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रविवार, मार्च 11, 2018

मुलाक़ात

अचानक किसी ने ज़ीने में लगे  बिजली का स्विच ऑन किया तो छत पर दूर तक रोशनी फ़ेल गई।  किसी के आने आहट सुनकर राहुल ने पीछे पलट कर देखा तो एक युवती जिसने कमर से ट्राई कलर का दुपट्टा बांध रखा था , रस्सी से सुख चुके कपड़े उतार कर इकट्ठा कर रही थी। राहुल की तरह उसकी पीठ होने से वो उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था । दो दिन पहले ही वह किराए के इस मकान मे रहने आया था। उसे शहर के एक अच्छे कॉलेज मे दाखिला मिल गया था।  सूर्यास्त के समय अचानक बिजली गुल होने पर राहुल गर्मी से निजात पाने ऊपर छत पर जाकर टहलने चला आया था। विशाल छत पर घूमते हुये वो अक्सर मुड़ कर लड़की का चेहरा देखने को कोशिश कर रहा था।  अचानक लड़की पलटी , उसे महसूस हुआ की कोई उसे कनखियों से देख रहा है।

नज़रें मिली.... लड़की ने घूरने वाले अंदाज से राहुल को देखा.... राहुल को लगा जैसे किसी ने उसे चोरी करते हुये पकड़ लिया हो । उसने सकपका कर नजरे फेर ली। लड़की कपड़े लेकर नीचे जा चुकी थी, साथ ही ज़ीने की बत्ती भी बंद हो गई ।  दूर पेड़ों के झुरमुटों से निकलकर चाँद छत पर चाँदनी फैलाने आ गया था ।

दूसरे दिन राहुल फिर उसी वक़्त छत पर पहुँच गया, कल के अनुभव ने उसे बैचेन कर रखा था। कपड़े आज भी सूख रहे थे। कुछ देर बाद फिर वही आहट पाकर उसने मुड़कर देखा । वही लड़की थी , उसने आज भी वही ट्राई कलर का दुपट्टा कमर से बांध रखा था ओर चुपचाप कपड़े समेट रही थी।

कुछ देर पश्चात लड़की पलटी.... नज़रें मिली …… राहुल की धड़कने बढ़ने लगी ..... मगर राहुल ने आज हिम्मत करके अपनी नज़रें नहीं हटाई । कुछ देर पश्चात ,लड़की हल्के से मुस्कराई ,कपड़े उठाए ओर सीढ़ियाँ उतरकर नीचे चली गई। राहुल भी मुस्कराकर देर तक उसके बारे मे सोचता रहा। युवा दिल ख्वाबों में काफी दूर निकल चुका था।

सिलसिला चलता रहा, लेकिन अभी तक कोई बातचीत नहीं हो पाई थी। रोज की तरह आज भी राहुल तय समय पर छत पर पहुँच गया , उसने सोच लिया था की आज उससे बातों का सिलसिला शुरू करूंगा।
आज छत पर कपड़े नहीं थे ,बस उसका ट्राई कलर का दुपट्टा सूख रहा था। राहुल इंतज़ार करने लगा । वो नहीं आई। अंधेरा हो चुका था । राहुल थक हारकर नीचे आ गया। उसने बगल वाले मकान के बंद दरवाजे की तरफ देखा जिसमे वो लड़की रहती है ।

दूसरे दिन फिर राहुल इंतज़ार करता रहा मगर वो नहीं आई ,उसका दुपट्टा उड़कर अलगनी से नीचे गिर गया था ,उसने पास जाकर धड़कते दिल से दुपट्टे को उठाया ओर प्यार से वापिस अलगनी पर टांग दिया। ।
चार पाँच दिन बाद भी वो अपना दुपट्टा लेने नहीं आई तो राहुल खुद उसका दुपट्टा लेकर नीचे आया ओर बगल वाले मकान का दरवाजा खटखटाया।

एक अधेड़ सी औरत  ने दरवाजा खोला । राहुल की नज़रें घर के अंदर तक गई ओर फिर वापिस महिला के चेहरे पर टिक गई। उसने हाथ आगे बढ़ाकर दुपट्टा महिला की तरफ बढ़ाते हुये कहा ,”आंटी.... ये दुपट्टा आपकी बेटी का .... चार पाँच दिन से छत पर नीचे पड़ा हुआ था। महिला ने दुपट्टा ले लिया , वो कुछ नहीं बोली। राहुल को कोई जवाब नहीं  मिला  तो वो मुड़कर वापिस लौटने लगा।
“बेटे....”, महिला ने पीछे से पुकारा ।
“जी... जी आंटी “, राहुल ने वापिस मुड़ते हुये कहा ।
“इधर आओ...”
“जी...”
“वो तुम्हें भी दिखाई दी थी बेटे  ....?, महिला ने पूछा।
“जी... मेरा मतलब मैंने उन्हे छत से कपड़े लाते हुये देखा था तो ....सोचा वो भूल गई होंगी ,इसलिए देने आया  था”, राहुल ने हकलाते हुये सफाई दी।
“अंदर आओ बेटे”, महिला ने घर के अंदर जाते हुये कहा। राहुल पीछे पीछे ड्राइंग रूम मे सोफ़े पर बैठ गया। महिला भी साइड के सोफ़े पर  बैठ गई।
“बेटे .... ओर मेरी बेटी थी “, महिला ने उदास स्वर मे कहा ।
“थी..... मतलब ?”
“हाँ बेटे, आज से दो  साल पहले वो एक हादसे में हमें छोड़कर चली गई थी।  उसने उस दिन यही ट्राई कलर वाला दुपट्टा पहन रखा था , जिसे हमने संभाल कर उसके कमरे मे उसकी बाकी यादों के साथ सहेज कर रखा हुआ है..... ।“, महिला ने रोते हुये कहा ।
राहुल के कानों मे सीटियाँ बज रही थी, वो बोझिल कदमों से अपने मकान की तरफ बढ़ गया।
 -विक्रम





शनिवार, मार्च 03, 2018

पारो भाभी



गांवों मे रिश्तों के लिए सम्बोधन होते हैं, चूंकि हम उस वक़्त बचपन के दौर मे थे तो वहीं पारो भाभी पचपन के दौर में थी इसलिए हमें उन्हे भाभी कहने मे झिझक महसूस करते थे जिसके चलते हम लोग उन्हे “ताई” कहकर पुकारते थे । हमने सुना था की पारो ने हम लोगों को गोद मे खिलाया था। वैसे पारो का असली नाम पारो नहीं था , वो तो गाँव वालों ने पारो के गाँव के नाम पर उनका नाम रख दिया था , उनके गाँव का नाम “पार” था इसलिए उनका नाम “पारली” या पारो” पड़ गया। पारो अपने दुखों से इतनी परेशान नहीं होती थी जितना वो दूसरों की दुख की खबर सुनकर परेशान हो जाती थी ।   जैसे ही उन्हे पता चलता की गाँव मे फलां की बहू को या बेटे या बेटी को बुखार है तो पारो भाभी वहाँ उनका दुख बांटने पहुँच जाती। पारो की सहानुभूति में औपचारिकता या दिखावा लेशमात्र का भी नही होता था , सामने वाले के दुख पर उनकी  आँखों से आँसू निकलने लगते थे ।

किसी परिवार का बीमार सदस्य जब तक ठीक नहीं हो जाता पारो बराबर उनके घर जाकर खैरियत लेती रहती थी । इस बीच पारो के अपने घर का काम बाकी पड़ा रहता था।  अपनी उम्र के आखिरी दौर मे पारो भाभी खुद बीमार रहने लगी मगर बावजूद इसके वो पास-पड़ोस की खोज खबर लेती रहती ओर हिम्मत करके वो लोगों के घर पहुँचकर बीमार का हाल-चाल पूछ लेती थी। मगर एक वक़्त ऐसा आया की  उनका चलना फिरना तक मुहाल हो गया  ओर अब वो घर मे कैद हो रह गई थी । दिनभर खटिया मे पड़ी पारो भाभी  गाँव के किसी व्यक्ति के आने की राह देखती रहती ताकि उससे गाँव के हाल पूछ सके , मगर थक-हारकर अपने ही बेटे या बहू से गाँव के हाल चाल पूछने लगती । लंबी बीमारी के बाद एक दिन पारो अपने अंतिम सफर पर निकल पड़ी। गाँव के कुछ लोग औपचारिकता निभाने आ गए थे।   
(सच्ची घटना पर आधारित)



रविवार, फ़रवरी 19, 2017

आखिरी पड़ाव

रेलवे के वेटिंग हॉल मे एक शख्स गाड़ी के इंतजार मे अखबार के पन्ने पलट रहा था । चेहरे पर कुछेक झुर्रियां उसके वृद्ध होने की गवाही दे रही थी। उसके कान ट्रेन  के आने की आवाज पर टिके थे । करीब चार दशक के बाद आज फिर से उसके कदम उस शहर की तरफ चल पड़े ।

अंकल ये सीट खाली है ?

विश्वनाथ ने अखबार से नजरे हटाकर ,चश्मा दुरुस्त करते हुये ऊपर देखा तो सामने एक युवती दो बैग थामे खड़ी थी ।
“.....”
अंकल...”
“हाँ...हाँ बेटे  खा...खाली है...”, बैठो ।
विश्वनाथ युवती को देखकर एक पल को चौंक गये ।
“थैंक यू अंकल “, कहते हुये युवती ने दोनों बैग सीट के पास रखे और बैठ गई।
आप कहाँ जाओगी बेटे ?” , विश्वनाथ ने कुछ समय बाद पूछा।

“लुधियाना, और आप अंकल  , लड़की ने पानी की बोतल का ढक्कन खोलते हुये पूछा ।
“मैं ...मैं भी.... “ 
“आप वहीं रहते हैं अंकल ?”
“हाँ...नहीं... मेरा एक पुराना दोस्त है वहाँ , काफी अरसा हो गया , उसी से मिलने जा रहा हूँ” , विश्वनाथ ने कहा।

“और बेटा आप....?”
“अंकल मैं वहीं रहती हूँ ,हमारा घर है वहाँ। अभी कुछ दिन कॉलेज की छुट्टियाँ थी तो घर जा रही हूँ। “, युवती ने जवाब दिया।

“किस एरिया मे रहते हैं आपके दोस्त अंकल ?”, युवती ने पूछा।
“वो ...वो एरिया तो मुझे याद नहीं ,लेकिन हाँ उसका फोन नंबर है मेरा पास , मैं उसको स्टेशन पहुँचकर फोन करूंगा। “

“जी अंकल” ,युवती ने पानी की बोतल का ढक्कन बंद करते हुये कहा ।
तभी स्पीकर पर  ट्रेन के आने की घोषणा हुई और विश्वनाथ की बात उसमे दबकर रह गई, युवती तुरंत उठ खड़ी हुई और अपने दोनों बैग लेकर प्लेटफॉर्म पर आ गई।

विश्वनाथ ने भी अपनी छड़ी और बैग उठाया और वो भी प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के आने का इंतजार करने लगे , साथ ही वो उस युवती को भी देखे जा रहे थे जो थोड़ी दूरी पर ट्रेन के इंतजार मे खड़ी थी । गुजरा हुआ वक़्त उनके जहन मे रह रहकर सरगोशी कर रहा था।

कुछ अंतराल पर ट्रेन के आते ही भगदड़ शुरू हो गई , सभी पैसेंजर अपनी अपनी बोगी और सीट खोजने मे लग गए। विश्वनाथ के कदम अपनी बोगी की तरह बढ़ गए , उन्होने पीछे मुड़कर देखा तो  युवती दूसरी बोगी मे चढ़ चुकी थी।

रात का एक बज चुका था , पूरी बोगी मे यात्रियों के खर्राटे गूंज रहे थे। दूसरी तरफ विश्वनाथ की आँखों मे नींद का नामोनिशान नहीं था और वो अपनी सीट पर करवटें बदल रहे थे।  अतीत से उनका द्वंद चल रहा था ।

उन दिनों विश्वनाथ की पहली पोस्टिंग लुधियाना हुई थी । ऑफिस के पास ही उन्हे एक फ्लैट किराए पर मिल गया था । उसी प्रवास के दौरान सामने के मकान मे रहने वाली रंजना नाम की युवती से नजरें मिली तो सिलसिले चल निकले। महीनों तक एक दूसरे को देखते और आगे बढ़ जाते। फिर धीरे धीरे बातों और मुलाकातों का दौर भी चल पड़ा । सालभर तक दोनों  छुपछुप कर मिलते रहे , कभी सीढ़ियों मे , कभी छत तो कभी पार्क मे।

यूँ ही एक साल गुजर गया । एक दिन दोपहर बाद अचानक विश्वनाथ के ट्रान्सफर ऑर्डर आ गए और उन्हे तुरंत कोचीन ऑफिस मे रिपोर्ट करने को कहा गया। अचानक हुये इस ट्रान्सफर से विश्वनाथ काफी विचलित हो गए मगर सरकारी नौकरी के चलते उन्हे उसी रात कोचीन के लिए निकलना पड़ा। इस दौरान वह रंजना से भी नहीं मिल पाया और भारी कदमों से अपना समान लेकर स्टेशन की तरफ बढ़ गया।

वक़्त गुजरता गया ।

इस दरमियाँ उसने बहुत बार लुधियाना जाने की सोची मगर नौकरी के कामों मे  इतना उलझकर रह गया की  पाँच साल गुजर गए। इसी दौरान परिवार वालों ने दवाब बनाकर विश्वनाथ की शादी कर दी और फिर गृहस्थी और नौकरी  ने देखते देखते ही उसके जीवन के चार दशक छीन लिए।

आज नौकरी और गृहस्थी से सम्पूर्ण फुर्सत मिली तो जिंदगी के उस हिस्से को अपने से जोड़ने निकल पड़ा।
ट्रेन लुधियाना पहुँच चुकी थी। एक एक करके सभी यात्री उतर चुके थे ।   

विश्वनाथ स्टेशन के पास बने एक होटल की तरह चल पड़े। होटल से जल्दी फ्रेश होकर वो बाहर आ गए और फिर उनके कदम उस तरफ बढ़ गए जहां वो किसी को इंतजार मे छोड़ आए थे।

बहुत कुछ बदल चुका था । काफी जद्दोजहद के बाद उन्हे वो फ्लैट नज़र आया जहां वो उन दिनों ठहरे  थे। बाहर से मकान काफी जीर्ण हालत मे था। मकान के अंदर जाने का कोई कारण नहीं था इसलिए वो सामने के पार्क मे जा बैठे। घंटों उस पार्क मे गुजारने के बाद वो अपने दिल को नहीं रोक पाये और  आखिर उनके कदम उस मकान की तरफ बढ़ गए।

“अरे अंकल आप ?”

सामने उस लड़की को देखकर  विश्वनाथ चौंक गए।    

“त...तुम यहीं रहती हो”
“हाँ”
“वो... ट्रेन मे मेरा मोबाइल कहीं गिर गया , इसलिए दोस्त को ढूँढता हुआ इधर आया था , लेकिन लगता है वो अब यहाँ नहीं रहता।“

“चलिये फिर आप हमारे घर चलिये अंकल”
युवती विश्वनाथ को अपने घर के अंदर ले गई।
“क्या लेंगे अंकल ? चाय या कॉफी ?”
“क...कुछ भी..... तुम्हारे मम्मी-पापा ?  ,विश्वनाथ ने कुछ देर रुककर पूछा।

“मैं नानी के साथ रहती हूँ अंकल ,मैं चाय लाती हूँ फिर बैठकर बात करते हैं ।“, कहकर युवती अंदर चली गई।

विश्वनाथ हॉल मे बैठे इंतजार करने लगे । उनकी नजरे किसी को  ढूंढ रही थी । क्या इतने सालों बाद वो रंजना को पहचान लेगा ? वो खुद से ही सवाल कर रहे थे। ये लड़की कौन है ? इसकी शक्ल रंजना से काफी मिलती है । क्या ये .....।
“लीजिये अंकल , आपकी चाय...  
विश्वनाथ ने काँपते हाथों से चाय का कप थामा।

“मैं तुम्हारा नाम पूछना तो भूल ही गया बेटी “,विश्वनाथ ने चाय की चुस्की लेते हुये पूछा।
“विशाखा, अंकल ” , लड़की ने कहा।
“बहुत प्यारा नाम है “

“माँ ने रखा था”, विशाखा ने मुस्कराते हुये कहा।
“तुम्हारी मम्मी नहीं दिखाई दे रही ....”
 “करीब दस साल मम्मी मुझे छोड़कर भगवान के पास चली गई अंकल ”
“का...क्या...क्या हुआ रंजना को .... म...मेरा मतलब आपकी मम्मी को “,विश्वनाथ बुरी तरह से सकपका गए , उनका पूरा वजूद काँप कर रहा गया।  

“विशाखा ने चौंक कर विश्वनाथ की तरफ देखा”
विश्वनाथ के हाथ काँप रहे थे । कप से चाय छलक रही थी ।
“अंकल आप ठीक तो है ना “, विशाखा ने उनके हाथ से कप लेते हुये कहा।  

“अं... हाँ मैं...मैं ठीक हूँ , मुझे अब चलना चाहिए”, विश्वनाथ ने आँखें पौंछते हुये कहा, और उठकर चलने लगे।

विशाखा उन्हे छोड़ने मुख्य द्वार तक आई।
“अंकल”
“हाँ ... बेटे “,विश्वनाथ ने भर्राई हुई आवाज मे पूछा।

“आप.....  विश्वनाथ अंकल हो ना ?”

“ हाँ...मगर  त...तुम्हें कैसे पता ?”, विश्वनाथ ने डगमगाते हुये पूछा।
“मम्मी ने एक बार बताया था”
“क...क्या”
“हाँ अंकल , आइये सामने पार्क मे बैठते हैं वही बैठकर बात करते हैं। विशाखा उनका हाथ पकड़कर पार्क की बेंच तक ले गई।  

आपके जाने के करीब पंद्रह सालों तक मम्मी  ने  आपका इंतजार किया , बाद मे परिवार वालों के दबाब के चलते उनकी शादी कर दी गई । शादी के तीन साल बाद मेरा जन्म हुआ और उसके अगले साल ही पापा ने मम्मी को तलाक दे दिया। मम्मी नानी के साथ रहने लगी। वो बहुत खामोश खामोश सी रहने लगी थी । वो अक्सर बीमार भी रहने लगी। एक बार उन्होने मुझे आपके बारे मे बताया था । बताते हुये उनकी आँखों से बार बार आँसू बह रहे थे। वो आपको मरते दम तक नहीं भूली थी । उन्होने मेरा नाम भी आपके नाम से मिलता जुलता रखा था ।

विशाखा की आँखें  नम हो चुकी थी । उसने अपने आँसू पौंछकर मुस्कराते हुये,  विश्वनाथ का  हाथ पकड़ते हुये कहा , “आप ने सच मे बहुत देर कर दी अंकल” , दूसरे ही पल विश्वनाथ का थका हुआ शरीर एक और लुढ़क गया। उसी दौरान उनकी जेब मे पड़े मोबाइल की घंटी बज उठी ।

“विक्रम”

 

रविवार, जनवरी 08, 2017

तलाश

शाम होने लगी थी।

दिनभर में उन बूढ़े हो चुके सरकारी क्वाटरों के कई चक्कर लगाने के बाद, अधेड़ उम्र का वो शख्स, पास के पार्क मे बने एक सीमेंट के बेंच पर बैठ कर सुस्ताने लगा । पंक्तियों में बने उन दोमंजिला क्वाटरों की पहली और दूसरी पंक्ति के बीच से गुजरते हुये उसकी नजरें, दूसरी पंक्ति के  भूतल पर बने उस आखिरी मकान पर आकर ठहर जाती थी । उसकी बैचेन निगाहें उस मकान के हर खिड़की और दरवाजे से अंदर तक झाँककर निराश लौट आती थी।  एक जगह ठहरकर कुछ देर वो पहली पंक्ति के पहले माले पर बने क्वाटर की उस खिड़की को भी निहारने लगता जिस से दूसरी पंक्ति के भूतल पर बने मकान के मुख्य द्वार के साथ साथ आँगन भी नज़र आ रहा था । जहां से वो एक दूसरे को अपलक निहारते रहते थे ।

 उसे एक भी  चेहरा जाना पहचाना नहीं लग रहा था। वो संकोचवश मकान को ज्यादा देर तक निहार भी नहीं सकता था । लोग क्या सोचेंगे ? कोई उसे गलत ना समझ बैठे। एक  झिझक उसके पैर रोक देती । झिझक ! हाँ वही झिझक जिसने वर्षों पहले भी उसकी जुबान पर ताले लगा दिये थे । कुछ भी नहीं बोल पाया था वो उसे।  बस आँखों ही आँखों में बातें करते रहे और मुस्कराते रहे वो दोनों और इसी तरह एक साल उनके दरमियाँ से गुजर गया । दोनों एक दूसरे की आवाज सुनने को तरस कर रह गए थे। दोनों मे से किसी की भी हिम्मत नहीं हुई की कुछ कहकर इज़हार कर सके।
सालभर चले इस सिलसिले का अंत एक अंतहीन जुदाई के साथ हुआ।

आज तीस साल बाद जिंदगी के झंझावतों से निकलकर वह उसकी तलाश मे इधर दौड़ा चला आया। इस लंबे अंतराल के दौरान यहाँ काफी तब्दीलियाँ आ चुकी थी । बहुत कुछ बदल चुका था । वह दिनभर पुरानी यादों के टुकड़े समेटता रहा । पिछले तीस सालों से सीने मे ठाठें मारता सैलाब आँखों से बह निकला था । शारीरिक और मानसिक रूप से थका हुआ शरीर सीमेंट की उस सख्त बैंच पर फैल गया।  
सुबह हो गई थी ।

नगरपालिका की गाड़ी लाश को लेकर सरकारी अस्पताल जा चुकी थी ।

“विक्रम”

  

  

 

शुक्रवार, अक्टूबर 28, 2016

धन तेरस

न तेरस से जुड़ी एक दूसरी कथा है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण भगवान विष्णु ने असुरों के गुरू शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी थी। कथा के अनुसार, देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गये।

शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि से आग्रह किया कि वामन कुछ भी मांगे उन्हें इंकार कर देना। वामन साक्षात भगवान विष्णु हैं। वो देवताओं की सहायता के लिए तुमसे सब कुछ छीनने आये हैं।

बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी। वामन भगवान द्वारा मांगी गयी तीन पग भूमि, दान करने के लिए कमण्डल से जल लेकर संकल्प लेने लगे। बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमण्डल में लघु रूप धारण करके प्रवेश कर गये।

इससे कमण्डल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया। वामन भगवान शुक्रचार्य की चाल को समझ गये। भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमण्डल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गयी। शुक्राचार्य छटपटाकर कमण्डल से निकल आये। बलि ने संकल्प लेकर तीन पग भूमि दान कर दिया।


इसके बाद भगवान वामन ने अपने एक पैर से संपूर्ण पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग से अंतरिक्ष को। तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं होने पर बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया। बलि दान में अपना सब कुछ गंवा बैठा। इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुणा धन-संपत्ति देवताओं को मिल गयी। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

( एक अन्य कहानी कुछ इस तरह से भी है ) 

पुराने जमाने में एक राजा हुए थे राजा हिम। उनके यहां एक पुत्र हुआ, तो उसकी जन्म-कुंडली बनाई गई। ज्योतिषियों ने कहा कि राजकुमार अपनी शादी के चौथे दिन सांप के काटने से मर जाएगा। इस पर राजा चिंतित रहने लगे। जब राजकुमार की उम्र 16 साल की हुई, तो उसकी शादी एक सुंदर, सुशील और समझदार राजकुमारी से कर दी गई। राजकुमारी मां लक्ष्मी की बड़ी भक्त थीं। राजकुमारी को भी अपने पति पर आने वाली विपत्ति के विषय में पता चल गया। 

राजकुमारी काफी दृढ़ इच्छाशक्ति वाली थीं। उसने चौथे दिन का इंतजार पूरी तैयारी के साथ किया। जिस रास्ते से सांप के आने की आशंका थी, वहां सोने-चांदी के सिक्के और हीरे-जवाहरात आदि बिछा दिए गए। पूरे घर को रोशनी से जगमगा दिया गया। कोई भी कोना खाली नहीं छोड़ा गया यानी सांप के आने के लिए कमरे में कोई रास्ता अंधेरा नहीं छोड़ा गया। इतना ही नहीं, राजकुमारी ने अपने पति को जगाए रखने के लिए उसे पहले कहानी सुनाई और फिर गीत गाने लगी।

इसी दौरान जब मृत्यु के देवता यमराज ने सांप का रूप धारण करके कमरे में प्रवेश करने की कोशिश की, तो रोशनी की वजह से उनकी आंखें चुंधिया गईं। इस कारण सांप दूसरा रास्ता खोजने लगा और रेंगते हुए उस जगह पहुंच गया, जहां सोने तथा चांदी के सिक्के रखे हुए थे। डसने का मौका न मिलता देख, विषधर भी वहीं कुंडली लगाकर बैठ गया और राजकुमारी के गाने सुनने लगा। इसी बीच सूर्य देव ने दस्तक दी, यानी सुबह हो गई। यम देवता वापस जा चुके थे। इस तरह राजकुमारी ने अपनी पति को मौत के पंजे में पहुंचने से पहले ही छुड़ा लिया। यह घटना जिस दिन घटी थी, वह धनतेरस का दिन था, इसलिए इस दिन को यमदीपदानभी कहते हैं। भक्तजन इसी कारण धनतेरस की पूरी रात रोशनी करते हैं। 

रविवार, अप्रैल 17, 2016

ख़ानदान

विजय ! तुम आज से हमारे घर ही रहना ,शादी वाला घर है इसलिए बहुत काम है । , अंकुर ने कहा।
ठीक है यार, मैं आज दोपहर बाद से वहीं आ जाता  हूँ ।
हाँ,बेटा ये आ जाएगा।, घर मे बैठा बैठा वैसे भी उकता रहा है”,विजय की माँ ने अंकुर से कहा।
आंटी , अब तो विजय की भी शादी कर ही दो “, अंकुर ने हँसते हुये कहा।
हाँ बेटे, जल्द ही कोई लड़की देखती हूँइसके लिए, विजय की माँ ने हँसते हुये कहा।

दो दिन बाद अंकुर की बहन की शादी थी। विजय और अंकुर बचपन के दोस्त थे। पढ़ाई पूरी होने के साथ ही विजय को पिछले साल नौकरी मिल गई थी और अंकुर ने गाँव मे ही अपना एक बिजनेस शुरू कर दिया था। विजय इन दिनों अंकुर की बहन की शादी के लिए छुट्टी आया हुआ था ।

 दोपहर बाद विजय अंकुर के घर चला आया,दोनों के घर आमने सामने ही थे। अंकुर के परिवार के सभी सदस्य विजय को काफी दिनों बाद आया देखकर काफी खुश हुये। विजय दिनभर काम मे हाथ बँटाता रहा। वो घर के अंदर से रसोई का सामान लाकर बाहर हलवाई को सौंप रहा था और तैयार सामान को घर के अंदर तक पहुंचा रहा था। रसोई की देखरेख की ज़िम्मेदारी अंकुर के बड़े भाई मनोज की साली अंजना की थी जो शादी मे आई हुई थी। अंजना बला की खूबसूरत मगर घरेलू टाइप की लड़की थी। इतनी सी उम्र मे वो काफी समझदार हो गई थी।

 रसोई का सामान एक दूसरे के हाथों से लेने देने मे कई बार जल्दबाज़ी में विजय और अंजना के हाथ एक दूसरे से टकराते तो वो एक दूसरे की तरह देखने लगते । शाम होते होते एक दूसरे की तरह देखने का सिलसिला और बढ़ता गया और अब हाथ जान-बूझकर टकराने लगे थे। विजय किसी ना किसी बहाने अंजना को देखने अंदर आता। अंजना की नजरे भी विजय को ही तलाशती रहती थी।  हालांकि ,शादी की गहमा-गहमी मे दोनों को एक दूसरे से बातें करने का कम ही समय मिला मगर दोनों ने इतने से वक़्त मे ही बहुत सारे सपने लिए थे।

  शादी के बाद विजय ने माँ को अंजना के बारे मे बताया और उस से शादी करने की इच्छा जाहीर की ।

ये कैसे हो सकता है ?”, विजय की माँ ने माथे पे सलवटें डालते हुये कहा।
क्यों माँ?”

बेटे उनका खानदान हमारे बराबर नहीं है ,हम लोग ऊंचे नदान से ताल्लुक रखते है ,हम छोटे ख़ानदानों में रिश्ते नहीं करते। तुम्हारे पिताजी को  पता चला तो और भी गुस्सा होंगे। ऐसा हरगिज नहीं हो सकता। रिश्तेदारी मे हमारी बड़ी थू थू होगी।

 विजय के देखे हुये ख़्वाब पलभर मे ही टूट कर बिखर गए थे।  वो अगले दिन अपनी ड्यूटी के लिए निकल चुका था । जाते वक़्त उसने अंकुर के घर की तरफ देखा ,अंजना बाहर ही खड़ी उसे देख रही थी । वो बुझे मन से शहर की तरफ चल पड़ा। अंजना की नजरे देर तक उसका पीछा करती रही।  

 वक़्त गुजरता रहा। 2 साल तक विजय घर नहीं आया। अचानक माँ तबीयत खराब होने की खबर सुनकर वो घर आ गया। कुछ दिनों बाद माँ की तबीयत मे कुछ सुधार हुआ तो उसकी माँ ने कहा,”बेटे मेरी अब तबीयत खराब होने लगी है तूँ शादी करले ताकि घर मे बहू आ जाए और वो घर का काम संभाल ले ताकि मुझे बुढ़ापे मे कुछ आराम मिले।

माँ और पिताजी के लगातार दवाब के चलते विजय ने बुझे मन से हाँ कर दी।

विजय की शादी हो गई।

शादी के बाद  दुल्हन और दुल्हन के परिवार वालों ने कह दिया की वो गाँव मे नहीं रहेगी ,विजय के साथ शहर में ही ही रहेगी।
 
बेटे , अपने साथ ही ले जा कुछ दिन के लिए , बाद मे हमारे साथ रह लेगी बहू। “, विजय के पिताजी ने कहा।

उसकी बूढ़ी माँ की आँखों से आँसू लुढ़ककर चेहरे की झुर्रियों मे जज़्ब हो गए।

 
पाँच साल गुजर गए। विजय पत्नी के साथ शहर मे रहने लगा था।  उसकी  पत्नी ने गाँव जाने से साफ साफ मना कर दिया था। हालांकि विजय गाँव आता जाता रहता था। पत्रों के जरिये माँ बाप की खैरियत के समाचार मिलते रहते थे। अंकुर की शादी का कार्ड मिला मगर ऑफिस मे जरूरी काम के चलते गाँव नहीं जा सका।

 देखते देखते और 2 साल गुजर गए। विजय इस दौरान गाँव नहीं जा सका। आज खत मिला की  माँ की  फिर से तबीयत खराब रहने लगी है । उसने ऑफिस में छुट्टी के लिए बोल दिया और सुबह की गाड़ी से अकेला ही गाँव के लिए निकल गया।

गाँव पहुँचकर चारपाई पर लेटी अपनी माँ के पास जा बैठा। माँ का हालचाल पूछने लगा।  

बहू नहीं आई बेटे ? “,विजय की माँ ने गर्दन घूमकर पूछा ।
विजय ने ना मे गर्दन हिला दी।
“कोई बात नहीं बेटे, उसका गाँव मे दिल नहीं लगता होगा
तभी एक महिला ट्रे मे चाय और कुछ नमकीन बिस्कुट लेकर आ गई।
विजय की माँ ने कहा , “चाय ले लो बेटे। “

“बेटे ये अंकुर की बीवी है ,तूँ तो उसकी शादी मे आ नहीं पाया था। ये बेचारी रोज रोज  काम मे हाथ बंटाने आ जाती है । बहुत सुशील और शालिन बहू हैं। अपने सास ससुर का बहुत ख्याल रखती है।  मेरा भी बहुत ख्याल रखती है ।“

विजय ने  ट्रे से चाय का कप उठाते हुये गर्दन उठाकर चाय लाने वाली महिला को देखा तो चौंक पड़ा।

“अंजना  !”

 

-विक्रम

 

  

     

 

 

 

 

 

 

 

 

  

 

 

 

 

शनिवार, दिसंबर 12, 2015

तेरी दुल्हन

रोहित स्कूल से घर आया तो अपनी माँ के पास  काफी देर से एक खूबसूरत युवती को बैठे देखकर

पूछा, ये कौन है माँ ?

माँ उसके मनोभावों को भांपते हुये मुसकराकर बोली ,”तेरी दुल्हन

रोहित शरमाकर दूसरे कमरे मे चला गया ,युवती भी शरमाकर रोहित को जाते हुये देखने लगी।
 

शालिनी पड़ोस के घर मे अगले हफ्ते होने वाली एक शादी मे शामिल होने आई थी। रोहित को जब पता चला तो वो स्कूल से आते ही पड़ोस के घर मे अपने दोस्त निखिल के पास किसी न किसी बहाने चला जाता। निखिल से पता चला वो उसके मामा की बेटी है ।
  
रोहित जब भी निखिल से मिलने आता , शालिनी भी किसी न किसी बहाने उन दोनों के पास आ जाती। रोहित और शालिनी छुपकर एक दूसरे को देखते रहते ।
 
तेरी दुल्हन , माँ के कहे ये शब्द रोहित और शालिनी को बरबस ही मुस्कराने पर मजबूर कर देते। धीरे धीरे दोनों ने एक दूसरे से औपचारिक बातचीत शुरू की । शादी की भीड़भाड़ से बचने के लिए वो छत पर चले जाते। देर तक बातें करते रहते।
 
शालू !, किसी ने पुकारा तो शालिनी उठते हुये राहुल का हाथ पकड़कर चुटकी बजाते हुये हँसकर  बोली, ”जाना मत , मैं बस यूँ आई ।कहते हुये नीचे की तरफ दौड़ गई ।
 
शादी का दिन नजदीक आ चुका था , मेहमानों की भीड़भाड़ के चलते दोनों युवा मिलने की जगह तलाशते रहते थे।
 
आखिरकार शादी का दिन भी आ गया और दुल्हन की विदाई का भी । दुल्हन की विदाई के दूसरे दिन मेहमान भी जाने लगे और उनके साथ ,रोहित की "दुल्हन" भी विदा होने लगी। रोहित एक तरफ खड़ा शालिनी को अपने रिश्तेदारों के साथ जाते हुये देखता रहा। शालिनी की निगाहें रोहित को तलाश रही थी।
 
नजरें मिली , दोनों की आँखों में नमी साफ देखी जा सकती थी।
 
वक़्त गुजरता गया । मगर रोहित शालिनी को नहीं भुला पाया। वो शालिनी का इंतज़ार करता रहा। साल-दर-साल गुजरते गए । उसने शालिनी के प्रति अपने आकर्षण का जिक्र किसी से नहीं किया , यहाँ तक की अपने दोस्त निखिल को भी कुछ  नहीं बताया । पढ़ाई पूरी करने के बाद रोहित को एक सरकारी नौकरी मिल गई। नौकरी लगने के बाद रोहित की माँ ने शादी के लिए लड़कियां देखनी शुरू की मगर रोहित किसी ना किसी बहाने टालता रहा। वो माँ को नहीं कह पाया की माँ , मेरी दुल्हन तो आपने बचपन मे ही तलाश ली थी ,फिर अब किसकी तलाश है ? “
 
सरपट दौड़ते वक़्त के एक हादसे में उसकी माँ भी चल बसी । पिता तो बचपन मे ही चल बसे थे। सालभर मे एक बार शहर से अपने गाँव आता तो निखिल के घर जरूर जाता। निखिल की माँ से उसे अपनी माँ सा प्यार मिलता था। निखिल की माँ भी उसे शादी करने को कहती रहती मगर वो हँसकर टाल देता।
 
अब चालीस को पार कर चुका , फिर क्या बुढ़ापे मे शादी रचाएगा ?”, निखिल की माँ डांटकर कहती।
 
कर लूँगा काकी , अभी कौन सी जल्दी है”, वो बीमार सी हंसी हँसकर बात को उड़ा देता।

 वक़्त खिसकता रहा......बीस साल पुरानी यादें उसके गाँव आते ही ताज़ा हो जाती। आज फिर रोहित करीब दो साल बाद अपने गाँव आया। अपने घर की साफ सफाई करवाकर वो निखिल के घर की तरफ बढ़ गया। वो जब भी गाँव आता खाना निखिल के घर ही खाता था। काकी उसे निखिल की तरह प्यार से खाना खिलाती ।
 
काकी को देखकर रोहित ने चरण-स्पर्श करके काकी का आशीर्वाद लिया और बरामदे मे रखी कुर्सी पर बैठ गया। काकी भी उसके पास बैठ गई और बातें करने लगी। तभी घर के अंदर से एक युवती आई जिसे देखकर रोहित उठ खड़ा हुआ और बोला ,”शालू !
 
युवती ने रोहित को देखा और फिर काकी की तरफ देखकर बोली ,”हाँ दादी माँ , आपने बुलाया ।
 
अरे हाँ, बेटी ये रोहित है निखिल का दोस्त , तुम इसको चाय नाश्ता दो तब तक मैं बगल वाली आंटी से आम का अचार लाती हूँ , इसको बहुत पसंद है । काकी उठकर बाहर चली गई  
 
आप बैठिए, मैं बस यूँ लाई”, युवती ने रोहित की तरह देखते हुये हँसकर चुटकी बजाई खिलखिलाती हुई  घर के अंदर चली गई।
 
रोहित बूत बना खड़ा सोचता रहा , उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। 
 
काकी पड़ोस से आ चुकी थी। तब तक युवती भी चाय लेकर आ गई तो रोहित ने युवती की तरफ इशारा करते हुये पूछा ,”काकी ये ..... ?
 
बेटा ये निखिल के मामा की बेटी, शालिनी की बेटी है।  बिलकुल माँ पर गई है। मुझे “दादीमाँ “ कहती है । मगर अभागी है , इसके जन्म के वक़्त ही शालिनी की मौत हो गई थी ।
 
रोहित के कानों में सीटियाँ बजने लगी, वो भारी कदमों से अपने घर लौट आया । अपना सामान उठाकर जैसे ही शहर जाने के लिए घर से बाहर आया सामने उस युवती को खड़े देखकर सकपका गया।
 
तुम ?, रोहित से पूछा ।
 
दादी माँ आपको खाने के लिए बुला रही है ।

नहीं ,मुझे अचानक जाना पड़ रहा है , आंटी को बोल देना ।
 
युवती रोहित के साथ साथ चलने लगी। ,“आपने मेरी मम्मी को देखा था ? कैसी दिखती थी वो ?”
 
रोहित अपने आंसुओं को रोकता हुआ शहर जाने वाले रास्ते की तरह बढ़ गया।


- "विक्रम"

 

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