर मतवाला बन गया है अन्न देव कियां रूस रिया है !

कुं विजेंद्र शेखावत (सिंहासन)

टीको टमको दायजो











टीको टमको दायजो !
बड़ियो घर घर आज !
फेल्यो सारे देश में !
दुखी फिरे समाज !

भेंस बिके पाडी बिके !
बिके जमीन जायदाद !
बेटा बेच बेच मोल ले !
आँ बापा लखदाद !

टुटयो आभो धरती घसगी !
कड़क बिजली घर में पड़गी !
बिगड्यो जापो पत्थर ल्याई !
करम फुट गया बेटी जाई !

सासु हाथ लगाया काना !
बड़ी जेठानी देवे ताना !
भुवा ननद ड्योढ़ी बोले !
हँसे देवरानी लुक लुक ओले !

सुसरो सुनी गाज सी पड़गी !
पूरा घर में सांस सी निकड गी !
उलटी रीत समाज री, करनी इणरी खोज !
बेटो जल्म्याँ हरख क्यूँ , क्यों बेटी ज्ल्म्याँ सोच !

दिन दिन बेटी बढ़ती जावे !
मान बापा ने सोच सी खावे !
जा ठुकरानी सा रोज जगावे !
आपने नींद क्यां री आवे !

स्यानी बेटी घर में मावे !
बात अनुती रोज सुनावे !
बाप निकल्यो टाबर दुंदन !
शहर गाँव री रोही खुदन !
सगा सम्बन्धी सारा पहुँच्यो !
जान आप री एक नही चुक्यो !

म्हारी घनी फूटरी बेटी स्यानी !
रंग रूप पदमनी रानी !
पढ़ी लिखी लक्षणा रो लाडो !
काम काज गुना रो गाडो !

आ बात कोई नही पूछे !
सम्बन्धी बात एक ही पूछे !
टीको टमको कतो क देस्यो !
ब्याव में खर्चो कतो क करस्यो !

बात सम्बन्ध री करने में !
हुवे है मोल और तोल !
खूब खरीदो टाबरिया !
ऊँची बोली बोल !

पढ़े पांचवी टाबर काणो !
मुंह ऊपर माता दानो !
महे बापजी बात नही खोली !
लागी पांच हजार री बोली !

छोड़ काणा न पढ़योडा रे पहुंच्या !
भाव सुन्या निहाल सा हु गया !

जाय कलेजे कीमत पूछी !
आँ को कीमत सब स्यूं ऊँची !

डिग्री दिख्याँ दायजो मांगे !
टीको और स्कूटर साधे !
कई कार बंगला रा भूखा !
देवे पदुतर लुखा सुखा !

कई बिलायत भेजे टाबर !
ओ खर्चो बेटी वालां पर !
कई बैंक रा नाम बतावे !
नाम टाबर रा चेक कटावे !

टाबर केवे देश में !
रिश्वत लेना पाप !
बिना पिसां पर्णा कोनी !
रिश्वत खोरा आप !

अब गांवड ल्या आगे आसी !
हर बातां में ऊँची जासी !
अब छोरियां आन्दोलन करसी !
बिकता टाबर नही परनसी !

अब तो छोरा ही चेत्या !
बिके नही बाप रे बेच्या !
अरं बापां थोड़ा सोचो !
बलद जियां क्यूँ म्हान बेचो !

बेटी वालो बेटी देवे !
ऊपर दान क्यां रो होवे !
बेटो घरां बाप के रहवे !
फेर कीमा क्यां री लेवे !

ऊँचा घर रो टाबर चावो !
तुला दान में सोनो ल्याओ !

बिकता मिनख बाजार में !
गुलाम जमाना माय !
आज पढ़या लिख्या बिक रहया !
आ तिलक दायजा माय !

जोड़ तोड़ इयान को बिठावे !
धन दायजो ज्यादा चाहवे !
कम मिल्या मन में पछतावे !
ले ले पिसा बेटा बयावे !

खून लाग री यो आंके मुंडे !
खरीददार बेटा रा ढूंढे !
बेटा बनया फिरे क्रांतिकारी !
अ बातां है आज्ञाकारी !

बुढलिया केवे देश में !
रिश्वत लने पाप !
बिना पिसा परना कोनी !
रिश्वत खोरा आप !

अब सारे देश में मातम छा गयो !
जिया तार मरण रो आ गयो !

नहीं हरख नही कोई हांसी !
सारे घर में घोर उदासी !
जापा वाली सिसक सिसक कर रोवे !
काचा जापा आख्याँ खोवे !

हिन्दू हाथ गाय सी मरगी !
कसूर कर दियो बेटी जन दी !

कुं विजेंद्र शेखावत (सिंहासन)

नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

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