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मंगलवार, जनवरी 03, 2017

MDH

पाँचवी क्लास पास व्यक्ति ने खड़ा किया , अरबों का साम्राज्य !
 
 

 
टीवी पर अक्सर रोज रोज देखकर आज मन मे "महाशय धर्मपाल गुलाटी" के बारे मे जानने की इच्छा हुई। काफी पढ़ा इनके बारे मे , उनका संक्षिप्त परिचय यहाँ लिख रहा हूँ। 
महाशियाँ दी हट्टी ( Mahashian Di Hatti - MDH) किसी परिचय का मोहताज नहीं । बँटवारे के वक़्त दर-बदर हुये इस परिवार मे उस वक़्त एक 23 साल का लड़का भी सियालकोट से भारत आया। परिवार का पेट भरने के लिए तांगा चलाया, मगर गुजारा नहीं हुआ। हार कर तांगा छोड़ा और अपना पारिवारिक धंधा मसाले बेचना शुरू किया , और आज वही लड़का 94 साल का "जवान" हो चुका है । हम लोग अक्सर टीवी पर धर्मपाल गुलाटी (महाशय धर्मपाल गुलाटी) को देखकर मज़ाक मे कुछ बोल देते हैं लेकिन इनके संघर्षों ने इन्हे आज इस मुकाम पर पहुंचाया है । जिसके पीछे ना उच्च शिक्षा है ना बाप-दादा की दौलत। अगर इस सफलता के पीछे कुछ था, तो वो था, इनका संघर्ष, सादगी, ईमानदारी और मसालों की गुणवता । सामाजिक कार्यों मे भी अच्छा खासा यीगदान है इनका , करीब 20 से ज्यादा स्कूल,कॉलेज,हॉस्पिटल हैं।

 
 

 
 
 

रविवार, नवंबर 13, 2016

भक्तगण कृपया ध्यान दें !


अगर आप अपने आपको निष्पक्ष मानते हैं, तो आपको अपने विरोधी द्वारा किए गए अच्छे काम की भी तारीफ करनी चाहिए।  मगर साथ ही  खराब  काम करने पर “अपने” की आलोचना से भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए वरना लोग आपको “भक्त” कहने लगेंगे। भक्तों के इस दोहरे रवैये से “भगवान” की इमेज खराब होती है । “भगवान” भक्तों की बदौलत है , ना की “भक्त” भगवान की बदौलत। इसलिए तारीफ वहीं करें जहां उचित हो, और जहां उचित ना हो वहाँ बगलें ना झाँकें बल्कि विरोध के सुर निकालें , नहीं तो लोग आपके माथे पर “भक्त” का लेबल चिपका कर निकल लेंगे ।

“भगवान” की ही नहीं खुद (भक्त) की भी स्व-समीक्षा (Self-Review) जरूरी है । अगर कोई सही काम करने पर भी “आपके भगवान” को गाली देता है तो उस नादान को माफ कर देना चाहिए । वैसे  भगवान भी की  गाली सुनने की लिमिट सौ गाली तक है , तो इस लिहाज से “भक्तों” को कमोबेश 50 के आंकड़े तक को धीरज रखना चाहिए । तदुपरान्त  हो सकता है विरोधी को आपकी चुप्पी खामोश कर दे। वरना कभी कभी इस “अंध-भक्ति” के चलते  कुछ भक्त” लोग आपस मे टकरा जाते हैं, क्योंकि कुछ अंधे होते हैं और कुछ आँखों (दिमाग) वाले।  


इसलिए , हे भक्त ! विचलित ना हो, अगर तुम्हें “भगवान” में सम्पूर्ण आस्था और विश्वास है तो इस माहौल को उसके हाल पर छोड़ दे , खराब मत कर । 
"विक्रम"

बुधवार, जून 05, 2013

चेन्नई का सापड़

सन 2003 मे मैं कंपनी के काम से पहली बार दक्षिण भारत (मद्रास चैन्नई) आया था। उस दिन ट्रेन अपने निर्धारित समय से करीब 2 घंटे लेट  थी। रात के करीब 10 बजे थे तो मैंने सोचा पहले खाना खाया जाए फिर कोई होटल तलाशता हूँ स्टेशन से बाहर आकर  सामने ही कुछ दूरी पर एक  रेस्टोरेन्ट मे चला गया। अंदर ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी बस  दो चार लोग ही बैठे थे । मैंने एक खाली टेबल देखा और अपने समान को पास रखकर वेटर का ऑर्डर लेने के लिए इंतजार करने लगा। तभी एक लड़का आया उसने केले का बड़ा सा पत्ता सामने टेबल पर बिछा दिया और एक प्लास्टिक का छोटा सा पानी का गिलाश भी रख दिया। में कुछ  कह पाता तब तक एक और वेटर आया और उस पत्ते के ऊपर चारों चारों तरफ 4, 5 कोई सब्जी जैसी सामग्री प्रसाद स्वरूप जल्दी जल्दी रखी और जैसे आया था वैसे ही जल्दी से चला भी गया । मेरे संभलने से पहले  एक और वेटर आया और उसने एक बड़े से स्टील के प्याले को अपने हाथ मे पकड़ी चावल से भरी बाल्टी मे डाला और चावल से लबालब भरकर उसे केले के पत्ते के बीचों बीच पलट दिया।
मैं मुँह खोल पता उस से पहले एक और वेटर आया और उसने एक जग जैसा कोई बर्तन अपने हाथ मे पकड़ी बाल्टी मे डुबोया और उसमे से सब्जी का ढेर सारा रस्सा  (सांभर) चावलों पे पलट दिया जिस से पत्ते पर बाढ़ जैसे हालत पैदा हो गए।  मैं जैसे तैसे करके सांभर के बहाव को चावल का बांध बनाकर रोकने की कोशिश करने लगा  मैंने आस पास नजर घुमाकर देखा की कहीं कोई मुझे इस हालात से दो चार होते हुये देख तो नहीं रहा। पास मे बैठे दो चार लोग जो अपने रंग-रूप की वजह से पक्के मद्रासी लग रहे  थे वो  कलाई तक अपने हाथ को चावलों के ढेर मे घुसेड़ कर खाने का लुत्फ उठा रहे थे। मैंने बड़े दीन भाव से वेटर की तरफ देखा जो पहले से मेरी तरफ बड़े कौतूहल से देखे जा रहा था। मैंने मिन्नत सी करते हुये चम्मच मांगी तो उसने मुझे ऐसे घूरा जैसे मैंने उस से पैसे मांग लिए हों। वो इंकार मे गर्दन हिलाकर एक और को चला गया।
गाँव मे छोटे थे तब बड़े बूढ़े कहते थे की राजपूत लोग पत्ते (पत्तल) पे खाना नहीं खाते। लेकिन जहां बर्तन के नाम पे चम्मच तक नहीं हो वहाँ समझौता करने के सिवा कोई चारा नहीं रहता। मैंने कभी ऐसे चावल नहीं खाये थे। हमारे इधर (राजस्थान मे ) साल मे सायद 2 या 3 बार किसी त्यौहार पर ही चावल बनते हैं और वो भी घी और खांड (चीनी) के साथ खाये जाते हैं।
खैर हर तरफ से मायूस होकर मैंने सामने पड़े ढेर मे स्वाद तलाशना शुरू किया। चावल को सभी सब्जी जैसे दिखने वाले पदार्थों के साथ अलग अलग मिलाकर खाने में कुछ खाने जैसा टेस्ट  परखने की कोशिश की। मगर काफी जद्दोजहद के बाद कुछ समझ नहीं आया तो आस पास बैठे लोगों को देखने लगा जो बड़ी तल्लीनता से चावल के ढेर को समेट रहे थे। मैं उनके खाने के तरीके की ऐसे नकल करने लगा जैसे परीक्षा हाल मे परीक्षार्थी करता है। काफी माथापच्ची के बाद पेट मे कुछ उतारने मे कामयाब रहा। मगर तभी सोचने लगा की  इस पत्ता रूपी प्लेट को भी कहीं खाना तो नहीं है ?  मगर तभी सामने देखा एक महाशय अपना खाना खत्म कर चुके थे और उन्होने अपने पत्ते को एक तह मे मोड़ा और टेबल पर रखकर खड़ा हो गया। मैंने भी  तुरंत उसकी देखा देखी अपने पत्ते को फ़ोल्ड किया मगर तभी पास आकर एक  वेटर बोल पड़ा। सापड़ नल्ला एल्लुवा ?’( खाना अच्छा नहीं क्या ?)। मेरी समझ नहीं आया तो उसने टूटी फूटी हिन्दी मे दोहराया। मैंने कहाँ , “अच्छा था। फिर उसने कहा की अगर खाना अच्छा लगे तो पत्ते को अपनी तरफ फ़ोल्ड करते हैं और अच्छा ना लगे तो दूसरी तरफ फ़ोल्ड करते हैं।
इस से पहले की कुछ और गलती हो जाए मैंने जल्दी से काउंटर पर  पेमेंट पूछा था पता चला खाने का बिल था सिर्फ 12 रुपए। मैंने भुगतान किया और होटल तलाशने निकल पड़ा।       
 

शनिवार, अक्टूबर 13, 2012

अस्पृश्यता


चित्र मे जो आप देख रहे हैं ये मेरे गाँव का एक पुराना कुआं है जो आज से करीब पच्चीस  साल पहले बहुत आबाद  हुआ करता था ।  एक जमाना था जब इसपर एक साथ चार  रहट चलते थे और लोग अपनी बारी के इंतजार मे इसके चारों और बने चबूतरे  पर रातभर बैठे रहते थे।   

आज से करीब 20 से 25 साल पहले अस्पृश्यता बहुत ज्यादा थी, जो आज के दौर मे थोड़ा सा कम  है। ऊंच-नीच, छुआ-छुत का काफी बोलबाला था।  ऊँची जाति के लोग (खासकर  ब्राह्मण,बनिये)  नीची जाति के लोगों के पास से निकलते हुये निश्चित दूरी बनाकर निकलते थे और किसी चीज के लेन-देन के वक़्त हाथों मे एक निश्चित फासला रखते थे। मगर हँसी तब आती थी जब कोई नीची जाति का  आदमी बनिये की दुकान से कुछ खरीदने जाता तो बनिया उसके हाथ से पैसे लेते वक़्त कोई फासला नहीं रखता मगर उसके बदले समान देते वक़्त फासला बना लेता। कभी किसी नीची जाति के किसी सदस्य को किसी ऊँची जाति के घर किसी काम से जाना होता तो वो वहाँ पहुँचकर  घर के बाहर ही खड़ा हो जाता , उसको अंदर आने मे झिझक होती थी , हालांकि मैंने कभी सुना नहीं की किसी ऊँची जाति के आदमी ने उसको अंदर आने से मना किया हो , लेकिन लोगों ने अपनी धारणा कुछ ऐसी बना ली थी। ना कभी  नीची  जाति के लोगों ने  आगे बढकर इस अस्पर्शयता की दीवार को लांघने  की हिमाकत की और ना ही ऊँची जाति के लोगों ने इस दीवार की गिराने की।
...ऊँची जाति के लोग (खासकर ब्राह्मण,बनिये) नीची जाति के लोगों के पास से निकलते हुये निश्चित दूरी बनाकर निकलते थे और किसी चीज के लेन-देन के वक़्त हाथों मे एक निश्चित फासला रखते थे। मगर हँसी तब आती थी जब कोई नीची जाति का आदमी बनिये की दुकान से कुछ खरीदने जाता तो बनिया उसके हाथ से पैसे लेते वक़्त कोई फासला नहीं रखता मगर उसके बदले समान देते वक़्त फासला बना लेता।  

पानी की सतह  उन दिनों करीब सौ हाथ पे होती थी, यानि 150 फीट के आस पास। इसके आमने सामने के मुख्य भाग पे  पत्थर की बड़ी बड़ी सिलाओं  पे दो दो रहट आमने सामने लगे रहते थे । उस वक़्त इसका नाम “चार भूण (रहट) वाला कुआ” था जो आज भी वही है।  दाईं तरफ के दोनों रहट ऊंची जाति के लोगों के लिए थे और बायीं तरफ के दोनों रहटों में से एक ज्यादा नीची जाति और दूसरा कम नीची जाति के लिए आवंटित था।

ऐसा ही कुछ कुए से पानी निकालते  वक़्त होता , ज्यादा भीड़ होने पे ऊँची जाति के लोग नीची जाति वाले रहट की तरफ खिसकने लगते । चूंकि नीची जाति के लोगों की संख्या कम थी तो वहाँ भीड़ नहीं रहती थी। जब वहाँ नीची जाति के लोग नहीं होते तो ऊँची जाति वाले उस जगह पे थोड़ा पानी छिड़कते और उसके बाद अपने मटके वहाँ रख लेते। लेकिन कभी किसी का ध्यान उस तरफ नहीं गया की आखिरकार पानी तो उसी कुए से आता है  जिसमे दोनों जाति के लोगों की  रस्सी से बंधे बर्तन (डोल ) डुबकी लगाकर बाहर आते हैं। कभी कभी दोनों जातियों की रस्सियाँ और डोल अंदर आपस मे उलझ जाते और ऊपर आने पर वो अपनी अपनी रस्सियाँ अलग करके फिर से पानी खींचने मे लग जाते ।

ऐसा ही हाल कुए के बगल मे बने मंदिर में था। ऊँची जाति के लोग बड़े मजे से मंदिर के अंदर जाकर भगवान के दर्शन और पुजा-अर्चना कर  लेते थे मगर नीची जाति के लोगों के लिए मंदिर की सीढ़ियों के पास ही एक जगह निर्धारित की हुई थी जहां खड़े होकर वो “ऊँची जाति के  भगवान” की एक झलक पा लेते और वही से पूजा-अर्चना कर वापिस लोट जाते ।   

मतलब उस वक़्त मौकापरस्ती वाली छुआ-छूत थी। अगर समय है तो जात दिखाओ अन्यथा गर्दन नीची करके काम निकाल लो।  अब वक़्त ने करवट बदली है , बिजली पानी मे कुछ सरकारी दखलंदाज़ी होने से अब पानी खींचना नहीं पड़ता।   आज कभी गाँव जाता हूँ तो देखता हूँ तो वही नीची जाति के लोग जो घर के अंदर आने मे झिझकते थे आज बे-धडक अंदर आ जाते हैं और इशारा पाने पर पास रखी कुर्सी या स्टूल पे धडल्ले से  बैठ जाते हैं। हाथ मिलाना,साथ चलना तो आम हो गया। कुए की जगह अब पानी की टंकियाँ बनी है जिसमे नल लगे हैं मगर अब उन नलों  का जाति के हिसाब से बंटवारा नहीं किया गया। ये सामाजिक बदलाव की पहल वक़्त ने की है न की किसी जाति विशेष ने।

"विक्रम"

शनिवार, अक्टूबर 06, 2012

मोटापा

(चित्र आभार गूगल)

आज प्रातकल पार्क में भ्रमण के दौरान बैंच पर फैले एक बारह तेरह साल के  स्थूलकाय  बच्चे ने मुझे घूमते हुये देखकर  कहा ।

“हैलो अंकल ! वाकिंग ?”

“येस” , मैंने उसके  शरीर की थुलथुलाहट से प्रभावित होकर  बड़ी विनम्रता से मुस्करा कर जवाब दिया।

“गुड...गुड  .... कीप इट अप” , उसने मेरी तरफ “थम्स-अप” का इशारा करते हुये मुझे प्रोत्साहित किया , और अपने शरीर को नजरंदाज कर मेरी चिंता मे कुटिलता से  मुस्कराता रहा।
...उसका सीना लटककर पेट के हिस्से पे काबिज हो गया था। पेट सामने की तरफसे नीचे खिसककर कटि-क्षेत्र मे घुसपेट कर चुका था, जिससे उसके संवेदनशील हिस्से अपना अस्तित्व खोते जा रहे थे। 

इस उम्र मे ही उसका वजन अस्सी के आस  पास रहा होगा , यानी लगभग मेरे बराबर। उसका सीना लटककर पेट के हिस्से पे काबिज हो गया था।  पेट सामने की तरफ से नीचे  खिसककर कटि-क्षेत्र मे घुसपेट कर चुका  था, जिससे उसके  संवेदनशील  हिस्से अपना अस्तित्व खोते जा रहे थे।  उसके गले की मोटाई ने सुराहीदार गर्दन या लंबी पतली गर्दन की कल्पनाओं को सिरे से खारिज कर दिया था। उसके मुस्कराने से उसके मोटे शरारती गालों को लुप्तप्राय हो चुकी नाक को चूमने का बहाना मिल जाता था  घर में पूजा या किसी अन्य धार्मिक उत्सव के दौरान उसकी कलाई पे बंधा  लाल धागा उसके हाथ के लटके मास में फंसा अपनी बेबसी पे  मुझे  ताक  रहा था।  मगर इन सबके बावजूद उसे में मोटा नजर आ रहा था।

मेरी तरफ फेंकी गई उसकी कुटिल मुस्कान ने मुझे हैरत मे डाल दिया। मैंने थोड़ा आगे जाकर उसकी नजरे बचाकर अपने शरीर का मुआइना किया। शरीर के दायें बाएँ हल्का सा उभार सिर उठाने लगा था मगर वक़्त की नजाकत के मद्देनजर उसे छुपाया जा सकता था।  हालांकि इन सबके बावजूद मुझमे भी आंशिक रूप से  मोटापे के  आसार नजर तो आते हैं लेकिन फिलहाल सभी हिस्से अपनी यथास्थिति बनाए हुये  हैं।

मैंने सोचा जब इसे या इसके आविष्कारकों को इसके मोटापे की चिंता नहीं तो में क्यूँ बे-वजह अपने पाल पोसकर बनाए  शरीर पे  अत्याचार करूँ ?


“विक्रम”


  

शनिवार, अगस्त 11, 2012

छोडो बेकार की बातों को - Circle of Concern


आज हम ज्यादातर उन बातों के बारें में सोचते हैं जो हमारे हाथ  में ही नहीं है , मगर बवजूद इसके हम अपनी एनर्जी बेकार की बातों में जाया करते हैं जैसे ,अन्ना ने अनशन क्यों तोड़ दिया ?  दिग्गी इतना क्यों बोलता है ? बारिश  होगी  या नहीं ?,  इंडिया  मैच  जीतेगी  या नहीं ? , सचिन १०० बना पायेगा या नहीं ? सरकार, महंगाई, अन्दौलन, हिंसां, मौसम  आदि . इसको  कहते हैं "सर्कल ऑफ़ कन्सर्न ".


एक होता है "सर्कल ऑफ़ इन्फ्लूअन्स (Circle of Influence) " और एक होता  है "सर्कल ऑफ़ कन्सर्न (Circle of Concern) ". दिए गए चित्र में आंतरिक घेरा  "सर्कल ऑफ़ इन्फ्लूअन्स" और  बाहरी  घेरा "सर्कल ऑफ़ कन्सर्न" कहलाता है . हर  इंसान इन दो चक्रों  में  जीवनभर घिरा रहता है .


"सर्कल ऑफ़ इन्फ्लूअन्स"  आपका कार्यक्षेत्र है जिसमे आपका पूरा प्रभाव रहता है , जिसपे  आपका नियत्रण है  और  आप जो चाहे उसमे कर सकते हैं . खुशियाँ, परिवार, बच्चे, आमोद-प्रमोद सब इस अन्दर वाले मगर छोटे से चक्र में हैं जो बाहरी चक्र के दवाब में लगातार छोटा होता जा रहा है . इसमे किये गए कार्यों से आपको आत्मसंतुष्टि मिलती है . इसके विपरीत "सर्कल ऑफ़ कन्सर्न "  वो घेरा है जिसके बारे में आप सोच सोच कर परेशान रहते हैं और जो आपके कार्यक्षेत्र से बाहर है .और इससे सम्बंधित  मुद्दे आपके "सर्कल ऑफ़ इन्फ्लूअन्स" के चक्र को छोटा और "सर्कल ऑफ़ कन्सर्न " को बड़ा कर देते हैं और नतीजन आप और चिंतित रहने लगते हैं  .

इसलिए बेहतर है आप अपने आंतरिक चक्र को बड़ा आकार दें जिस से आपके "सर्कल ऑफ़ कन्सर्न ". कम हो जायेंगे जिससे आप और बेहतर ढंग से जीवन-निर्वाह कर सकेंगे .

"कुछ तो लोग कहेगें, लोगो का काम कहना, छोडो बेकार की बातों को, कहीं बीत न जाए रैना,....... "



-"विक्रम" 11th Aug'12

रविवार, अप्रैल 08, 2012

मेहमानवाजी

सुना है आज पड़ोसी मुल्क से कोई बहुत बड़ी हस्ती का पदार्पण होने वाला है . मिडिया से लेकर सरकारी तंत्र तक पलक पावड़े बिछाये बैठा है.वैसे तो इस पड़ोसी मुल्क से अक्सर आतंकवादी ही इधर घुमने आते हैं, मगर इस बार एक खीसे निपोरते हुए एक राष्ट्रपती आ रहा है , वो आ तो रहा है अपनी निजी (धार्मिक) यात्रा पे जियारत के लिए मगर हमारे नेता तलुवे चाटने का ये हसीन मौका हाथ से नहीं जाने देंगे . तलुवे चाटते हुए चाटुकारिता भरी हुई नज़र से अमेरिका को देखेंगे और मन ही मन कहेंगे की 'देखो ,जैसा आपने कहा उस से भी ज्यादा कर रहे हैं '.

टीवी पे सुबह से उसके कार्यक्रम का एक एक पल का व्रतांत सुनाया जा रहा है . (मेरा ये लेख लिखे जाने तक वो बाथरूम में सायद नहा रहा है ) . दोपहर के खाने के मेनू में ऐसे ऐसे व्यंजनों के नाम गिनाये जा रहे हैं जिनमे बहुतों के कभी नाम सुने ही नहीं . खाने में  शाकाहारी ,मासाहारी दोनों ही शामिल किये गए है . जो इस प्रकार हैं :
शाकाहारी व्यंजन : मेलन-मिंट का ठंडा सूप, सरसों के फूल, सब्ज शम्मी कबाब, मिनी मसाला डोसा, तोरई भुजिया, मकई पालक, भिंडी कुरकुरी अवियाल, मंूग दाल तड़का, सब्ज बिरयानी, कई तरह की रोटियां, ब्लूबेरी मूसे, गुड़ का संदेश, फिरनी, फल।
मांसाहारी व्यंजन : जैतूनी मुर्ग सीख, गोश्त बड़ा कबाब, करेली दाल गोश्त, मुर्ग कोफ्ता मखनी, सिकंदरी खुश्क रान, कच्ची गोश्त बिरयानी।

बेचारी जनता को अप्रत्यक्ष रूप से बता दिया गया है की कम से कम आज के दिन अपना मुंह बंद रखे और रोज की तरह भ्रष्टाचार,महंगाई ,बिजली,पानी की चिल्लमचिल्ली मचाकर मूड ख़राब न करे . हमारे नेता मेहमान नवाजी में हमेशा अव्वल ही रहे हैं , पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति के स्वागत लिए दिन रात एक कर दिया था ,मगर हाथ कुछ नहीं आया . खैर वो तो शक्तिशाली राष्ट्र का शक्तिशाली नुमाईन्दा था मगर ये साहब जो आज तसरीफ ला रहे हैं इन बेचारों की तो कभी अपने घर में भी नहीं चली . पिछले दिनों मुशरफ आया तो तोहफे में कारगिल दे गया , अब देखते हैं ये साहब क्या तोहफा देते हैं.

बहुत दुःख होता है ,दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अमन शांति के लिए दहशतगर्दों के आगे हाथ फ़ैलाने पड़ते हैं. हर बार अपनी तरफ से शांति की पहल करके हम अपन कह्जोरी ही जता रहे हैं . हम कमजोर नहीं हमारी नुमाइंदगी कमजोर है जिसकी बदौलत कारगिल, संसद, 26 /11 ,आगरा क्रिकेट, अजमेर, हाफिज़ सईद ......जैसे शब्दों की इबारत लिखी जाती है .



गुरुवार, जनवरी 12, 2012

उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत



में उत्तर भारत से सम्बन्ध रखता हूँ मगर पिछले लगभग एक दशक से दक्षिण भारत में रह रहा हूँ .इस दौरान मैंने उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में बहुत सा फर्क देखा है , जिसमे खान पान, रहन सहन , वेशभूषा से लेकर आचरण तक शामिल है .आज में कुछ खास बातों का जिक्र करूँगा जो हमें उत्तर भारत में देखने को नहीं मिलती.यहाँ के लोग बहुत धर्मिक प्रवर्ती के होते हैं . यहाँ पर चोरियां बहुत कम होती है. लोगों को सरेआम झगड़ते हुए शायद ही कभी देखा जाता है . बस या रेल की टिकिट के लिए आपको बहुत कम इन्तजार करना पड़ता है , तथा टिकिट के लिए आपको छुट्टे पैसे देने के लिए मजबूर नहीं किया जाता जैसा की उत्तर भारत में अमूमन देखा जाता है . यहाँ के सरकारी कर्मचारी भी आप से बहुत अपनत्व से बात करते है .


नई तकनीक को इन राज्यों ने बहुत अपनाया है , राशन कार्ड , गैस बुकिंग ,टिकटिंग ,टैक्स , टेलीफ़ोन बिल जैसे काम ऑनलाइन कर सकते हैं .शिक्षा के क्षेत्र में तो दक्षिण भारत के ये ४ राज्य सदा अवल ही रहे हैं . अकेले कर्नाटक में इतने इंजीनियरिग कोलेज हैं जितने पुरे भारत में नहीं होंगे .


एक से एक भव्य मंदिर यहाँ के हर शहर में देखने को मिलेंगे , मगर एक बात जो यहाँ चुभती है वो है मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए आपको पैसे देने पड़ते हैं . और उसपे भी अगर आपको दर्शन करने की जल्दी है तो आप जितने ज्यादा पैसे देंगे उतनी जल्दी आपको दर्शन करने को मिलेंगे . मंदिरों में दान देने के मामले में यहाँ के लोग सबसे आगे हैं .

कोई चाहे कितना भी गरीब हो अगर उसकी मनोकामना पूर्ण हो गई तो वो अपने पास के पुरे पैसे जेवरात तक मंदिर के दान बॉक्स में डाल देता है , यानी भगवान को दान देने में तो भामाशाह जैसा दिल है .तिरुपति बालाजी का मंदिर पूरी दुनिया में सबसे धनाढ्य मंदिर है , जहाँ साल में करोड़ो रुपयों के तो बाल बेचे जाते हैं जो दर्शनार्थियों द्वारा मुराद पूरी होने पर कटवाए जाते है. यहाँ तक की औरतें भी अपने पुरे बाल कटवाकर आती हैं मंदिर में . यहाँ पर ९०% लोग सुबह पूजा करने के बाद ही चाय नाश्ता करते हैं पूरा परिवार सुबह नहाकर पूजा करता है . औरतें बिना घर के आगे रंगोली बनाये कोई काम नहीं करती , उनके द्वारा कुछ ही मिनिटों में घर के आगे बनी गई रंग बिरंगी रंगोली हर किसी का दिल मोह लेती है .

चाय से लेकर सब्जी बेचने वाला तक अगर हिंदी ना भी समझे तो भी आपको अंग्रेजी में वन टू थ्री बोलकर समझा देगा , लेकिन ज्यतादर आपसे हिंदी में वार्तालाप की कोशिश करेंगे . क्या हम उत्तर भारत में कभी किसी दक्षिण भारतीय से उसकी भाषा में एक शब्द भी बोलते हैं ? नहीं


शराब के मामले भी दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत के लोगों से आगे हैं .पूजा पाठ के साथ शराब के भी बहुत शौकीन है यहाँ के लोग यहाँ पे आपको जहाँ शराब का ठेका मिलेगा उसके आस पास कोई ना कोई मंदिर भी जरुर मिलेगा , और दो चार कदम पे मीट की दुकान भी मिलेगी यानी धर्म और निजी जीवन दोनों का बखूबी तालमेल यहाँ देखने को मिलेगा .दक्षिण भारत के ४ राज्य ( आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु,कर्नाटका और केरल ) बाकि देश से कुछ बातों में काफी भिन्न है .तमिलनाडु में हिंदी भाषी लोग ना के बराबर है. पुरे तमिलनाडु में आपको सायद ही कोई हिंदी बोलने या समझने वाला मिलेगा लेकिन इसके विपरीत आंध्रप्रदेश,केरल और कर्नाटका में हिंदी की स्थिति बेहतर है . एक और खास बात है जो  में  आपसे  बाँटना  चाहूँगा  वो है   इन चारों  राज्यों की अलग अलग भाषा. उत्तर भारत  में अधिकतर राज्यों की भाषा एक दुसरे से मिलती जुलती है ,या फिर वो हिंदी बोलकर एक दुसरे से संवाद कर लेते हैं . मगर इधर एक दुसरे की भाषा बिलकूल नहीं समझते ,यहाँ तक की लिपि भी पूरी तरह से अलग है .

 
खान पान के मामले में ४ राज्यों में चावल और चावल से बने अन्य पकवान ही बहुतायत में मिलेंगे केरल में नारियल का तेल सब्जी बनाने में उपयोग में लाया जाता है जो को उत्तर भारतीयों को शायद

ही पसंद हो , दक्षिण भारत में कुछ खास पकवानों के नाम इस तरह हैं , लेमन राईस ,सांभर राईस , इडली , मेदू वडा , रश्म ,डोसा ,उपमा , पोंगल आदि मगर इन सब में ९९% चावल और नारियल जरुर मिलेगा .




यहाँ के त्यौहार भी अलग ही हैं पोंगल, ओणम ,पूरम ,चितिरै कुछ खास त्यौहार हैं . उत्तर भारत की तरह यहाँ होली दिवाली जैसे त्यौहार को लोग कम जानते है इसलिए ना के बराबर ही मनाते है .यहाँ तक की दक्षिण भारत में  पंचाग भी अलग होता है.

मगर चाहे जो भी हो , यही तो पहचान है हिंदुस्तान  की . "विभिन्नता  में एकता "

//विक्रम//


शुक्रवार, दिसंबर 16, 2011

ब्लोगिंग वार ( तीसरा महायुद्ध )

इन्सटाइन ने कहा था की तीसरे युद्ध का तो पता नहीं मगर चौथा पथरों से लड़ा जायेगा.लेकिन आजकल तीसरे युद्ध की शुगबुगाहट शुरू हो गई है.इस युद्ध में किसी अस्त्र शस्त्र की जरुरत नहीं और ना ही किसी परमाणु या ड्रोन की , ये तो चुपके चुपके लड़ा जा रहा है.

आमतौर पर हर युद्ध के पीछे कोई ना कोई कारण होता है , और ठीक उसी तरह इसके पीछे भी कई कारण है. आज भाषा , राज्य ,धर्म और धार्मिक ग्रंथो के नाम पे लड़ा जाने वाला ये है ब्लोगिंग वार. अगर आपकी भाषा सामने वाले से मिलती नहीं तो आप उसके ऊपर कमेन्ट करते हो ,आपका राज्य ,धर्म सामने वाले से अलग है तो आप उसपे टिक्का टिप्पणी करते हो , सामने वाले के ग्रंथों में कही गई बातों को ब्लॉग में उठाकर बहस खड़ी  करते हो.



मैने कुछ ब्लॉग में पोस्ट पढ़ी तो पाया की ब्लॉगर ने इतना गहन शोध अपने मजहब की पुस्तकों को पढनें में नहीं किया होगा जितना दुसरे मजहब की पुस्तकों में, और वो भी सिर्फ इसलिए , की कुछ मसाला मिले जिसे अपने ब्लॉग में लगा सके . दुसरे के धार्मिक ग्रंथों से अच्छी बातें उठाने की जगह कुछ भर्मित तथ्य उछाल कर हंगामा खड़ा करने वाले कोनसे युद्ध की तैयारी में लगे हैं भगवान जाने .

कमोबेश धार्मिक ग्रंथों में कुछ ना कुछ ऐसा जरुर है जो आज सभी को हजम नहीं होता ,कुछ इसको धार्मिक ग्रंथों से की गई छेड़-छाड़ बतातें हैं , कुछ इसको अपने तर्कों से सही ठहराता है .आज एक ब्लॉगर की एक सवेंदनशील टिप्पणी ,हजारों लोगों में शब्दों की खामोश बहस खड़ी कर देती हैं . निकट भविष्य में येही ख़ामोशी तूफान से पहले की ख़ामोशी सिद्ध होगी . फिर आखिर लोग इस तरह के वक्तव्य देकर कोनसी मंजिल पा लेना चाहते हैं.? क्या प्रसिद्धी के लिए इंसानों को गुमराह किया जा रहा है. ? क्या गुमराह होने वाले लोगों की अपनी कोई राय या सोच नहीं क्या उनके पास अपना दिमाग नहीं.? क्यों लोग ऐसे समाज कंटकों की किसी भी बात को सच मान भ्रमित हो जाते हैं.? किया उन्हें अपने धार्मिक में कहीं बातों पे विश्वास नहीं. ? अगर ऐसा है तो क्यों नहीं "इंसानियत धर्म" को अपनाया जाये , जिसमे आपसी भाईचारे  से नकारात्मक   सोचों को धोया जाये.?

अपने धर्मं को ऊँचा और दुसरे के धर्म को नीचा बताने वालों पहले जरा खुद तो इस ऊँच-नीच से  बाहर निकलों ताकि अपने वजूद से रूबरू हो सको .बस एक बार दुसरे के मजहब की इज्जत कर, और फिर देख ,वो तुझे और तेरे धर्म को कितनी इज्जत बक्सता है.
"विक्रम"

रविवार, नवंबर 27, 2011

गाँवों की फेसबुक (ताश)



आजकल ताशबूक का चलन पहले की अपेक्षा काफी बढ़ गया है आज जिस तरह क्रिकेट सभी खेलों पर हावी हो रहा है उसी तरह ताश भी बाकि खेलों जैसे चोपड़,लूडो,शतरंज पर हावी हो चुकी हैं. चोपड़ बहुत पुराना खेल है , जो राजा महाराजाओं के दौर में चरम सीमा पे था , मग़र आज अपना अस्तित्व खो रहा है. मुझे याद है आज से करीब २० साल पहले हमारे गाँव में बुजर्ग लोग बहुत जोश खरोस से दिनभर चोपड़ खेलते थे. वक़्त के साथ साथ हर चीज बदलती है , मगर कुछ का खाली स्वरूप ही बदलता है और वो लम्बे समय तक अपने अस्तित्व में रहती हैं.

इस जद्दोजहद में ताश क खेल अपना अस्तित्व बचाए रखने कामयाब रहा इसका मुख्य कारण है भिन्न भिन्न प्रकार की पारियां जो इसमे खेली जाती हैं. पहले गिनती के तीन या चार खेल ही थे जो अक्सर खेले जाते थे. वक़्त के साथ साथ लोग उन खेलों से बोर होने लगे थे की अचानक एक क्रांति का आगाज हुआ और अनेकों नई नई तरह के खेल खेले जाने लगे

ऐसा नहीं की नए खेल आसमान से टपके थे , वो पहले भी थे ,मगर एक सिमित क्षेत्र में, वक़्त के साथ साथ यातायात के साधनों की बहुतायत ने दूरियों को कम किया और लोग एक दुसरे के जुड़ने लगे. कहते हैं खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है , ठीक उसी तरह हम भी एक दुसरे के रहन सहन , खान-पान से प्रभावित हुए एक दुसरे की देखा देखी परिवर्तन शुरू किये तो जिन्दगी में भी परिवर्तन का दौर चल पड़ा . आज ताश में ऐसे ऐसे नए खेल आ गए हैं की दिनभर उनके पास बैठे रहो मगर फिर भी भेजे में कुछ नहीं आयेगा. पहले के खेलों में रमी,फ़ीस,तीन-दो-पांच,रंग आदि काफी मशहूर थे जिनमे प्राय: दो,तीन या चार जन खेल सकते थे , मगर आज तो अकेला बंदा भी पूरी तन्मयता से खेलता हुआ मिल जायेगा. अब वो क्या खेलता है ये तो पता नहीं मगर जब तक कोई दूसरा निठल्ला ना मिले तो अकेले खेलकर थोडा अभ्यास करने में क्या हर्ज़ है .

गर्मियों में ताश का खेल अपने पुरे यौवन पर होता है ,चाहे कितनी ही गर्मी हो , कितनी ही लू चलें मगर ताश खेलने वाले पूरी श्रर्दा से खेलते हैं. खेल के दौरान घर से काफी बुलावे आते हैं , मगर "आता हूँ , अभी आया , तुम चलो में आता हूँ " कहकर फिर से ताश वंदना शुरू हो जाती है. खेल के दौरान सलाहकारों की भी भरमार रहती है , जो बिना मांगे सलाह की बौछारें फेंकते करते रहते हैं .

इस खेल में साम दाम दंड भेद , सभी हथकंडे अपनाये जाते हैं अपने साथी से गुप्त इशारों में ही हाथ मे पकडे पतों के ब्यौरे का आदान प्रदान हो जाता है कुछ नौसिखिये अक्सर पकडे जाते हैं तो दंडस्वरूप उनको फिर से पत्ते बाँटने जैसी सजा मिलती है. मगर सबकुछ इशारों में ही संभव नहीं होता तो ऐसे हालात में सलाहकारों से सलाह ली जाती हैं जरुरी नहीं की खुद के पास बैठे सलाहकार की मदद ली जाये , आप इशारों में सामने वाले के सलाहकार को भी पटा सकते हैं.
इस खेल का सबसे बड़ा फायदा है आपको किसी मैदान की जरुरत नहीं , बस बैठने भर की जगह मिल जाये तो पूरा दिन आराम से खेल खेल में रुखसत हो जाता है. वो बैठने भर की जगह चाहे ट्रेन,बस,मंदिर,सड़क,घर,खेत कुछ भी हो इस खेल में उम्र और समय कि कोई सीमा नहीं होती,क्योंकि इसमे जिस्मानी ताकत की जरुरत नहीं होती इसलिए आप कैसी भी उम्र और कद काठी के साथी के साथ खेल सकते हैं ..खेलता जा बाजियों पे बाजियां

"विक्रम"

रविवार, सितंबर 11, 2011

Lifestyle बनाम जीवनचर्या




अक्सर शहर के लोग गाँव वालो को हिकारत की नजर से देखते हैं और उनको गवार समझते हैं।  कुछ समझदार शहर वाले तरस खाने वाले अंदाज में उनसे बात करते हैं गाँव के लोगो को आभाव में जीवनयापन करना पसंद। है वो बेकार के तामझाम को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर अपनी शांति में खलल डालना पसंद नहीं करतेमगर शहर के लोग कभी समझोता नहीं करते दिन रात ऐशोआराम  के बहाने तलाशने वाले चैन की नींद को तरस जाते हैं |

 

बड़े गाँव में ४०० से ५०० तक परिवार रहते हैं और वो हर एक सदस्य के बारे में खबर रखते हैं।  और एक दुसरे के सुख दुःख में  हर वक़्त तत्पर रहते हैं आज शहरों में बगल वाले मकान में कोन  रहता है।  पता नहीं अकेले रहने वाले बुजर्ग घरो में ही दफ़न हो जाते हैं।  बरसो बाद कोई आता है तो उनका कंकाल ही मिलता है। बच्चे  आज कल माँ-बाप को अकेला छोड़ विदेश चले जाते हैं , और बड़े बुजर्ग उनका इन्तजार करते करते दुनिया छोड़ देते हैं।  किस काम का ऐसा जीवन और एसोआराम ? अपने शरीर को आराम देना ही सच्चा सुख नहीं कभी अपनी आत्मा ,अपने दिल और दिमाग को भी उस  परमसुख की अनुभूति होने दो जिसका वो हक़दार है| आज में जहा रहता हूँ उसी अपार्टमेन्ट में 5 और परिवार रहते हैं , सभी के आने जाने का रास्ता एक ही है मगर बरसों गुजर जाते है एक दुसरे को देखे हुए बरसों बाद कभी आते जाते हलके से हाय हैलो या एक दुसरे की तरफ मुस्कराभर देते हैं।  इसके सिवा कोई सम्बन्ध नहीं है गावों में इसके विपरीत है , आप किसी को एक दिन ना देखे तो पूछने लगते है "वो आज कल दिखाई नहीं दे रहा" जब तक किसी से मिलकर दो चार घंटे बिता नहीं लेते चैन नहीं आता।  


शहर के लोगो के साथ एक बात और भी है और वो है समय का आभाव  हफ्ते में ६ दिन तो सुबह से रात होने तक घर चलाने के जुगाड़ में  लगे रहते हैं। छुट्टी के दिन लम्बे समय से बकाया कामों का निपटारा  कभी भूले भटके कम से छुट्टी ले भी ले तो बेचारे को १० कम निपटने  होते हैं , जैसे बिजली का बिल , गेस की बुकिंग , बच्चो के फ़ीस , राशन ,पानी,शोपिंग आदि  आदि।

 
मगर गाँव में लोगो की ऐश ही ऐश है  सही मायने में एक सही जीवन वो ही जी रहे हैं , मगर पता नहीं शहर वाले उनको "बेचारा" क्यों समझते हैं ? मगर शहर के लोगो के कुछ खास दोस्त भी है जो  अक्सर जीवनभर उनके साथ रहते हैं जैसे दिल, किडनी, रक्तचाप, मधुमेह की बीमारी।  गाँव के लोगो में बहुत कम देखने को मिलते हैं ये अनचाहे दोस्त, क्योंकि गाँव के लोग मेहनत ही इतनी करते हैं की ये अनचाहे दोस्त टिक ही नहीं पाते उनके साथ ।

आप सोचिये कहाँ रहना पसंद करेंगे ?
 




"विक्रम"

शनिवार, सितंबर 03, 2011

Windows 7 - Windows XP - Office 2010


  1. काफी इंतजार के बाद गूगल ने अपनी गूगल ड्राइव सर्विस लांच ही कर दिया, गूगल की नई गूगल ड्राइव की मद से यूजर वीडियो, गैलरी के अलावा डाक्यूमेंट को अपनी गूगल ड्राइव में अपलोड कर सेव कर सकेगा

    http://howto.cnet.com/8301-11310_39-57419559-285/how-to-get-started-with-google-drive/

    Get introduced to Google's new cloud storage service and find out how to start syncing and managing your files, photos, videos, and more.



1.Learn how to install Windows 7
Installing and reinstalling Windows 7
Windows 7 installation how-to, step by step - Computerworld
How to Install Windows 7

http://windows.microsoft.com/en-US/windows7/Installing-and-reinstalling-Windows-7
Windows 7 installation how-to, step by step - Computerworld
How to Install Windows 7
How to Create a Bootable Windows XP Setup CD/DVD from a Pre ...

how to format and install windows xp This explains step-by-step how to format hard drive partition using the Windows XP installation CD

How to format a computer and Reinstall Windows
How to Format Hard Drive and Install Windows Operating System
Format hard drive, reinstall Operating System,partition hard disk
how to format only 'C' drive
How to partition and format a hard disk by using Windows XP Setup ...
How to partition and format a hard disk by using Windows XP Setup ...


2.Remove Internet Explorer 8 and restore
How do I remove Internet Explorer 8 from Windows as a ...
Uninstall, Disable, or Delete Internet Explorer 8 from Windows 7 ...
How to remove internet explorer 8, and install internet explorer 7 ...
How do I remove Internet Explorer 8 from Windows as a ...
Uninstall, Disable, or Delete Internet Explorer 8 from Windows 7 ...
How to remove internet explorer 8, and install internet explorer 7 ...




3. Google Appsa
How to Buy Additional Google Apps Licenses : KnowledgeBase
Google Apps for Business | Purchase Google Apps Premier
How to Buy Additional Google Apps Licenses : KnowledgeBase
Google Apps for Business | Purchase Google Apps Premier


4. How much does it cost to set up Google Apps?How much does it cost to set-up Google Apps?

Apps for Business
Email, IM, voice and video chat Each user gets 25 GB of email and IM storage (50 times the industry average).


Anytime, anywhere access to your email Gmail is securely powered by the web, so you can be productive from your desk, on the road, at home and on your mobile phone, even when you're offline.

Sync with Android, iPhone & BlackBerry Get the benefits of Apps on leading mobile platforms

Search and find emails instantly Spend less time organizing email and find emails quickly with Google-powered search for your inbox.

Get less spam Powerful Gmail spam filtering helps you stay focused on what's important. Postini filtering lets you customize your spam protection.

 
http://www.sefari.net/how-much-does-it-cost-to-set-up-google-apps.php
Apparently, that depends on which version of Google Apps best suits your needs. Google Apps offers three versions of services: Standard, Premier and Education. You may read here the differences between the versions of Google Apps. Generally speaking, money wise, Google Apps Standard version and Education version are free (of course, not any organisation or individual can get the Education version), while the Premier version costs $50 (or equivalent amount of value in GBP and Euro) per user per year. For example, if your company has 10 employees, and each would like to have a Google Apps user account, it would cost you $500 per year. You may say, well, I also need an account for sales, or admin. Of course you can buy extra user accounts for these (typically email accounts), you can also set them up as Google Apps Groups, so that you wouldn’t have to pay a penny for these group accounts.



5. What about Googel Apps Domain Registration.
Domain registration One year domain registration costs $10 and includes these benefits at no additional cost:


•30 day free trial of Google Apps for Business pre-configured for your domain
•Full DNS control and management
•Private registration to protect your personal information
Google Apps for Business Google Apps for Business is a suite of online tools that includes custom email (@your_domain.com), calendar, documents and more. Plus, you get:
•Mobile access: manage your business from anywhere with access on all your web-enabled devices
•Easy collaboration: work virtually with employees, contractors, or partners in other locations by sharing online docs and editing them together, in real-time
•No hardware or software required: get started quickly with nothing to download or install
•Tons of storage: get plenty of space for all your emails and Google-powered search to find them instantly
http://www.google.com/apps/intl/en/business/domain.html

6. How to create Google apps email group alias

https://groups.google.com/a/googleproductforums.com/forum/#!category-topic/apps/how-to/Ppv2WpNigHY

7. A CNAME record  - MX Record.
Create a CNAME record - Google Apps Help
Creating Your MX Records & CNAME Records for Google Apps: (mt ...
DNS configuration for Google Apps - forum.slicehost.com


8. FACEBOOK

HOW TO HACK FACEBOOK ACCOUNTS' PASSWORDS WITHOUT ...
hack facebook password, how to hack facebook ... - Daily Motion

How to hack Facebook account? With our site you can hack any Facebook account
Hack Facebook: online password hacking


Hack Facebook Password


Learn How to Hack Facebook Password - Devil's Cafe
http://www.rafayhackingarticles.net/2010/01/4-ways-on-how-to-hack-facebook-password.html
How To Hack Facebook Passwords
How to hack facebook password
How to Hack a Facebook Password - Video
Hack Facebook password or accounts remotely ~ Hacking Tutorials ...
The Facebook Magic Trick


http://thenextweb.com/shareables/2009/11/17/facebook-magic-trick/




9. Google Docs - online documents with real-time collaboration
http://www.google.com/apps/intl/en-in/business/docs.html
Anytime, anywhere access to your work Google Docs is securely powered by the web, giving you the flexibility to be productive from your desk, on the road, at home and on your mobile phone, even when you're offline.


Works across operating systems Google Docs works in the browser on PC, Mac, and Linux computers, and supports popular formats such as .doc, .xls, .ppt, and .pdf.

Easily upload and share files Files stored on Google Docs are always accessible and backed-up online.

Secure access controls Administrators can manage file sharing permissions system-wide, and document owners can share and revoke file access at any time.


9.Office very slow opening docs (Word, Excel, Powerpoint),
Office 2010 first launch very very slow.
Office 2010 first launch very very slow
Opening files in Office 2010 slow! - Windows 7 Forums
Office very slow opening docs (Word, Excel, Powerpoint) - MS ...
1.) Open My Computer.


2.) Go to Tools -> Folder Options, and click on File Types.

3.) Find the extension of the file in question (XLS, DOC, etc.)

4.) Highlight the extension, and click \"Advanced.\"

5.) Highlight the \"Open\" Action, and click \"Edit.\"

6.) Click into the \"Application used...\" field, and scroll to the end

of the command.

7.) Put a space at the end, and type in \"%1\" (With the quotes.)

8.) Uncheck \"Use DDE.\"

9.) Click \"OK.\"

 

 










बुधवार, अगस्त 03, 2011

बिखरता बचपन





दोनों हथेलियों पे अपना मुह टिकाये वो बच्चा कहीं शून्य में कुछ सोच रहा था बच्चे अक्सर इतने गंभीर नहीं होते वो तो उदंड प्रवर्ती के और बे-परवाह होते हैं, उन्हें बस हर वक़्त खेलने से मतलब वो अक्सर खेलने में इतने मशगूल हो जाते हैं की भूख प्यास तक को भुला देते हैं मेने बच्चे के विचारों में खुद को दाखिल किया और उस मासूम के चिंतन का कारण जानने की कोशिश की एक प्रौढ़ और बच्चे की सोच में जमीन आसमान का फर्क होता है , बच्चे ज्यादातर खेल और खाने से ताल्लुक रखते हैं इसलिए ये दो चीजे उनकी सोच का मुख्य विषय होतें हैं और प्रौढ़ अक्षर दुनियादारी में उलझा हुआ रहता हैं इसीलिए उसकी सोच का दायरा असीमित होता है 


लम्बे समय के अन्तराल के बाद में टकटकी लगाये उस बच्चे के पास जा बैठा और खामोश रहकर वहां बैठने की उसकी इजाजत का इन्तजार करने लगा बच्चे की लम्बी ख़ामोशी मेरे लिए वहां बैठने की इजाजत थी सो में बैठ गया और बच्चे से बातों का सिलसिला शुरू करने का उपाय तलाशने लगा आप चाहे कितने ही बड़े तीशमारखां हों मगर बच्चे से नहीं जीत सकते सो मेने अपने आप को बच्चा बनाया और बातों का सिलसिला शुरू किया अरे! आपने तो बड़ी अच्छी टी-शर्ट पहनी है .....और ये सामने तो बिलकूल आप जैसे एक बच्चे की फोटो भी छपी है.. मगर फोटो में ये दूसरा ...कोन है भई ? .(मेंने रुककर पूछा ) बच्चा अभी भी शून्य में निहार रहा था.



.........में कुछ देर चुप रहकर उसकी प्रतिक्रिया का इन्तजार करने लगा....."वो चिंटू है"..... ( बच्चे ने बिना ऊपर देखे जबाब दिया )..... "चिंटू कौन भई ?", मैने उत्साहित होकर पूछा ताकि बच्चा शून्य से बाहर आये और खुलकर बातें करे. एक पल चुप रहकर बच्चे ने सामने के घर की तरफ इशारा किया और कुछ देर चुप रहकर बोला ... "वो है उसका घर" ... मैने सामने वाले घर के दरवाजे पर लगे लोहे के ताले को देखा..... उस घर के सामने जमा कूड़े से लग रहा था की वो काफी दिनों से बंद है एक पल सोचा और फिर पूछा कहाँ गया चिंटू ?
"उसके पापा को शहर में नोकरी मिल गई इसलिए वो चिंटू और उसकी मम्मी को भी शहर ले गए......", "पढने के लिए....." ,बच्चे ने घर की तरफ देखते हुए कहा (कुछ देर चुप रहकर बच्चे ने कहा).... "अब वो वहीँ रहेगा" मैने उस मासूम की तरफ देखा तो लगा जैसे किसी ने वक़्त से पहले   उसका बचपना छीन लिया हो.  में कुछ देर उसको सांत्वना देने के लिए वहीँ बैठकर सोचने लगा ...आस पास ख़ामोशी पसरी हुई थी और एक बचपन एक प्रोढ़ से मन ही मन शिकायत कर कर रहा था और मनो कह रह हो ...की आपके बचपन जैसी खुशिया मुझे क्यों नहीं ? में कुछ देर अनमना से बैठा रहा और थोड़ी देर बाद बच्चे की पीठ सहलाकर एक और चल पड़ा मेरी आँखों के सामने मुझे मेरा बचपन खेलता हुआ नज़र आ रहा था , सामने मोहल्ले का वो चौक जहाँ हम बचपन में खेला करते थे , वो बूढ़े ताऊ का घर जहाँ से वो हमें शौर करने पर डांटते थे , वो बिल्लू , पप्पू , विक्की , बंटी के घर ... यही दुनिया थी बचपन की मगर आज .... बूढ़े ताऊ के घर की जगह एक खंडहर है

सुना है ताऊ अब इस दुनिया में नहीं रहे और उनका परिवार अपने खेतों में जाकर बस गया , अब वहां बच्चे नहीं खेलते क्योंकि चौक ही नहीं रहा वहां अब कूड़े का ढेर है जहाँ सभी घरों के लोग अपने घर का कचरा फेंकते हैं मेरे दोस्तों के घर भी अब पहचान में नही आ रहे थे , क्योंकि अब एक घर में चार से पांच नए घर बन गए बड़े होने पर बच्चे अक्सर अलग परिवार बना लेते हैं , इसीलिए पता नही चलता किसका घर कौन सा है

में एक घर के सामने रुक गया और सर को खुजाते हुए कुछ याद करने के कोशिश करने लगा मेरे बचपन का सबसे अच्छा दोस्त था बबलू ये उसी का घर था ... उसे घर तो नही कहा जाता हाँ घर का अवशेष जरुर कह सकते हैं अपने दिमाग पे जोर डालकर मेने उस घर का वो पुराना खाका बनाया जब वो घर खुशियों से सरोबार रहता था, बबलू के पिता अक्सर मुझे और बबलू को बहुत प्यार करते थे घर के गेट पर बनी दो सीमेंट की कुर्सीयों पे में और बबलू घंटों खेला करते थे आज वहां वीरानी पसरी हुई है अचानक मुझे किसी ने धक्का दिया तो मेने मुड़कर देखा एक युवा शराब के नशे में धुत मुझे एक और धकेलकर उस टूटे फूटे खंडहरनुमा घर में घुस गया कुछ देर बाद वो बाहर आया और दिवार के एक टूटे हुए हिस्से पर बैठा गया वो गर्दन झुका कर कुछ बड़बड़ाने लगा, बीच बीच में गर्दन उठा कर इधर उधर देखने लगता अचानक मुझे लगा की वो कुछ जाना पहचाना सा है मेने गोर से देखा तो सन्न रह गया वो मेरा दोस्त बबलू था क्या हालत हो गई है उसकी अपनी उम्र से दुगना लग रहा था वो बात करने की हालत में नहीं था में कुछ देर उसकी हालत देखता रहा और फिर आगे निकल गया

बाद में किसी ने बताया बबलू के पापा के निधन के बाद उनकी माली हालत ख़राब होने लगी और बबलू भी गलत दोस्तों के साथ रहकर शराब पीने लगा उसकी माँ भी २ साल पहले उसका साथ छोड़ भगवान के पास चली गई मगर जाने से पहले बेटे के फेरे करवा दिए थे आजकल अक्सर बबलू का उसकी पत्नी से झगडा होता है और कारण एक ही है , पैसे की तंगी बबलू का बेटा इधर उधर सहमा सहमा सा गुमता रहता है , फटी हुई शर्ट को मुह में चबाता हुआ वो किसी दोस्त को तलाशता रहता है उसका भी सायेद कोई दोस्त अपने मम्मी पापा के साथ शहर चला गया होगा

By "विक्रम" (5th Aug '2011 )

मंगलवार, जुलाई 26, 2011

(((((((((((((बीस साल बाद )))))))))))





बहुत सालों बाद इस बार में अपने गाँव में लगभग १५ दिन रुका और मुझे इन १५ दिनों में एहसास हो गया की मेरा वो बीस साल पहले वाला गाँव अब गाँव नहीं रहा वो शराबियों और जुवारियों का अड्डा बन गया है



में हर साल अक्सर एक या दो बार एक या दो दिन के लिए जा पाता था मगर इस बार कारणवश मुझे १५ दिन रुकना पड़ा और इन १५ दिनों में मेने १० से लेकर २५ साल के युवाओं को शराब डूबे हुए ही देखा रात तो रात दोपहर में भी शराब के नशे में झूमते,गलियों में गिरते ,एक दुसरे से झगड़ते ,गाली-गलोज करते उनको रोजाना देखा गया ऐसे परिवार के युवा भी नशे में लहराते मिले जिनके घर में एक वक़्त का खाना जुटाना भी मुश्किल है मगर पाता नहीं शराब कैसे जुटा ली जाती है


इन सब के पीछे शराब माफियाओं का हाथ साफ साफ नजर आता है में नहीं मानता ९९% युवा एसे कैसे शराब के आदि हो गए , आज कल ठेके पे मिलने वाली ओरंज शराब में जरुर ऐसा कुछ है जो एक या दो बार पीने से पीने वाले को अपना गुलाम बना लेती है घर घर में ठेके वाले शराब रख देते हैं और फिर परिवार के परिवार बर्बाद कर देते हैं





२० साल पहले मेरे गाँव में गीनती के पीने वाले थे मगर आज गीनती केन पीने वाले हैं अगर वक़्त रहते इसको फैलने से रोका नहीं गया तो ये एक महामारी बनकर युवा पीढ़ी को वक़्त से पहले बुड़ा और बीमार बना देगा हमें हर गाँव में ये एलान करना होगा की कोई भी २० साल से कम उम्र के लड़के को शराब ना बेचे और ना ही पीनेदे , हम इसी उम्र में उनको रोक सकते हैं वरना बाद में बहुत देर हो जाएगी और रोक पाना उतना ही कठिन होगा


"विक्रम"

नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

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