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बुधवार, जनवरी 15, 2020

फ्रीडम ऑफ स्पीच

- फ्रीडम ऑफ स्पीच

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अभी पिछले रविवार की सुबह की घटना है । दूर किसी दूसरी कॉलोनी  से कुछ कुत्तों के भोंकने की आवाज सुनकर हमारे  सामने रहने वाले शर्मा जी का कुत्ता भी ज़ोर ज़ोर से भोकने लगा। छुट्टी के दिन मेरे जैसे देर तक सोने वालों को उसका भोंकना रणदीप सुरजेवाला के वक्‍तव्‍य सा लग रहा था। नींद में खलल की वजह से रज़ाई में मुंह  ढककर फिर से सोने की कोशिश की । तभी अचानक एक ज़ोर से लट्ठ बजने की आवाज आई और साथ ही कुत्ते के ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज आने लगी । फिर धीरे धीरे कुत्ते के चीखते की आवाज कम होती जा रही थी शायद कुत्ता दूर जा रहा था ,उसकी चिल्लपों की आवाज आनी बंद ही चुकी थी।  लेकिन  फिर गली में ज़ोर ज़ोर से लोगों के बोलने की आवाज आने लगी।

  

नींद काफ़ुर हो चुकी थी। गेस्ट हाउस की बॉलकोनी से झककर देखा तो सामने वाले शर्मा जी ओर हमारे बगल में रहने वाले दिल्ली पुलिस के हवलदार यादव जी झगड़ रहे थे । ऊपर से देखने में मजा नहीं आया तो मुंह धोकर हाथ में चाय का कप लेकर नीचे धूप में चबूतरे पर बैठकर चाय की चुसकियों के बीच लाइव देखने लगा ।

लड़ाई अब चर्म पर पहुँच रही थी , हालांकि पड़ोसी होने का फर्ज निभाते हुये मैंने थोड़ी जल्दी में चाय खतम करके बीच-बचाव के इरादे से पास चला गया। हवलदार यादव जी अक्सर शनिवार शाम 8PM के लगभग हमारे गेस्ट हाउस में नींबू पानी पीने आते रहते हैं, वो नींबू पानी के काफी शौकीन है अगर कोई पिलाये तो । और शर्मा जी से भी आते जाते हाय-हैलो (राम-राम)  होती रहती है वो पंडित होकर संस्कृत की जगह अँग्रेजी के शब्दों पर ज्यादा ज़ोर देते थे।  

तभी बेचारे शर्मा जी , जो की छ: फिट लंबे हवलदार से काफी डर चुके थे , मुझे देख थोड़े एनर्जेटिक होकर ज़ोर से बोले ,’अब आप ही बताइये राजपूत जी , भला जानवर बेचारा भोंक भी नहीं सकता ? भई फ्रीडम ऑफ स्पीच तो सभी को है। मेरा मतलब “बोलने की आजादी”, यादवजी  की तरफ देखकर उसका हिन्दी रूपांतर किया ताकि हवलदार समझ सके।

“तो फिर शांति बनाए रखने की ज़िम्मेदारी हमारी है”, हवलदार ने लट्ठ सड़क पर पटक कर दो कदम आगे आते हुये कहा।


मैंने हवलदार को धीरे पीछे करते हुये कहा ,’ अरे यादव जी क्यों सुबह सुबह झगड़ा कर  हो ? आखिर किस बात को लेकर ये बहस कर रहे हो ? मैंने न्यूज चैनल होस्ट की तरह अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुये कहा  ?

तभी शर्मा जी बीच में बोल पड़े । “हवलदार ने मेरे कुत्ते को इतने ज़ोर से लट्ठ मारा की बेचारा मोहल्ला छोड़कर ना जाने कहाँ भाग गया?


“तो उसे चुप क्यों नहीं करवाते ? सुबह सुबह सबकी नींद खराब करता है भोंक-भोंक कर”, यादव जी ने जनरल बक्शी की तरह तैश में आकर आँखें निकलते हुये कहा ।


“सबको बोलने की आजादी है , आप किसी के मुंह पर हाथ नहीं रख सकते”, मुझे बीच में खड़ा देखकर शर्माजी भी मौलाना अंसार रज़ा की तरह तर्जनी  हिलाते हुये बोले ।


“हाथ ना सही , लट्ठ तो रख सकते हैं”, यादव ने ठेठ अपनी पुलिसिया सभ्यता का परिचय दिया ।   “बोलने की आजादी है ,भोंकने की नहीं “, यादव जी ने शर्माजी की तरफ आँखें निकालते हुये बात पूरी की ।


जैसे तैसे दोनों को शांत करवाकर अपने अपने घर भेजा। कुछ देर बार देखा तो शर्मा जी अपने कुत्ते को खोजते हुये जेएनयू की तरफ जा रहे थे ।

"विक्रम"

   

बुधवार, मई 31, 2017

ड्राई-क्लीन

गाँव के स्कूल मे जब जनवरी-फरवरी के महीनों मे सर्दी अपने पूरे शबाब पर होती थी तब हम हफ्ते में 3,4 बार बिना नहाये ही स्कूल चले जाते थे। लेकिन बावजूद इसके नहाये हुये से लगें, इसके लिए ड्राई-क्लीन जरूर करते थे । ड्राई-क्लीन के लिए एक लोटा हल्का गर्म पानी पर्याप्त होता था । उस लोटे से दोनों हाथ भिगोकर हाथ-पैरों पर तेल की भांति पानी से मालिश कर लेते थे , साथ ही साथ मुंह,गर्दन और बालों को चुपड़ना भी नहीं भूलते थे । उसके बाद “कच्ची घानी” वाला सरसों का तेल हथेली में गड्ढा बनाकर उसमे भरते और फिर दोनों हथेलियां चुपड़कर बालों में रमा लेते। हथेलियों मे बाकी बचे तेल को मुंह और हाथ पैर के उघड़े हिस्सों पर फेर लेते जिससे सर्दी से सुखी चमड़ी मे चमक आ जाती थी।

प्रार्थना होने के बाद मास्टर साहब एक एक छात्र की बाजू उठाकर उसकी कलाइयाँ, पायजामा उठाकर उसकी टांगे , गर्दन के आगे पीछे ऐसे देखते थे जैसे कसाई हलाल करने से पहले बकरे को देखता हैं । ड्राई-क्लीन मे अपारंगत छात्र इस जांच मे फेल हो जाते थे जिन्हे असेंबली के सामने खड़ा करके “धोया” जाता था। जो छात्र जांच मे पास हो जाते वो अपने ड्राई-क्लीनींग के हुनर पर खड़े खड़े मंद-मंद मुस्करा रहे होते। कुछ सालों ये सिलसिला बड़े आराम से चलता रहा मगर फिर नए हैड-मास्टर साहब का हमारे स्कूल मे पदार्पण हुआ।

उन्होने असेंबली मे कुछ नियमों मे फेरबदल किया जो उन्हे पसंद नहीं थे। अब वो हाथ-पैरों और गर्दन के साथ साथ पेट से शर्ट उठाकर भी देखने लगे, जिसे ड्राई-क्लीनिंग में सिद्दहस्त छात्र भी इस जांच से बच ना सके। उसके बाद हाथ-पैरों के साथ साथ पेट पर भी गीला हाथ फिराकर स्कूल जाना शुरू किया और नए हैड-मास्टर साहब की जांच मे पास होकर मास्टर साहब की बुद्धि पर तरस खाते हुये अकड़ के साथ असेंबली मे सिर ऊंचा करके खड़े रहते । मगर हम लोगों की ये चाल भी ज्यादा दिन तक नहीं चल पाई , क्योंकि अब पेट के साथ साथ पीठ भी जांच के दायरे मे आ गई थी। जिस पर खुजली करने से बनी लाइनों का पूरा जाल मिलता था । हैड-मास्टर साहब अपनी इस जीत पर फुले नहीं समा रहे थे । अब असेंबली के सामने वो चंद लड़के ही खड़े होते थे जो सम्पूर्ण-रूप से नहा कर आए हुये होते थे , बाकी पूरी असेंबली की कपड़े उतारने जैसी बे-इज्जती की जाती थी ।

और फिर असेंबली के सामने घूम-घूमकर हैड-मास्टर साहब बड़े फख्र से हमें कह रहे होते की, “ये ड्राई-क्लीन उन्होने भी अपने स्कूल के दिनों मे बहुत की है ।“

"विक्रम"

रविवार, नवंबर 13, 2016

भक्तगण कृपया ध्यान दें !


अगर आप अपने आपको निष्पक्ष मानते हैं, तो आपको अपने विरोधी द्वारा किए गए अच्छे काम की भी तारीफ करनी चाहिए।  मगर साथ ही  खराब  काम करने पर “अपने” की आलोचना से भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए वरना लोग आपको “भक्त” कहने लगेंगे। भक्तों के इस दोहरे रवैये से “भगवान” की इमेज खराब होती है । “भगवान” भक्तों की बदौलत है , ना की “भक्त” भगवान की बदौलत। इसलिए तारीफ वहीं करें जहां उचित हो, और जहां उचित ना हो वहाँ बगलें ना झाँकें बल्कि विरोध के सुर निकालें , नहीं तो लोग आपके माथे पर “भक्त” का लेबल चिपका कर निकल लेंगे ।

“भगवान” की ही नहीं खुद (भक्त) की भी स्व-समीक्षा (Self-Review) जरूरी है । अगर कोई सही काम करने पर भी “आपके भगवान” को गाली देता है तो उस नादान को माफ कर देना चाहिए । वैसे  भगवान भी की  गाली सुनने की लिमिट सौ गाली तक है , तो इस लिहाज से “भक्तों” को कमोबेश 50 के आंकड़े तक को धीरज रखना चाहिए । तदुपरान्त  हो सकता है विरोधी को आपकी चुप्पी खामोश कर दे। वरना कभी कभी इस “अंध-भक्ति” के चलते  कुछ भक्त” लोग आपस मे टकरा जाते हैं, क्योंकि कुछ अंधे होते हैं और कुछ आँखों (दिमाग) वाले।  


इसलिए , हे भक्त ! विचलित ना हो, अगर तुम्हें “भगवान” में सम्पूर्ण आस्था और विश्वास है तो इस माहौल को उसके हाल पर छोड़ दे , खराब मत कर । 
"विक्रम"

शनिवार, फ़रवरी 15, 2014

सभ्यताएं

उस दिन ट्रेन के आने में काफी समय था । इसलिए मैं वक़्त गुजारने के बहाने कुछ खाने-पीने को स्टेशन से बाहर आ गया । स्टेशन पर  खाने पीने की चीजों का स्वाद किसी से छुपा नहीं है । बाहर आकर मैंने इधर उधर की दुकानों पर नजर डाली और एक कैंटीननुमा चाय की उस दुकान की तरफ बढ़ गया जहां अन्य दुकानों की तुलना मे भीड़ कम थी ।  सामने ही कुछ कदम के फासले पर किसी कंपनी की बड़ी सी बिल्डिंग नजर आ रही थी। मैंने बैठते हुये अपने लिए चाय ओर कुछ खाने का ऑर्डर दिया । पास की टेबल पर चार पाँच युवक चाय की चुस्कीयों  के बीच सिगरेट के छल्ले उड़ा रहे थे। सड़क के उस तरफ बनी दो दुकानों के मध्य खाली जगह मे फँसकर खड़ी एक देहाती महिला अपने पल्लू की आड़ में छुपकर बीड़ी के कस ले रही थी ।


 
 मेरी चाय आ चुकी थी ओर में चुस्कियों के दौरान अपना वक़्त गुजारने लगा । कुछ समय पश्चात सामने की, कंपनी की बिल्डिंग से एक युवती  आती हुई नज़र आई । खूबसूरत चेहरे से युवती ही नज़र आ रही थी ,मगर उसका भारी भरकम शरीर उसे उसकी असली उम्र से काफी आगे ले जा रहा था। वक्षस्थल पेट के ऊपर  पेंडुलम की भांति दायें बाएँ झूल रहा था। आधी बाजू की टी-शर्ट से उसके  मोटे और गोरे  हाथ शरीर के बगलों से लटकते मांस  से संघर्ष करते हुये आगे पीछे झूल रहे थे, जिससे उसके भारी शरीर को आगे की तरफ धकेलने मे मदद मिल रही थी । उसके भारी भरकम पेट पर  कंपनी का आई-कार्ड  इधर से उधर यूँ भटक रहा था जैसे मेले मे घूम हुआ कोई बच्चा । आई-कार्ड  पर उसका नाम और ओहदा लिखा हुआ था, जिस से ज्ञात होता था की अच्छी पोस्ट पे कार्यरत है।

 
उसने आते ही दो Egg Puff ,एक कोल्ड ड्रिंक और एक सिगरेट खरीदा । सबसे पहले उसने एग-पफ़ को निपटाया और बाद में सिगरेट जलाकर कॉल-ड्रिंक के सिप लेने लगी।  बाएँ हाथ में सिगरेट और दायें मे कोल्ड-ड्रिंक की बोतल पकड़े वो बड़े सहज भाव से सिगरेट के लंबे लंबे कश लगा रही थी। पास ही खड़े युवक चोरी छिपे उसकी तरफ देखकर मुस्करा रहे थे। दो दुकानों के बीच की जगह में बैठी मजदूर महिला उसे बड़े कोतूहल से देखेते हुये  बीड़ी के कश ले रही थी 

 मैं  देहाती और शहरी सभ्यताओं का तुलनात्मक विश्लेषण करता हुआ स्टेशन की तरफ चल पड़ा ।

 
-विक्रम

 

बुधवार, जनवरी 01, 2014

सोचता हूँ नेता बन जाऊं !


एक मुहावरा है  "कीड़ा काटना " ये किसी  पुस्तक में है या  नहीं पता हीं  मगर जब कोई इंसान उलटे सीधे  काम करने  की सोचता है तो कहते हैं की उसको "कीड़ा काट"  रहा है।  खैर , में अपने  कीड़े  की बात बताता   हूँ । मुझे   कल ही ख्याल  आया की नेता बन जाऊं । अब ये  आपकी   नजर   में   कीड़ा काटना  हो सकता  है   मगर  मेरा ख्याल  था । नेता बनने  के लिए   लोगों के   वोट बटोरनादूसरा पायदान है ।  पहले पायदान के बारें में मैं निचे लिखूंगा । जहाँ   तक वोट बटोरने  बात है तो फेसबूक, गूगल+ वाहट्सअप्प्स  जैसे  निर्वाचन क्षेत्रों से 3000 दोस्तों का जुगाड़  करके रखा है ।  वैसे तो 3000 से ज्यादा है मगर सभी मेरे बहकावे में आयें ये भी तो जरुरी नहीं ।
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खैर जब नेता बनने का सोच ही लिया तो और वोटों का जुगाड़ भी हो  ही जायेगा । हर नेता को वोटों का  पहलेसे ही जोड़ भाग करके हिसाब रखना जरुरी होता है ।   क्योंकि यही एक पोस्ट है जिसकेलिए  ज्यादा पढ़े  लिखे होने की जरुरत नहीं और ना ही कहीं आपको अपना बायोडाटा भेजनाइंटरव्यू  में उटपटांग  सवालों का सामना करना। मगर ऐसा नहीं की कोई भी ऐरा गैर नाथू खैरा नेता बन सकता है , इसके लिए आप में बहुत कुछ औरों से हटकर होना चाहिए। एक सफल नेता बनने के लिए आप में न्यूनतम योग्यताओं का बेहद जरुरी है ।साथ में कुछ बहुमूल्य सुझाव भी बोनस स्वरूप प्रस्तुत  हैं ।


 १. एक दर्जन कोर्ट केस जिसमे चोरी-डकैती , हत्या, बलात्कार,और पाकेटमारी जैसी उपलब्धियां
    शामिल हों उसे विशेष  प्राथमिकता दी जाती है . 
२. इंसानियत या भलमनसाहत नामक हार्मोन्स  की आपके शरीर में सदैव कमी बनी रहना .
३. शराब और शबाब  आपकी शख्सियत के मुख्य केंद्र बिंदु होने चाहिए .
४.  हमेशा मुर्दे के कफन जैसे रंग वाले सफ़ेद कपडे पहनें , सिर में अन्ना टोपी जरूर लगाये ताकि  कोई
     मुर्दा समझ दफ़न ना करदे
५.  जहाँ भी जाएँ चमचों की फौज साथ में रखें , ये बहुत काम के प्राणी होते हैं, कबीर ने  भी इनकी
      सिफ़ारिश की थी  और कहा था की  "निंदक नियरे राखिये ..."
६. जो भी आपसे से खफा होंऔर लगे  की ये  आपकी दाल नहीं गलने देंगे तो सबसे पहले उन्हे पटाकर
     रखें,क्योंकि दुश्मनी जैसी आदत ना पालें।  क्योंकि ह्त्या जैसे केस मे  पकड़े जाने पर आपकी लुटिया
      जल्दी डूबने का डर बना रहता है ।  
७. नेता बनने से  पहले आपको तेल मालिश ,घूसखोरी ,दल-बदलूझूठे- वायदेफिजूल खर्ची  में चार
    साल  का  स्नातकोत्तर  पाठ्यक्रम पूर्ण करना अनिवार्य है ।

इन सबके अलावा भी हजारों खास ऐसे गुण  आप में   होने चाहिए  अगर आप के उच्च दर्जे के नेता बनने का शौक रखते हैं तो । खैर एक बार शुरुवात करेंगे तो ये गुण आप में  समय के साथ अपने आप आ जायेंगे । आप अपना करियर पहले एक  टपोरी और बादमें एक छुट या नेता के तौर पे शुरू कर सकते है। वैसे भी आजकल काफी युवा  इस "धंधे" की तरफ खिचे चले आ रहे हैं। इसका हालिया उदाहरण "आप" पार्टी वाले हैं ।  लेकिन आज इस व्यवसाय पर 80% खूसट बुड्ढे सांप की तरह कुंडली मारके बैठे हैं जो युवाओं को जगह नहीं दे रहे हैं 

लेकिन फिर भी आप परेशान  ना हों , क्योंकि   नेता   का   पहला   उसूल है की खुद कभी  परेशान ना ह हमेशा औरों को बराबर उंगली करके परेशान करे। वैसे नेता का कार्यकाल निश्चित नहीं है ,मगरकमाई के मामले में एक दो साल में ही करोडपती से अरबपती तक बना जा  सकता है | हाल ही के उदाहरण मेरे इसविचार की पुष्टि करते हैं ।  खैर जाने दीजिये बहुत हो गया , अब मतलब की बात पे आता  हूँ  " अपना अमूल्य वोट मुझे ही  दीजिये "
-विक्रम
    





   


मंगलवार, जुलाई 09, 2013

मास्टर जी (व्यंग)


जब किसी स्कूल के प्रांगण में छोटे बच्चो को मस्ती करते देखता हूँ तो मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ जाते हैं। उन दिनो  हम स्कूल के अंदर नहीं गेट के बाहर या फिर स्कूल के रास्ते के बीच में मस्ती करते थे। उन दिनों हमारे मास्टर जी को किसी कानून का डर नहीं होता था इसलिए स्कूल के अंदर मस्ती करने पर वो हमारी मस्ती जल्द ही उतार देते थे। लेकिन बाहर भी हमे ऐसा करते हुए कोई अध्यापक देख लेते तो, उस वक़्त तो वो कुछ नहीं बोलते थे। मगर क्लास मे होम-वर्क पूरा नहीं होने पर या किसी अन्य कारण मे हमारी धुलाई ये कहते हुए करते थे की, "आजकल बहुत उछल-कूद मचा रखी है तुम लोगों ने, बड़ी चर्बी चढ़ी है तुम सब पे।" इसी तरह पिटते-पिटते हम कुछ बड़े हुये तो हमारी पिटाई का तरीका भी कुछ बड़ा हो गया, क्योंकि कान उमेठना ,चांटा मारना तो अब गुदगुदी-सी फिलिंग देते थे।  

 अब कान पकड़ कर मुर्गा बनाना, शर्ट को पीठ से उठाकर ढीले हाथ से थप्पड़ मारना, सावधान की मुद्रा मे खड़ा कर के गाल पे अचानक घात लगाकर चांटा मारना और उस चांटे से बचने की कोशिश की तो बोनस के तौर पे दो चार चांटे और मिलते थे। कुछ अध्यापक तो थर्ड डिग्री के मास्टर थे।  वो हथेली पे डंडा नहीं मारते थे बल्कि हथेली को उल्टी करवाकर पीछे की तरफ उभरी हुई हड्डियों पे मारते थे और उसके बाद छात्र के चेहरे को गौर से देखते हुए प्रहार से उत्पन्न दर्द की अनुभूति का अंदाज़ा लगाते थे।  अगर दर्द उनकी उम्मीद पे खरा नहीं उतरता था तो ये क्रम तब तक दोहराया जाता जब दर्द खुद शरीर से बाहर आकर चिल्ला चिल्ला के नहीं कह देता की बस!
 

कुछ उम्रदराज अध्यापक गीली बेंत या लकड़ी का उपयोग करते थे, क्योंकि उनके शरीर मे उतनी ऊर्जा नहीं रह गई  थी की वो हम जैसे 25,30 छात्रों  को थप्पड़ से सुधार सकें। वो बेंत हमसे ही किसी पेड़ से तुड़वाते थे और फिर तोड़कर लाई गई लकड़ियों में से अपनी पसंद की लकड़ी छाँटते थे। इसके बाद वो हमे एक लाइन मे खड़ा करवाकर और सबको कहते की अपनी अपनी दोनों हथेलियाँ सामने रखो। सभी लड़को के हाथ प्रसाद लेने की मुद्रा मे हो जाने पर  लाइन के एक सिरे से दूसरे सिरे तक गीली बेंत से हमारी हथेलियों पे हारमोनियम बजाते हुये दूसरे सिरे तक चले जाते। मुझ जैसे शातिर ऐसे मे सुर चुराने की कोशिश करते और अपनी हथेली पीछे खींच लेते। मगर लय बिगड़ने पर तुरंत पकड़ मे आ जाता और फिर मुझे लाइन मेँ अलग से छाँटकर बड़ी तन्मयता से मुझपर तबला वादन का अभ्यास किया जाता।  इस तरह की इकलौती पिटाई मे बाकी छात्र अपना दर्द भूल मेरी पिटाई का लुत्फ उठाते थे

 
मगर हम भी ना जाने उस वक़्त किस मिट्टी के बने थे की पहले पीरियड मे पिटने के बावजूद दूसरे पीरियड मे भी पिटने के लिए बिलकुल तैयार रहते थे। लेकिन ये समझ नहीं आता की उन दिनों हम लोग पढ़ाई मे कमजोर थे, या हमारे अध्यापक कुछ ज्यादा ही पीटने के शौकीन थे, या फिर हमे ही पिटाई का चस्का लग गया था। सबसे शर्मनाक हालात तब पैदा होते जब कोई एक मार खाता था, क्योंकि पिटाई के बाद पूरी क्लास फिर उसका जमकर मज़ाक उड़ाती थी। मगर ये खुशी भी बहुत अल्प होती थी और कुछ समय बाद वो हंसने वाले लड़के गीली बेंत से अपनी कठोर त्वचा को मुलायम करवाते नजर आते थे। मगर इतनी धुनाई के बाद भी हमारे मास्टर जी ने, आज के टीचर की तरह हमे अपाहिज नहीं किया। उनकी पिटाई आज भी हमारा मार्गदर्शन करती है।  

 
- विक्रम
   

   

 

नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

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