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शनिवार, दिसंबर 06, 2014

भूली-बिसरी

इंसान ज़िंदगी मे सबकुछ प्राप्त कर सकता है मगर उसे अपना बचपन कभी नहीं मिल सकता। अर्ध-शताब्दी गुजर जाने के दौरान अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं और पूर्ण शताब्दी मे तो करीब करीब सब कुछ बदल चुका होता है, जिसके परिणामस्वरूप हम या आने वाली नई पीढ़ियाँ बहुत से घटनाक्रमों को भूल जाते हैं। तदुपरान्त एक नवीन सर्जन होता है मगर वो पूर्व से भिन्न होता है, और यही प्रकृति का नियम है यानि परिवर्तन।

मैंने अर्द्ध शताब्दी के दौरान जो भी देखा , (जो आजकल लुप्तप्राय है) उसे अपने गाँव की खड़ी बोली मे तुकबंदी के साथ लिख रहा हूँ , ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी जान सकें की इन 50 बरसों मे कितना कुछ बीत गया, कितना कुछ गुजर गया......
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कठै गया बै गाम कठै गया बै नाम

कठै गया बै रिवाज कठै गया बै इंसान
दड़का भुआ , सरमण ताऊ
झुंवारा कुम्हार घोघड़ चमार
ऊदमी नायक हुकमा लुहार
गौरु महाजन , गणपत सुनार
गिन्ना नाई , ग्याना बाई
खुर्दड़ी ताई बिन बुलाई आई
तीन कुरड़ी तीन गाळ1
अगुणी खंधे की पाळ2
दो कुआ एक मंदिर
एक भोमिया एक खेत्रपाळ3
कच्ची ईंट ऊपरबंधी छान4
भीटकै5 की बाड़ न आस न जान
दूर कोई बाड़ों भेड़यां को रीवाङॊ6
आयो झरख7 वो करग्यों  कबाड़ों
खंदेह की माट्टी बाळू रेत

गोबर को लीपणो दूर दूर खेत
पाणी को पैंन्डो8 फुल्ला की इंडी9
गुलगुला सुहाळी बाजरे की पिंड्डी
लहसण की चटणी चनै को साग
पील की सिंडोरी चूल्हे की आग
भाट्ठे की चटणी गठिया रोटी

खाट्टे की राबड़ी झेरणी सूं घोट्टी
सिरै को पलटो खिचड़ी को चाट्टू
कैर को मूसळ सैर को लाड्डु

खींप की टाप्पी10 मुंज की खाट
खरसणै की हारी11 सैर को बाट
नाई हळ12, ऊंट का गिरबाण13
शक्कर घी जद आवै महमाण
कठै गई कास्सी की थाळी कठै गया बै इमरतबाण
कठै गया बै गाम कठै गया बै इंसान
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धोती साफा चाम की जुत्ती
काना मे गुदड़ा खेस दुसत्ती
कड़ी नेवरी छैलकड़ा तागड़ी
गळ मे टेवटो माथे पै रखड़ी14
सांगरी को साग चौलाई की बुज्जी
घुन्दरै को रायतो खेलरां को सब्ज़ी15
भैंस को चाट झाड़ियाँ की बित्ती
बरूँ की भरोटी, बरसात आगीति

एक आनै की पट्टी एक पीसै को बरतो
डोवटी को कच्छो डोवटी को कुड़तो
दही खिचड़ी मोटी मळाई
चूँटियों घी दही अदबिलाई
कढावणी को दूध घाट को दळीयो
घी की मिरकळी दूध को पळीयो
मंगल वार बालाजी को बार
बाजरै को चूरमों दूध की खीर
शक्कर को परसाद घी को दियो
आग की ज्योत आंगळी को छींटों
ज्योत कोनी आई तो बुज्जा कढ़वाई
पित्तर की बताई पहरावणी पहराई
मावस धोकी, रात जगाई
बहू आई तीळ तागो ल्याइ
सुहाळी बँटवाई, खुशी मनाई
कठै गई बै तीळ दिखाई कठै गई बै आण-जाण
कठै गया बै रिवाज़ कठै गया बै इंसान
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लाव और बरी पी ई और कछ
ढाणा कढ़ोई कुए की पाछ
गूण चिड़स और जुआ किल्ली16
कीलीया बारिया लोह की बिल्ली
गीरज कामळा हीरणा की डार
डोड काग फ़ौ-गादड़ी और सियार
टिड्डी दल काळा नाग और घेरा
ल्हिख जूं और बड़ा बड़ा ढेरा
बाज़ीगर की डुगडुगी और भोपां की फ
कानबेलिया की बीण और सावण की झड़
भजनी साँगी  और आल्हा गावणीया
भाट बांवरिया , डफ बजावणीया
कहाणी किस्सा, भूताँ की बात
धुणी पै सिंकता कटती रात
कठै गई बा ज़ोर की हांसी सब कीमै क्यों होग्यों सुनसान
कठै गया बै रिवाज़ कठै गया बै इंसान
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देसी मुर्गी , फेरेडों  ऊंट
चातर लुगाई लायक पूत
हुड़िए गिंडी कबड्डी कुश्ती
माल्लों फूरो डंडा बित्ती
पींग पाटड़ी, सावण का गीत

भेळा होके झुलण की रीत
काठ की सन्दुक बटेऊ का गीत
घर को फळसो माट्टी की भींत
होळी की तैयारी डफ और ढ़ोल
झांझ मंजीरा और धमाल
खेल तमाशा, भरज्या चौक
नाचो गाओ, ना रोक ना टोक
गोबर का बड़कुल्ला, ढाल तलवार
पाणी का गैर कोरड़ा की मार
दादा-दादी, ताऊ और ताई
भाभी का कोरड़ा, देवरां की पिटाई
मीटग्या सब बैर, सारा भाई भाई
कठे गई बा होळी कठे गई बा डफ की तान
कठे गया बै गाम कठे गया बै नाम
कठे गया बै रिवाज़ कठे गया बै इंसान
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दिवाळी का डीबला कातिक को न्हाण
टाबरां को हीड़ों बाजरै को खाण
जोगी खोपरा पान्नी का बात्ता
रपियाँ का ठीक, बही खाता
गीरड़ी को गाटो, दोड़ कुटाई
काकड़िया मतीरा, सिट्टा भुंदाई
कोट्ठी-कुठला, हारा चूल्हा
आजकल तो सब किमै भूल्या
आई सक्रांत रूस्सा-मनाई
बाड़ा-गतवाड़ा, एक कुट्टी ब्याई
दोळा-काळा पिल्लिया ल्याई
बाड़ कै नीचै एक घुर बणाई
घर घर करता चून उघाई
तेल को सिरो रोट पुवाई
सब गाळा की होगी सफाई
ताऊ नै मिल्या दो रपिया बोतल मँगवाई
कठे गयो बो जाड्डो कठे गयो बो सम्मान
कठे गया बै गाम कठे गया बै नाम
कठे गया बै रिवाज़ कठे गया बै इंसान

बुड्ढा की सेवा, लुगाइयाँ की शर्म

सूं-सौगंध और धर्म कर्म
मिट्ठी बोली बाताँ का धणी
हांसी-ठट्टा, मसकरी घणी
अपणा पराया सब बठ्या साथ
सब ही मानै हक की बात
साची गवाही साची जामनी
चाँद नै अर्क सूरज नै पाणी
कठे ग्या बै ब्या ओटणीय, कठे गई उनकी जबान
कठे गया बै गाम कठे गया बै नाम
कठे गया बै रिवाज़ कठे गया बै इंसान

-    आखिर मे मेरे गाँव में भाइयों का एक अजीब सयोंग देखने को मिला , जिसमे एक भाई शादी-शुदा और दूसरा कुँवारा रहता था। उनका नाम सहित वर्णन कुछ इस तरह है।

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दो भाइयाँ को जोड़ो,
एक कूवारों एक ब्यायोड़ों
फत्तों-जगमाल, नारणों-पहलाद
सादुल-भादर, बालू-मेगो
टेक्कों-गोमद,चुन्नों-भूगानों
गंगाराम-मामराज,गिरधारी-नेतो
नैतो-मल्लो , दलसुख-प्रेमों
स्योपाल-चुन्नों, बंजी-नानजी
गोरधन-रामकार, पूर्णों-स्योपाल
कोई ग्यों कोई बचग्यों फेर ना देख्या ईसा मिलाण
कठे गया बै गाम कठे गया बै नाम
कठे गया बै रिवाज़ कठे गया बै इंसान

-भँवर सिंह शेखावत  ( ब्लॉगर के बड़े भाई )

 
अर्थ- 1-गली , 2- कच्चे तालाब का किनारा, 3-देवता , 4-झोपड़ी, 5-कंटीली झाड़ियां, 6-जहां भेड़ों को रखा जाता है, 7-भेड़िया, 8-जहां मटके रखे जाते हैं, 9-सिर पे पानी का मटका रखने के लिए बनाई गई कपड़े की छल्लानुमा इंडि, 10-एक झोंपड़ी जो राजस्थानी जंगली पोधे खींप से बनाई जाती है। 11-मिट्टी के बर्तन को लुढ़कने से रोकने के लिए बनाई जाने वाली हरी घास के पटसन जैसे पोधे (खरसना) की गोल छल्लेदार चीज जिसे हारी कहते हैं, 12-एक तरह का हल जो काफी गहराई तक जमीन मे पेवस्त होता है।, 13-ऊंट के नाक मे नकेल से बांधने के लिए डाले जाने वाला लकड़ी का गहनानुमा टुकड़ा। 14-आभूषणों के नाम, 15-बरसात मे अपने आप पनपने वाली हरी सब्जियाँ, 16-चमड़े के थैलानुमा झोले से ऊंट से कुए से पानी निकाला जाता था।   

शुक्रवार, अक्टूबर 17, 2014

वक़्त

जब गाँव जाता हूँ तो उस चौक को देखता हूँ जहां बचपन मे हम आस पास के 10 घरों के बच्चे देर रात तक खेलते थे , हल्की सर्दियों मे देर रात तक लुका-छिपी (ढायला) खेलते थे। आस पास के घरों मे जाकर छिप जाते थे। सर्दियाँ बढ़ जाने पे चद्दर को पट्टी की तरह सीने से बांध लेते थे ताकि दौड़ते वक़्त उसको संभालना ना पड़े। चौक के किनारे के घरों के सामने चबूतरे पे अलाव (धुणी) जलाकर बड़े बुड्ढे बैठकर हुक्का या चिलम पीते हुये देर रात तक बातें करते रहते थे, और बीच  बीच मे हम लोगों  को  ज्यादा शोर ना मचाने की चेतवानी भी देते रहते थे जिसे हम पलभर के लिए मान भी लेते थे। ।  

मगर आजकल .....!  बिलकुल सुनसान सा  पड़ा है वो चौक, आस पास के कुछ घर खेतों मे जाकर बस गए , कुछ नौकरी पैसा के लिए शहरों मे चले गए तो साथ मे अपने परिवार को भी अच्छी शिक्षा के लिए लेते गए। सुने पड़े घरों के सामने बने चबूतरे भी अपना अस्तित्व नहीं बचा पाये। उन घरों के करीब सभी  बड़े बुड्ढे भी भगवान को प्यारे हो गए। अब तो रात मे उस चौक मे बैठने से भी डर सा लगता है , वहाँ ना बच्चों की चिल्लपों है और ना ही बुजर्गों की डांट-डपट या मिट्ठी झिड़की।  

शाम ढलते ही इक्का दुक्का बच्चे अपने घरों मे दुबक जाते हैं। घरों के दरवाजे भी अंधेरा घिरते ही बंद हो जाते हैं, और इसके बाद  सुबह तक मरघट सी ख़ामोशी छा जाती है।

विक्रम

गुरुवार, मार्च 15, 2012

ताऊ श्रवण

( लेख थोडा लम्बा है, मगर एक इंसान की सच्ची कहानी है जिसका सम्पूर्ण जीवन सामाजिक कु-प्रथाओं की भेंट चढ़ गया )




गाँव के मुख्य चौक के किनारे बने चबूतरे पर हम अक्सर ताऊ श्रवण को पसरे हुए पाते थे . वो या तो कुछ पढ़ रहे होते या रेडियो में फ़िल्मी गाने सुन रहे होते . गाँव के बच्चे उन्हें सिर्फ "ताऊ" का संबोधन करते थे क्योंकि हरियाणा और सीमावर्ती इलाके राजस्थान ( जहाँ मेरा गाँव है) में "जी" या "आप" लगाना व्यंग्य की श्रेणी में आता था . ताऊ श्रवण शारीरिक रूप से काफी हट्टे कट्टे और बलिष्ठ काया के स्वामी थे .उन्होंने अपनी  उम्र को स्थिर  मान लिया था. वो अपने आप को आज भी युवाओ का मुख्य प्रतिद्वन्द्वी मानते थे, हालाँकि वो 65 बसन्त गुजार चुके थे .

अपने हमउम्र बूढों लोगों से ताऊ को सबसे ज्यादा चिड़ होती थी , वो ताऊ को सठियाया हुआ समझते थे ,और ताऊ उनके सम्पूर्ण जीवन को ही निरर्थक समझते थे . इसका एक खास कारण जो मुझे लगता था वो था , ताऊ का थोडा बहुत पढ़ा लिखा होना और अन्य का अंगूठा छाप होना , बाकि सब ताश खेलते रहते मगर ताऊ को ताशों के खेल से बहुत नफरत थी .

किताबों से ताऊ ने काफी ज्ञान अर्जित कर रखा था जिसको वो समय समय पर बखान करने से नहीं चुकते थे .  उनके बखान से  अंगूठा छाप ग्रामीणों के लिए तो भैंस के आगे बीन बजाने वाली स्थिति होती थी . ताऊ श्रवण को किताबें पढने का बहुत शौक था , मगर धार्मिक किताबों से उनका छत्तीस का आंकड़ा था I उनकी पसंदीदा किताबों में कादम्बनी, गृहशोभा, रोमांटिक उपन्यास होते थे मगर चंदामामा
और बालहंस जैसी किताबों से भी परहेज नहीं करते थे .   

गाँव का कोई न कोई युवा शाम को शहर से लौटते वक़्त पढ़ा हुआ अखबार ताऊ के हाथ में ऐसे थमा देता जैसे  ये  उन्ही के लिए ही ख़रीदा हो , और बदले में ताऊ उसको अपनी कोई पढ़ी हुई किताब देना नही भूलते ताकि ये लेन देन का सिलसिला निरंतर चलता रहे . वो अपने आप में एक छोटी लाईब्रेरी थे , अपनी किताबें एक दुसरे को देते रहते मगर बदले में उनसे किताब लेना कतई नहीं भूलते .

उनके दो ही शौक थे, किताबें और रेडियों . उम्र के हिसाब से उनको चलने फिरने में मुश्किल तो होती थी, मगर वो किताब के लिए गाँव के हर युवा के घर तक पहुँच जाते . अक्सर चौक में लेटे रहने वाले इस प्राणी को अकस्मात अपने घर के सामने देखकर घर की महिलाये संकोचवश इधर उधर छुप जाती . उन दिनों गाँव में औरतें अक्सर बड़े बूढों के सामने नहीं आती थी , आज तो हालात काफी बदल चुके हैं.  अपने मोह्हले में ताऊ को आया देख मोह्हले के बच्चे कोतुहलवश पीछे लग जाते , और ताऊ मस्त हाथी की तरह लहलहाते हुये चले जाते. बच्चो का हुजूम कुछ दूर पीछे पीछे चलता और बाद में लौट आता मानो किसी सर्कस से लौटे हों .



ताऊ आंशिक रूप से कुवारें थे . सुना था उनके बड़े भाई के निधन के बाद उनकी भाभी को उनके पल्ले लगा (बांध) दिया था l ताऊ जिस जाति से सम्बन्ध रखते थे उसमे अक्सर परिवार के छोटे लड़के को कुंवारा रखने का रिवाज था ताकि कभी शादी शुदा के साथ कुछ अप्रिय घटना घट जाये तो उसकी विधवा को उसके नाम की चूडियाँ पहनाई जा सके.   मगर ताऊ को सायद औपचारिक विवाह रास नहीं आया और वो अपना मलंग जीवन ही जीते रहे  .

ताऊ का मकान हमारे स्कूल जाने के रास्ते में पड़ता था .  शरारती बच्चे आते जाते वक़्त ताऊ पे एक सरसरी नजर डालते और उसके बाद उनके घर की दीवारों पे लटके अमरबेल के पोधे की कुछ बेलें तोड़ कर भाग जाते l ताऊ उनके पीछे पीछे गलियां देते हुए जाते और कुछ दूर तक उनको भगाकर वापिस आ जाते . बच्चे इस क्रिया को महीने में ३ य ४ बार दोहराते इसलिए ताऊ को उनकी हरकतों का पूर्वानुमान लगाने में खासी परेशानी होती थी . 

गाँव में पढ़े लिखे बुजर्गों में एक मात्र ताऊ ही थे इसलिए हमारे स्कूल के प्रधानाचार्य १५ अगस्त या २६ जनवरी जैसे उत्सव में उन्ही को आमंत्रित करते थे l ताऊ जैसे इसी मौके की तलाश में रहते थे l वो वक़्त पर पहुंचकर मुख्य अतिथि वाली कुर्सी पर अपने भरी भरकम शारीर को रख देते और चश्मे को ऊपर निचे करके सामने पक्तियों में बैठे उन शरारती बच्चो को तलाशने लगते l बच्चे भी कम नहीं थे, वो एक दुसरे के पीछे ऐसे छुपकर बैठते जहाँ ताऊ की दिव्य द्रष्टि नहीं पहुँच पाती थी l जब ताऊ को अभिभाषण के लिए कहा जाता तो ताऊ अपना भाषण शुरू करते . वो बताते की कैसे अंग्रेजो ने हम पे सितम ढाए थे और कैसे हम लोगों ने आजादी के लिए संघर्ष किया . इसके साथ साथ वो समाज में फैली सामाजिक कुप्रथाओं की भी खुलकर धजियाँ उड़ाते रहते . वो क्रांतिकारियों के कारनामों की तारीफ करते मगर बीच बीच में उन बच्चो को भी कोसते जो उनकी बेल तोड़कर भाग जाते थे l उनकी इस बात पर छुपकर बैठे बच्चे एक दुसरे की तरफ देखकर मुस्कराते और उधर सभी अध्यापकगण तथा अन्य
अतिथि भी मुस्कुराने में उनका साथ देते .



ताऊ से मेरी स्कूल के दिनों से ही अच्छी पटरी बैठती थी . वो मुझे बेटे और एक दोस्त की तरह मानते थे l मेरे और उनके बीच किताबों का लेन देन चलता रहता था में अक्सर समय बिताने के लिए उनके पास बैठ जाया करता था l में जितनी देर उनके पास बैठता था उस दरमियाँ अगर गाँव का कोई भी वृद्ध उधर से गुजरता तो ताऊ फुसफुसाकर उसके बारें में बुरा भला कहते और उसके दूर चले जाने के बाद मुझ से पूछते ,"किसलिए पैदा हुए ये लोग ? साले खा पी के सो जाते हैं , दुनिया में क्या हो रहा है कुछ पता है इनको ? ,धरती के बोझ " में मुस्करा के ताऊ का समर्थन करता .

ज्यादातर लोग उनके एकाकी और अक्खड़ स्वभाव के कारण उनको पसंद नहीं करते थे लेकिन वो भी अन्दर से एक आम इंसान की तरह ही थे l बस लोग उनको समझ नहीं पाए . एक बार किसी किताब में लिखी प्रेम कहानी के बारें में मेरे और ताऊ के बीच वार्तालाप चल रहा था . किताब की कहानी इतनी भावुक थी की ताऊ खुद बहुत भावुक हो गए और वो अपने जीवन का एक वाकया मुझे बताने लगे .

उन दिनों श्रवण अपनी युवा अवस्था में थे . किसी परिचित मारवाड़ी के साथ आसाम चले गए और वहां उसकी दुकान में काम करने लगे . मारवाड़ी ने श्रवण के लिए एक किराये का मकान खोज कर दिलवा दिया था l वो दिनभर दुकान में और शाम को अपने मकान में आकर सो जाते.  मकान एक स्थानीय निवासी का था जिसमे मकान मालिक अपनी पत्नी तथा एक जवान बेटी बिनोदिनी के साथ रहता था. वो लोग ताऊ का खास ख्याल रखते थे , यहाँ तक की उनका खाना भी वही लोग बनाते थे.  धीरे धीरे
बिनोदिनी 25 वर्षीय श्रवण के प्रति आकर्षित होने लगी . 

युवा दिलों को प्रेम करना सीखना नहीं पड़ता वो स्वत: ही सीख़ जाते हैं l गृह स्वामी और स्वामिनी को दोनों के परस्पर मिलने से कोई आपति नहीं थी l उन्होंने मन ही मन ताऊ को अपना दामाद मान लिया था l वक़्त बीतता गया और ताऊ अपनी दुनिया में बहुत ख़ुशी से जीवन बसर करने लगे. कहते हैं की किस्मत कब बदल जाये किसी को कुछ पता नहीं होता . श्रवण और बिनोदिनी की किस्मत ने भी एक करवट ली . एक साल बाद अचानक ताऊ को पता चला उनके बड़े भाई की एक हादसे में मौत हो गई . वो आनन फानन में वहां से आ गए . गाँव पहुंचकर स्वछंद जीवन जीने वाले श्रवण के पैरों में सामाजिक बेड़िया पहना दी गई l उनकी भाभी को उनके नाम की चूड़िया पहना दी गई l युवा इच्छाएं परिवार और समाज की भेंट चढ़ चुकी थी l किस्मत की एक करवट ने दो युवा दिलों की हसरतों को एक झटके में मसलकर रख दिया था l देखते देखते पाँच साल गुजर गए मगर श्रवण आज तक बिनोदिनी को नहीं भुला पाए थेl

 एक दिन अचानक घरवालों को बिना बताये आसाम के लिए निकल गए l दो दिन बाद वहां पहुंचे तो पहले मारवाड़ी के पास गए . मारवाड़ी उनको देखते ही चौंक गया और उनका हाथ पकड़कर दुकान के अन्दर ले गया l " अरे ! , तुम यहाँ क्यों आये हो ? वो लोग तुम्हे मार डालेंगे " , मारवाड़ी ने डरते हुए कहा . बाद में वो श्रवण को अपने घर ले गया तथा उसके जाने के बाद से अब तक का सारा हाल बताया.  वो लोग श्रवण के ऐसे चले जाने और फिर कई दिनों तक ना आने से बहुत नाराज हो गए तथा अपने परिचितों को लेकर अक्सर दुकान में आ धमकते थे .

उन लोगों के हाथों में खुखरीनुमा हथियार होता था जिसको ऊपर उठाकर वो अपनी स्थानीय भाषा में काट डालने की धमकी देते थे . दो सालों तक ये सिलसिला चलता रहा बाद में बिनोदिनी की शादी उन्ही के समाज के एक दबंग के साथ करदी . श्रवण थे तो युवा मगर पराये देश में ऐसे हालात ने उनको बहुत डरा दिया था और वो उसी दिन वहां से भागकर वापिस गाँव आ गए .

 इतना कहकर ताऊ चुप हो गए ..... फिर ना जाने कब कहाँ से वक़्त की दरारों में फंसे कुछ आसूँ, ताऊ की आँखों से निकल किताब पे आ गिरे . एक अक्खड़ आज अबोध बच्चे सा सुबक कर रह गया था . आज चालीस सालों से दबे तूफान ने सिर उठाया तो मलंग  ने फिर से उसे अपने अन्दर ही कुचल दिया.

आज से करीब दो साल पहले गाँव गया तो पता चला श्रवण ताऊ नहीं रहे . सुनकर बहुत दुःख हुआ l आज जब भी गाँव जाता हूँ , तो उस चौक में गाँव की पंचायत द्वारा छोड़ा गया सांड जुगाली करता हुआ मिलता है जो अक्सर गाँव के बूढों की तरफ फुंकारता रहता है.  मुझे ना जाने क्यों उसको देखकर ताऊ की याद आ जाती है. ताऊ भी ऐसे ही मस्त मौला की तरह इसी चौक में जमे रहते थे. में ताऊ के जीवन की कहानी याद करके अक्सर अपने आप से कह देता हूँ की "कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता ...कभी जमीं तो कभी आसमान नहीं मिलता" .


( मेरा ये स्मृति लेख ताऊ श्रवण को श्रधांजली है l अगले जन्म में भगवान उनको वो सब खुशियाँ दे जो उनको इस जन्म में मयस्सर नहीं हुई )

"विक्रम"







नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

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