बुधवार, जनवरी 23, 2013

योजना


प्राचीन समय मे एक राज्य हुआ करता था जिसके राजा का चुनाव वहाँ की जनता क्रमबद्ध तरीके से करती थी, यानी आज इस परिवार का सदस्य राजा बनेगा तो कल उसके पास वाले दूसरे परिवार का सदस्य। पाँच साल तक राजा बने व्यक्ति की खूब सेवा की जाती उसे हर सुख दिया जाता। महल के सभी दास दासियाँ उसके आगे पीछे घूमते रहते। महल की सभी रानियों पे उसका अधिकार होता था। राज्य की जनता उसे खूब सम्मान देती। राजा जो भी कहता उसकी आज्ञा का पालन किया जाता। मगर शर्त ये होती की पाँच साल के बाद उसे राज्य की सीमाओं के उस उस पार बहती नदी के दूसरी तरफ वाले जंगल मे छोड़ देते जहां या तो वो खुद भूख प्यास से मर जाता नहीं तो उसे कोई जंगली जानवर खा जाता।

...“अरे ! तूँ पागल हो गया है क्या ? अब तूँ हमारे जैसा साधारण इंसान है और आज का दिन सायद तुम्हारा आखिरी दिन है। हम तुम्हें नदी के उस पार के घने जंगल मे छोड़ देंगे जहां तुम्हें कोई जंगली जानवर खा जाएगा। “।  
जब भी पाँच साल पूरे होते यही प्रथा दोहराई जाती। जनता मे एक तरह का उत्सव मनाया जाता। बैंड बाजे और पूरी धूम धाम से राजा को विदा किया जाता। विदा होने वाला राजा मौत की सजा मिले कैदी सा आगे आगे चल पड़ता। और फिर उसी दिन कोई दूसरा साधारण आदमी राजा चुना जाता और उसे राजमहल पहुंचा दिया जाता। जब भी कोई व्यक्ति राजा चुना जाता वो बहुत उदास हो जाता,क्योंकि उसे पता होता था की अब उसकी ज़िंदगी सिर्फ पाँच साल और बची है।
 

ऐसे ही एक विदाई समारोह मे राजा को विदाई दी जा रही थी और राजा बहुत खुश नजर आ रहा था और हँसे जा रहा था। लोग सोचने लगे की आखिर राजा खुश क्यों है? कुछ ने कहा की मौत के डर से  राजा पागल हो गया है और तभी ऐसी हरकत कर रहा है। जब उसे राज्य की सीमा पर बहती नदी के उस पार के जंगलों मे छोड़ने के लिए नौका मे बैठाया गया तो वो और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा। नौका चला रहे मल्लाहो ने उसे डांटते हुये कहा की “अरे ! तूँ पागल हो गया है क्या ? अब तूँ हमारे जैसा साधारण इंसान है और आज का दिन सायद तुम्हारा आखिरी दिन है। हम तुम्हें नदी के उस पार के घने जंगल मे छोड़ देंगे जहां तुम्हें कोई जंगली जानवर खा जाएगा। “
 

राजा से आम इंसान बने व्यक्ति ने मुस्करा कर कहा , “अरे मूर्खो, में अब भी राजा हूँ, और अब अपने नए राज्य मे जा रहा हूँ। मैंने अपने पहले साल के कार्यकाल मे नदी के उस पार के जंगल के सभी हिसक जानवर मरवा दिये थे। कार्यकाल के दूसरे साल वहाँ के जंगल साफ करवा दिये तथा दूसरे साल वहाँ मकान बनवा दिये। तीसरे साल वहाँ सड़के और खेती के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कारवाई थी। चौथे और पांचवे साल वहाँ जंगली कबीले के लोगों को लाकर बसाया और उनके लिए हर सुख सुविधा मुहैया कारवाई। अब में वहाँ का राजा हूँ और वो सब मेरी प्रजा है जो मेरे आने का इंतजार कर रही है ।

- विक्रम

रविवार, जनवरी 13, 2013

मेहँदी के फुल



दूर दूर तक विस्तृत रेगिस्तान। सूना और शांत। कही कही पर छोटी छोटी बेर की झाडियाँ और खेजडे के वृक्ष। शेष रेत ही रेत। आग उगलती धुप और स्तब्ध पवन। ऐसी निस्तब्धता को भंग करती हुई एक बस कच्ची सड़क पर तेज रफ़्तार से जा रही थी। बस में पूरे यात्री थे। ड्राईवर के ठीक पास दो बूढ़े चौधरी बैठे थे जिनके चेहरे पर जीवन के संघर्ष की प्रतिरूप झुर्रियाँ झलक रही थी। पीछे कितने अपिरिचित, अनजान स्त्री पुरुष। पुरुष रंग बिरंगे साफे पहने हुए व् स्त्रियां ओढने ओढ़े हुई थी। सबसे पीछे की सीट पर एक राजपूत मुकलावा (गौना) करके आ रहा था। उसके चार सीट आगे एक सेठ अपनी नवविवाहित बेटी को लेकर अपने गाँव लौट रहा था।

वह लड़की अद्वीतीय सुंदरी थी। उसका केसर सा रंग केसरिया वस्त्रों में एकमेक हो रहा था और ओढनी पर सलमे सितारे जड़े हुए थे जो उसके सौंदर्य में चार चाँद लगा रहे थे। कच्ची सड़क होने की वजह से हिचकोले जरूरत से ज्यादा आ रहे थे पर ड्राईवर अत्यंत सजगता से स्टीयरिंग सम्हाले था। अप्रत्याशित,जिधर बस जा रही थी उसके पूर्व की ओर धुल के बादल उड़ते नज़र आये। सारे यात्री शंकित हो गए। एक चौधरी ने बीडी सुलगाते हुए कहा,“शायद ‘भटलोटिया’ (हवा और धुल का गुब्बार) उठा है।” दूसरा चौधरी जिसकी आवाज़ भारी थी,बोला “आंधी भी आ सकती है।इस मरुभूमि में बरखा कम आंधी ज्यादा आती है।” सेठ ने अपनी इन्द्रधनुषी पगड़ी को उतारकर अपने गंजे सर पर चमकती पसीने की बूंद को पोंछा।फिर अपनी लाडली नवविवाहित लड़की मन्नी से धीरे धीरे कहने लगा, “सुन री लाडली, आंधी आने वाली है, जरा सचेत रहना।”

नवविवाहिता मन्नी ने गले में सोने का तिमणिया और काठलिया पहन रखा था। सिर पर बड़ा बोर था। दोनों कानो में बालियाँ झलमला रही थी।नाक में काँटा था।पांवो में चांदी के भारी भारी बिछ्वे।बाप का संकेत पाकर मन्नी ने अपने ओढने से अपने शारीर को ढांक लिया। मुकलावा करके आने वाला राजपूत अपनी कमर में लटकती तलवार को यूँ ही देख रहा था। उसके समीप उसका मित्र अपने हाथ की कटार से खेल सा रहा था। धुल के बादल और गहरे हुए।वे बस के समीप आने लगे।यात्रियों की आँखे उस ओर जम गयी।ड्राईवर ने बस की रफ़्तार को और तेज कर दिया। तभी गोली की आवाज़ सुनाई पड़ी। गोली की आवाज़ के साथ यात्रियों ने देखा कि धुल के बादलों को चीरती हुई एक जीप आ रही है।जीप में चार आदमी बैठे हैं जिनके चेहरे कपड़ो से ढके हुए हैं।

एक यात्री चिल्लाया, “डाकू! डाकू आ गए हैं!” सारी बस में सनसनी फ़ैल गई। डाकू शब्द फुसफुसाहट में बदल गया। सेठ ने जोर से कहा, “बस और तेज करो।” एक गोली बस के अगले शीशे के ऊपर की ओर टकराकर हवा में उड़ गयी।ड्राईवर के हाथ से स्टीयरिंग छूट गया।उसने घबराकर गाडी रोक दी।चंद क्षणों में ही जीप बस के आगे थी। अब यात्री जीप में बैठे सभी लोगो को अच्छी तरह देख सकते थे। बस में मृत्यु सा सन्नाटा छा गया था। लोग एक दुसरे को शंकित दृष्टि से ऐसे देख रहे थे जैसे वे पूछ रहें हो की अब क्या होगा? जीप में बैठे डाकू उतर आये थे। ड्राईवर के अतिरिक्त पांच लोग और थे। एक के हाथ में तनी हुई बन्दूक थी। बन्दूकधारी ने गरजकर क़हा, “तुम लोग अपनी जान की खैर चाहते हो तो चुपचाप बैठे रहो।कोई भी हिले दुले नहीं!” यात्रियों की साँसे गले की गले में रह गयी।

बन्दूकधारी ने फिर अपना परिचय दिया, “मैं डाकू तेज सिंह हूँ। मैं तुम लोगो में से किसी को कुछ नहीं कहूँगा...मैं सिर्फ इस सेठ की बेटी को लेने आया हूँ।” शेष यात्रियों ने राहत का अनुभव किया लेकिन सेठ और उसकी नव परिणीता बेटी काँप उठी।लड़की मन्नी अपने बाप से चिपट गयी। तेज सिंह उन दिनों राजस्थान का कुख्यात डाकू था। उसने कई जाने ली थी और वह सच्चे डाकुओं की मान मर्यादा का परित्याग कर के नीच से नीच काम करने पर उतारू हो गया था। चूँकि दुसरे डाकू अपने पेशे की नैतिकता और उसके धर्म को लेकर चलते थे, इसलिए उन्होंने तेज सिंह को स्पष्ट कह दिया था कि वे अब उसके साथ नहीं रह सकते।लड़कियों की इज्ज़त से खेलना उनका धर्म नहीं है...पर वासना में लिप्त तेज सिंह ने उनकी कोई परवाह नहीं की। तेज सिंह में एक राक्षश की सारी प्रवृतियाँ उत्पन्न हो गयी थी।

तेज सिंह एक बार फिर सिंह की भाँती गरजा, “सेठ,अपनी बेटी मेरे हवाले राजी खुशी कर दे।” मन्नी ने अपने बाप को मजबूती से पकड़ इया। दोनों थर थर कांपने लगे।दोनों के चेहरे वर्षों से बीमार की तरह पीले पड़ गए थे। तेज सिंह की आँखों में रक्तिम डोरे उतर आये।वह उस खिडकी के पास आकर बोला, “सुना नहीं सेठ? लड़की को मेरे हवाले करो वरना मैं गोली मारता हूँ।” लड़की क्रंदन करती हुई अपने भयभीत बाप से और लिपट गयी। रूआंसे स्वर में बोली, “नहीं बापू, नहीं! मुझे इसके हवाले न करना...बापू...” तेज सिंह चिल्लाया, “बन्ना, जाकर लड़की को ले आ।” तेज सिंह का साथी अपने सरदार का आदेश पाकर बस में घुसा।तेज सिंह ने तत्काल एक हवाई फायर किया। सारे यात्री कलेजा पकड़ कर बैठ गये। उन्हें महसूस हुआ की गोली उनके सीने में दाग दी गयी है।सबकी आँखों में आशंकित म्रत्यु का भय और जड़ता उभर उठी।


बन्ना ने भीतर घुसकर बाप से लिपटी बेटी को छुड़ाना चाहा।बाप ने कांपते हाथों को जोड़कर प्रार्थना की, “माई बाप! मेरी बेटी को छोड़ दीजिए, में आपको सारे जेवर दे दूँगा।” परन्तु हवस में अंधे तेज सिंह को उस लड़की के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। जब बाप ने लड़की को नहीं छोड़ा, तब तेज सिंह ने बन्दूक के पिछले हिस्से से सेठ के सिर पर चोट की। आर्क्त्नादो के बीच लड़की घसीटकर बाहर निकाल ली गयी। सब यात्री निर्जीव से बैठे रहे।वे गूंगे बहरे बनकर अपनी सीटों से चिपक गए थे। लग रहा था कोई भी नहीं है इस बस में।
लड़की अब भी चीख चिल्ला रही थी। बन्ना उसे अपनी बाहों में ले चूका था। तभी मुकलावा करके लौट रहे राजपूत युवक की पत्नी थोडा सा घूंघट हटाकर बस में बैठे हुए लोगो से तेज स्वर में बोली, “आप सब चुल्लूभर पानी में डूब मरिये। आपके सामने एक लड़की को डाकू उठाकर ले जा रहे हैं, और आप हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। थू है आप सब पर।” अचानक इस तेज फर्कार बस में तनिक हलचल हुई। राजपूत अपनी पत्नी को प्रशनवाचक दृष्टि से देखने लगा। 

शायद वह सोच रहा हो कि इसे यकायक यह क्या हो गया है? या हमारी कौटुम्बिक परम्पराओ को तोड़कर क्यों हुंकार रही है? सबके सामने क्यों बोल रही है? राजपूत-पत्नी की आँखों से अंगारे बरस रहे थे। उसने थोडा सा घूंघट खीचकर अपने पति से पुनः कहा, “मैं आप से क्षमा मांगती हूँ,कुंवर सा! आप मुझे मेरी इस गलती की बाद में कोई सजा दे दीजियेया,किन्तु कुंवर सा, आज मुझे मालूम हो गया कि आपकी रजपूताई घास चरने चली गयी है। जो क्षत्रिय गौ,ब्राह्मण,अबला का रक्षक कहलाता था,उसी के सामने एक लड़की मुक्ति की भीख मांग रही है और आप पत्थर की तरह चुपचाप बैठे हैं?आपका खून पानी हो गया है? वर्ना क्या मजाल थी कि एक सच्चे राजपूत के होते हुए कोई चोर डाकू किसी के बाप से उसकी बेटी छीन कर ले जाए।” आपनी पति की तेजस्वी ललकार पर राजपूत खड़ा हो गया। उसके सिर पर लाल रंग का साफा था। उसकी बांकडली मूंछो पर उसका हाथ ताव देने चला गया। जोश में उसके नथूने फडकने लगे।फिर वह अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रखकर इतना ही बोल पाया “कुंवराणी !” कुंवराणी पूर्ववत स्वर से बोली, “आज सारे इतिहास को आग लगानी पड़ेगी। राजपूतों के शौर्य को मिटाना होगा। वरना एक राजपूत के होते हुए डाकू किसी लड़की को उठाकर ले जाए। छि: छि:!”

राजपूत चीख पडा। “क्षत्राणी,चुप रहो!”
“मैं चुप नहीं रहूंगी। मैं कहूँगी कि आप सब मर्दों को चूडियाँ पहन लेनी चाहिए।” उसने फटकारते हुए कहा।

सेठ की बेटी को जीप में डाल लिया था । वह क्रंदन करती हुई बेहोश हो गयी थी। खूंखार डाकू तेज सिंह बन्दूक  लेकर उसके समीप बैठ गया। 

उसने ड्राईवर को आज्ञा दी, “जीप रावाना करो।” पर जीप घर्र-घर्र करके रह गयी।
तेज सिंह ने बन्दूक के पिछले हिस्से से ड्राईवर को हल्का-सा धक्का देकर कहा, “जीप चलती क्यों नहीं?”

कुंवराणी ने सचमुच अपने हाथ की चूडियाँ खोलकर अपने पति की ओर बढ़ा दी, “लीजिए,इन्हें पहनकर आप बैठिये, और तलवार मुझे दीजिए।” राजपूत ने आवेश में कांपते हुए अपने स्वर पर काबू करके कहा, 

“कुंवराणी, मैं राजपूत तो वही हूँ पर समय बदल गया है।”
“समय कैसा बदल गया? राजपूत के लिए दूसरों की रक्षा करने का कोई समय नहीं होता।”
तेज सिंह पागलो की तरह चीखा, “जीप चलाओ!”

राजपूत ने किंचित व्यथित स्वर में कहा, “जरा होश में आकर बात करो। हम अभी गौना करके आये हैं। तुम्हारे हाथों की मेहंदी का रंग भी अभी नहीं उतरा है। घर पर ठुकराणी सा और ठाकुर सा हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे समय हमें मत ललकारो!” 

जीप ड्राईवर ने कहा, “सरदार, बैटरी बैठ गयी है।” तेज सिंह चीखा। “क्या बकते हो?”  “सरदार,सच कह रहा हूँ।” राजपूतानी ने हाथ जोड़कर विनीत स्वर में कहा, “आपके माता पिता जब सुनेंगे कि उनका बेटा एक लड़की की रक्षा नहीं कर पाया, तो जीते जी मर जायेंगे।”

“स्थिति  को देख लो। पल भर में तुम विधवा हो सकती ही !”

“विधवा?...कुंवर सा, विधवा तो मैं तब भी हो सकती हूँ जब आप खिलखिलाकर हँसे और हँसते ही परलोक सिधार जाएँ। पर यह मृत्यु कितनी महान और आदरमयी होगी ! यदि आपने उस अबला की रक्षा नहीं की, तो मैं समझूंगी कि मैं जीते जी विधवा हो गयी हूँ।”

राजपूत अब अपने आप को रोक नहीं सका। वह बावला हो गया। उसके नेत्र से अंगारे से दहकने लगे। वह तडपकर बोला। “तुम राजपूत के जौहर देखना चाहती हो?”

“मैं उसे अपने धर्म पथ पर चलते देखना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ, वह अपने अतीत को न भूले। वह अपने शौर्य और कर्तव्य को ना भूले।”

उसी समय एक कार आ गयी। तेज सिंह ने अपने ड्राईवर को तत्परता से कहा, “इस कार की बैटरी लगाओ।” उसने हाथ के इशारे से कार को रोक दिया। राजपूत ने अपने साथी की कटार  ली। भूखे बाज की तरह वह बस से उतरा। तेज सिंह बन्दूक लिए खड़ा था। राजपूत ने अपनी कटार फेंकी, कटार तेज सिंह की पीठ पर जा कर लगी। तेज सिंह ने बन्दूक तानी। राजपूत तलवार निकालकर उस पर झपटा। फायर! राजपूत का एक हाथ जख्मी हो गया। उसने उसकी कोई परवाह नहीं की, वह तेज सिंह पर टूट पडा। उसको इस तरह टूटते हुए देखकर राजपूत का साथी भी लपका। तेज सिंह दूसरा फायर करना चाहता ही था कि उसके साथी ने बन्दूक को पकड़ कर ऊपर कर दिया।

राजपूत ने तलवार के वार शुरू कर दिया। जिस डाकू के तलवार लग गयी, वह वहीँ ढेर हो गया। लेकिन तेज सिंह बलिष्ठ और साहसी था। उसने जोर के धक्के से राजपूत के साथी को गिरा दिया। बन्दूक को उस पर तानकर जैसे ही फायर करना चाहा, वैसे ही राजपूत ने तेज सिंह पर तलवार का वार कर दिया। तेज सिंह को एक बार धरती घूमती हुई लगी। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। लेकिन वह खूंखार भेडिया फिर से संभला। पूरे जोश के साथ फिर से वह राजपूत पर टूट पडा।

तभी राजपूतानी चिल्लाई, “आप सब बस में बैठे बैठे क्यों डर रहे हैं? जाइए न, उनकी मदद कीजिये!जाइए!”

उसकी ललकार पर एक जाट और ड्राईवर कूद पड़े। ड्राईवर के हाथ में एक लोहे की हथौड़ी थी। जाट ने आई हुई कार का हेंडिल खोल लिया। दोनों तेज सिंह पर टूट पड़े।
फायर!  चीखे।

लोगो ने देखा कि राजपूत एक ओर लुढक गया है। अब राजपूतानी अपने को रोक नहीं सकी। बेतहाशा अपने पति की ओर लपकी। पहली बात लोगो ने उस वीरता की तेजस्वी महान नारी के दर्शन किये। उसका चेहरा अद्भुत ओज से दीप्त था। आँखे बड़ी बड़ी और साहस की प्रतीक थी। राजपूतानी को उतरते देख बस की भीड़ डाकुओं पर टूट पड़ी। डाकू तेज सिंह भी बेहोश हो गया था। उसके साथी बस के कब्ज़े में थे।

राजपूत घायल अव्स्तहा में तड़प रहा था। वह अस्फुट स्वर में कह रहा था, “पानी!...पानी...!”
राजपूतानी ने आकुल स्वर में कहा, “पानी!”

तुरंत पानी लाया गया पानी की बुँदे जाते ही राजपूत ने आँखे खोली। उस समय तक सेठ भी सचेत होगया था। जब उसे मालूम हुआ कि उसकी बेटी की रक्षा के लिए एक वीर ने डाकुओं से संघर्ष किया है, तब वह राजपूत की और लपका। मन्नी को भी पानी छिडककर सचेत कर लिया गया था; वह भी राजपूत के पास आ गई थी।

राजपूत ने स्नेह विगलित स्वर से कहा, “कुंवराणी,वह लड़की कहाँ है?”

कुंवराणी ने सजल नयनों से देखा। तभी सेठ ने कहा, “यह रही मन्नी, मेरी बेटी, बिल्कुल ठीक है। आओ बेटी, इधर आओ। तुझे तेरा भैया पुकारता है।”

मन्नी राजपूत के पास आई। राजपूत का एक हाथ बिल्कुल घयाल हो चूका था। एक गोली सीने में लगी थी। लहूलुहान दूसरा हाथ भी था, किन्तु दूसरे हाथ से मन्नी को आशीष दिया। उसके सिर पर हाथ रखकर धीमे से बोला, “अच्छी है न बहन?”

मन्नी से कुछ बोला भी नहीं गया। वह फफक पड़ी। बाद में राजपूत ने राजपूतानी की ओर देखा। उससे वह टूटते हुए स्वर में बोला, “कुंवराणी! “मैंने तुम्हारी बात पूरी कर दी, वह लड़की अच्छी है...अच्छा कुंवराणी, भूल चूक माफ करना। मेरे माँ बाप की जिम्मेदारी अब तुम्हारी है। वे बहुत बूढ़े हो चुके हैं।”

कुंवराणी दहाड़ मार बैठी, “नहीं,नहीं! ऐसा नहीं हो सकता! इन्हें जल्दी से अस्पताल ले चलिए।”

राजपूत के चेहरे का ओज निस्तेज हो गया। वातावरण में मृत्यु की ख़ामोशी और सन्नाटा छाता गया। सारे यात्रियों की आँखे नम थी। समीप ही तेज सिंह अचेत पडा था। जो कार आई थी, उससे राजपूत को अस्पताल ले जाए और पुलिस को खबर करने की व्यवस्था की गयी। लेकिन राजपूत का रक्त बहुत बह चूका था। उसने एक बार फिर कुंवराणी की तरफ देखा। उसके हाथों से मेहंदी के फूल महक रहे थे। राजपूत अपनी आँखों से उन मेहँदी के फूलों को देखता रहा जो सुहाग के चिन्ह थे। राजपूतानी विपुल वेदना से तड़प रही थी। 

वह एक बार फिर चीखी, “इन्हें अस्पताल ले चलिए।”

लोगों ने राजपूत को उठाना चाहा। उसने हाथ से न उठाने का संकेत किया। उसका चेहरा स्याह हो गया। उसने एक बार फिर मेहँदी रचे कुंवराणी के हाथों को देखा। मुस्कुराया। उन्हें चूमा। कुंवराणी दर्द से काँप रही थी। उसने कांपते स्वर में कहा, “आप बिल्कुल ठीक हो जायेंगे, इन्हें जल्दी अस्पताल ले चलिए।” और राजपूत ने कुंवाराणी के हाथों को अपने सीने से लगा लिया। 

उसकी आँखे फट गयी। उसके हाथ फ़ैल गए। कुंवराणी और सारी उपस्तिथि सुबक पड़ी। कुंवराणी ने अपने हाथ उठाये। हाथों पर बने मेहंदी के फूल खून से विभत्स धरातल की तरह सपाट बन गए थे, जैसे हाथों पर कुछ था ही नहीं, सिर्फ रक्त ही रक्त !

- यादवेन्द्र शर्मा 'चंद्र' 

रविवार, जनवरी 06, 2013

पैसा और दोस्त

पच्चीस सालों बाद अचानक स्कूल के एक दोस्त का फोन नंबर मिला तो गोपाल खुशी के मारे उछल पड़ा। दोनों दोस्त 2 साल तक  साथ साथ पढे थे मगर बाद मे आगे की पढ़ाई के लिए  दोनों अलग अलग हो गए , मगर वर्षों तक दोनों के दरम्यान पत्रों का सिलसिला चलता रहा ।  पत्रों के माध्यम से दोनों दोस्तों की दोस्ती  लगातार चलती रही मगर अपनी अपनी मजबूरीयों के कारण कभी मिल न सके ।
 
 वक़्त गुजरता गया और   धीरे धीरे पत्रों का आदान प्रदान भी कम होंने लगा । हर महीने आने वाले पत्र अब छ:  महीने  और फिर एक साल के अंतराल से आने लगे । और फिर धीरे धीरे ये सिलसिला भी टूट गया। संचार क्रांति आई तो  दोस्तों ने एक दूसरे को संचार माध्यमों के द्वारा खोजना  शुरू  किया।  सोसल साइट्स से लेकर सर्च इंजनों मे तलाश चलती रही।  उनकी मेहनत रंग लाई और आज गोपाल को अपने दोस्त के बेटे का फोन नंबर मिला । अपने दोस्त के बेटे से बात करके बहुत खुश हुआ।  गोपाल ने  दोस्त के बेटे से अपने दोस्त सुदर्शन  के बारे मे पूछा और उससे  बात करवाने को कहा।  बेटे ने कहा अंकल ,"पापा शाम को मिलेंगे तब आप फोन करना"
 
गोपाल शाम होने का  इंतजार करने लगा और फिर आखिरकार पच्चीस साल पहले बिछुड़े दोस्त से  बात हुई तो  मारे खुशी के बरबस आँखों मे आँसू निकाल आए । दोनों  दोस्त देर तक बातें करते रहे , अपने स्कूल के दिनों से लेकर अब तक के सफर को दोनों ने एक दूसरे से शेयर किया।  फोन पर बातों का सिलसिला चल निकला और दोनों दोस्त घंटों बात करते  , एक दूसरे के परिवार के बारें मे पूछते , एक दूसरे के बच्चों से बातें करते ।
 
दो महीने  तक दोनों दोस्त आपस मे अपने स्कूल के दिनों के चर्चे करते और हँसते रहते । दोनों ने अपने बेटे बेटियों की शादी मे मिलने के वादे किए । 
 
 एक दिन बातों बातों मे सुदर्शन ने गोपाल से कहा ,"यार मेरे अकाउंट मे बीस  हज़ार रुपए ट्रान्सफर कर देना , मुझे कुछ जरूरत है "। 
 
"हाँ  ठीक  है , अपना अकाउंट डिटेल्स मुझे एसएमएस   कर देना ", गोपाल ने कहा। 
 
 कुछ दिन बाद सुदर्शन का फोन आया तो गोपाल ने रिसीव नहीं किया । कुछ अंतराल पे फिर सुदर्शन ने फोन किया मगर गोपाल ने काट दिया ।  
 
उसके बाद फिर किसी का फोन नहीं आया, और दोस्ती का सालों का सिलसिला सदा के लिए टूट गया ।
 
- "विक्रम"
 

सोमवार, दिसंबर 31, 2012

द्रोपदी

क्षितिज की
खोहों तक
पसरा सन्नाटा और
शाखाओं पर बैठे 
शोकाकुल पक्षी,
देकर  उलाहना
भौर की लालिमा को ,
को बता रहे हैं
बीती  रात
का वो स्याह सच ,
और दिखा रहे है
इशारों से
धरा का  वो
सलवटी हिस्सा
जिस पर मिलकर ,
दुशासनों ने
जी-भरकर ,
नोचा-खसोटा और
फेंक दिया जूठन सा
एक द्रोपदी को , मगर
सुनकर उसका 
कारुणिक क्रंदन
नहीं आया कहीं से
एक भी देवकीनंदन

-विक्रम

शनिवार, दिसंबर 15, 2012

तनहा सा मकान

सूनी-सी  पगडण्डी के
दुसरे  छोर पर ,
वो  तनहा  सा मकान
खड़ा है संजोये अतीत के
कुछ हसीन लम्हे,
निस्तेज, निस्तब्ध ,सुनसान !
उसकी बूढी दीवारों पे
हरी काली सिवार ,
लिपटी है लिए,
मिलन बिछोह के निशान .
टूटकर झूलता वो दरवाजा ,
किसी ने थामकर जिसे ,
गुजारे थे इन्तजार के
वो बोझिल लम्हे तमाम
-विक्रम 

शनिवार, नवंबर 24, 2012

घुसपैठ


मेरे तन्हा मन पे
निरन्तर होती है
घुसपैठ
तेरी यादों की,
और देर तक
होता है संघर्ष
टूटे ख्वाबों
को लेकर  ,
आखिरकार
पानी ज्यों बहते है
अश्क दोनों के, 
क्यों ना हम
मिलकर एक
समझौता करें, की ,
उधर तुम ,
अपनी यादों को
बांध के रखो ,
और इधर में,
करता हूँ कोशिश
बहलाने की,
इस  मासूम
दिल को।   

"विक्रम"

मंगलवार, नवंबर 13, 2012

मिठाई

अस्पताल के बरामदे मे अपनी बारी  के इंतजार मे खड़ा  बुधिया  बड़ी उत्सुकता से छोटी होती लाइन को देख रहा था। वह बार बार बैठकर अपनी थकान मिटाने की कोशिश कर रहा था। पिछले पाँच दिन से उसे कुछ भी काम नहीं मिला थे , जिसके चलते 3 दिन से घर मे चूल्हा भी नहीं जला।


 तुम !” , डॉक्टर ने उसे पहचानते हुये कहा। तुमने तो दो हफ्ते पहले खून दिया था ना? 

जी... हाँ डॉक्टर साहब, बुधिया ने दीनता से मुस्कराकर  हाथ जोड़ते हुये कहा ।

 लेकिन..... तुम इतनी जल्दी दुबारा खून नहीं दे सकते

 साहब , दया कीजिये , मेरा खून देना जरूरी है । मुझे पैसों की सख्त जरूरत  है। “ , बुधिया ने डॉक्टर के पैरों की तरफ हाथ बढ़ाते हुये कहा।


“नहीं” ,डॉक्टर ने बिना उसकी तरफ देखे इंकार ए सिर हिलाते हुये कहा।

“.....”,बुधिया  ने डॉक्टर के पैरों के पास बैठते हुये हाथ जोड़कर लगभग रो देने वाले अंदाज मे विनती की।  

 “लेकिन ऐसे इतनी जल्दी दुबारा खून देने से तुम्हें बहुत कमजोरी महसूस होगी, तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा। , डॉक्टर ने उसे समझाया ।

 

 “लेकिन मे ठीक हूँ , देखिये , बुधिया ने खड़े होकर अपना सीना आगे की तरफ निकालकर  ताकत दर्शाते हुये कहा ।
 

डॉक्टर ने नर्स की तरफ उसका खून लेने का इशारा किया । इशारा पाते  ही बुधिया मुस्कराता हुआ नर्स के पीछे पीछे चल पड़ा।
 

खून देने के बाद काउंटर से पैसे लेते वक़्त  बुधिया के चेहरे पे मुस्कान और गहरी हो गई और अस्पताल से बाहर आकार तेज़ कदमों से मिठाई की दुकान की तरफ बढ़ गया।  सुबह जब आस पड़ोस मे एक दूसरे के घरों मे दिवाली की मिठाइयों का आदान प्रदान हो रहा था तो उसके तीन से भूखे बच्चे ललचाई नजरों से उन्हे देख रहे थे ।  

/AK    

 

 


    
 

 


-विक्रम  
 

सोमवार, नवंबर 05, 2012

बेटी



“तूँ किससे शादी करेगी?” , नन्हें रिंकू ने अपने साथ झूले पे बैठी निक्की से पूछा।
“मेँ तो तुझसे ही शादी करूंगी”, मासूम निक्की ने बेपरवाही से जवाब दिया।

नन्हा रिंकू उसका जवाब सुनकर खामोश हो गया। दोनों बच्चे पार्क मे बने झूले पे झूल रहे थे। आज सामने वाले शर्मा जी के लड़की की शादी थी। चारों तरफ बहुत गहमा गहमी थी। बारात आने के बाद बैंड बजे का शोर शराबा लगातार तेज़ होता जा रहा था।

“आज रश्मि दीदी खेलने  क्यों नहीं आई ?”, रिंकू ने निक्की से पूछा।

“आज रश्मि दीदी की शादी है ना , इसीलिए नहीं आई ”, निक्की ने  कहा।

क्या शादी के बाद वो हमारे साथ खेलने आएंगी ?”

“बुद्दू !, शादी के बाद वो दूर चली जाएंगी”

“कहाँ ?”

“अपने दूल्हे के साथ”, निक्की का जवाब सुनकर नन्हा रिंकू खामोश हो गया।

लेकिन मेँ तो तुम्हारे साथ दूर नहीं जा पाऊँगा, मम्मी जाने नहीं देगी”,कुछ देर की खामोशी के  बाद रिंकू ने कहा। 

“लेकिन तब तक तो तुम बड़े हो जाओगे और बड़े होने के बाद मम्मी पापा कहीं भी आने जाने को मना नहीं करते। “

नन्हा रिंकू फिर से निक्की के तर्क पर खामोश हो गया।

“शर्मा जी ने अपनी इकलोती बेटी की शादी मे अपना प्रोविडेंट फंड और जमा पुंजी का सब पैसा लगा दिया थादूल्हा अजय डॉक्टर था। शर्मा जी की लड़की रश्मि एक स्कूल मेँ पढ़ाती थी। शर्माजी काफी धार्मिक पृवर्ती के इंसान थे इसीलिए कॉलोनी मे उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी।

दिनभर शादी के कार्यकर्मो मे व्यस्त रहे शर्माजी बेटी की विदाई के वक्त बच्चे की तरह सुबक पड़े। रश्मि उनकी बेटी ही नहीं बल्कि एक दोस्त जैसी थी। जब रश्मि 5 साल की थी तभी उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी। परिवार वालों के लाख समझाने पर भी शर्माजी ने दूसरी शादी नहीं की। उन्होने रश्मि को माँ बनकर पाला था। जवान होने पर रश्मि घर की ज़िम्मेदारी मे पिता का हाथ बंटाने लगी। वो अपने पिता का भी पूरा ख्याल रखती थी। वो एक माँ की तरह अपने पिता की देखभाल करती थी। जब कब शर्माजी काम की अधिकता के चलते वक़्त पे खाना नहीं खा पाते तो उन्हे रश्मि के गुस्से का सामना करना पड़ता। रश्मि के डांट-डपट मेँ शर्माजी को कभी अपनी स्वर्गवासी पत्नी तो कभी अपनी माँ की झलक मिलती , जब कभी वक़्त पे खाना ना खाने पर उनकी माँ या उनकी पत्नी उन्हे डांटती थी।

भारी मन से बाप-बेटी  समाज और प्रकृति के बनाए नियम के तहत एक दूसरे से बिछड़ गए। एक बाप के घर को वीरान करके बारात उसी बैंड बाजे के साथ चली गई जिस बैंड बाजे के साथ कुछ देर पहले खुशियाँ लेकर आई थी।

शादी के दो माह बाद रश्मि पिता से मिलने आई । हरदम चहकने वाली रश्मि अब काफी खोई खोई सी लग रही थी। पिता के लाख पूछने पर भी उसने बस ये कहकर बात टाल दी की सफर की थकावट की वजह से ऐसा हैं। एक दिन ठहरकर रश्मि वापिस अपनी ससुराल चली गई , मगर बूढ़े पिता ने बेटी की आंखो मे छुपे दर्द को पढ़ लिया था।

दो दिन बाद फिर से रश्मि आई तो शर्मा जी को एहसास हो गया की कुछ गड़बड़ है। उन्होने बेटी से पूछा मगर रश्मि फिर टाल गई और बोली को स्कूल मे हिसाब के कुछ पैसे बाकी थे वो लेने आई हूँ। शर्मा जी बेटी की आवाज मे छुपे दर्द को अनुभव कर रहे थे।  

“ठीक है कल मेँ भी चलता हूँ तूमहरे साथ तुम्हारे स्कूल, अभी थोड़ा बाजार से सामान लेता आऊं”, कहकर शर्माजी साइकिल लेकर बाहर निकल गए।

वापिस आए तो उनकी लाड़ली उन्हे सदा के लिए छोड़कर जा चुकी थी। रश्मि का शरीर पंखे से लटक रहा था। नीचे बिस्तर पर स्टैम्प पेपर के साथ सुसाईट नोट पड़ा था।  ससुराल वाले रश्मि पे लगातार दवाब बना रहे थे की अपने पिता का मकान अजय के नाम करे ताकि अजय वहाँ डिस्पेन्सरी खोल सके।

पूरी कॉलोनी मे शोक की लहर दौड़ गई। जिसने भी सुना वो शर्मा जी के घर की तरफ दौड़ पड़ा।

रिंकू आज झूले पे अकेला ही था। निक्की ने उसे  कह दिया की वो अब लड़को के साथ नहीं खेलेगी।

विक्रम”


बुधवार, अक्टूबर 24, 2012

रेवती चाची



चित्र गूगल आभार 
रेवती चाची बीस साल की उम्र मे विधवा हो गई थी। पति की मौत के वक़्त वो पेट से थी। अपने से दस साल बड़े शराबी जगन से शादी होने के बाद उसका दो साल का वैवाहिक जीवन कष्टपूर्ण ही रहा। रोज रोज जगन का शराब पीकर घर आना और रेवती से मार पीट करना। घर के इसी घुटन भरे माहौल से परेशान होकर शादी के सालभर बाद जगन की माँ भी चल बसी थी। उसके पिता तो उसकी बाल्यवस्था  में ही भगवान को प्यारे हो गए थे।

माँ के लाड़-प्यार ने इकलौते जगन को जरूरत से ज्यादा आज़ादी दी थी जिसकी बदौलत बचपन से जिद्दी जगन जवानी मे कदम रखने से पहले ही शराबी बन चुका था। परिवार और मोहल्ले वालों के समझाने पर  जगन की माँ ने उसके फेरे करवा दिये, सोचा पैरों मे बेड़िया पड़ेंगी तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। अपनी  घर गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ निभाने लगेगा तो शराब की आदत स्वत: छूट जाएगी।

शादी के बाद भी जगन की हरकतों मे बदलाव की गुंजाइस नजर नहीं आई और इसी कशमकश से परेशान होकर एक दिन उसकी माँ भी चुपके से भगवान के पास चली गई। रेवती का एक मात्र सहारा भी चला गया। दोनों सास बहू अपने बुरे वक़्तों को साझा कर लिया करती थी मगर अब तो सारे दुख रेवती को अकेले ही वहन करने होंगे।

घर में पैसे की तंगी आई तो रेवती ने सिलाई मशीन से अपना और अपने शराबी पति का भरण-पोषण करना शुरू किया। आधे से ज्यादा पैसे तो जगन की शराब मे ही चले जाते। कभी कभार बिना खाये ही गुजारा करना पड़ता। लेकिन उसे मार जरूर खानी पड़ती। कभी खाना न होने पर तो कभी खाना खाने के लिए कहने पर। अपने नसीब को कोसती वो इस इंतजार मे संघर्ष करती रही की सायद अच्छे दिन कभी तो आएंगे।

एक रात जगन घर नहीं आया ,किसी ने सुबह उसे बताया की जगन गाँव के बाहर चौराहे में पड़ा है और गाँव वाले उसको घेर कर खड़े हैं। वो तुरंत बताने वाले के साथ उस तरफ चल पड़ी। सामने से कुछ लोग जगन को कंधे पे उठाए ला रहे थे। गाँव की औरतों ने रेवती चाची को रोक लिया और उसको उसके घर में ले आई। जगन को घर के बाहर चबूतरे पर लिटा दिया। गाँव की औरते रेवती को पकड़ जगन के पास ले आई और उसके दोनों कलाइयों से चुड़ियाँ तोड़कर जगन पे डाल दी। अचानक हुये इस हादसे ने रेवती को हिलाकर रख दिया था।   

जगन के बरहवीं के कुछ दिन बाद रेवती के भाई उसको अपने साथ ले गए। मगर माँ के घर में स्वेन्दनाओं के पाँच साल गुजरने के बाद रेवती का बुरा वक़्त फिर उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसकी माँ के देहांत के कुछ माह बाद ही घर का माहौल बदले लगा। वही भाभियाँ जो रेवती दीदी कहते नहीं थकती थी अब उस से किनारा करने लगी थी। अक्सर बात बात पे ताने मिलने लगे।  
थक हार कर अपने चार साल के बेटे विनोद को ले ससुराल मे आ गई। वो ससुराल जहां उसके सिवा उसका कोई नहीं था। अपने बंद पड़े मकान को साफ सुथरा करके वो जीवन से संघर्ष करने निश्चय कर  चुकी थी। अपनी बंद पड़ी सिलाई मशीन को हथियार बना वो कर्मयुद्ध को तैयार थी। अपनी माँ से दहेज स्वरूप मिली ये मशीन उसके जीवन यापन का एक मात्र सहारा थी।

बचपन से हमने रेवती चाची को संघर्ष करते ही देखा था। आज अपने बच्चे को पालने और लिखाने पढ़ाने की ज़िम्मेदारी निभा रही थी मगर चेहरे पे सिकन तक नहीं थी। जब भी हमारे घर आती थी उसका चार पाँच साल का बेटा विनोद उसके पल्लू से चिपका रहता था। वही उसके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था। विनोद कल को जवान होकर अपनी माँ की जिम्मेदारियाँ अपने कंधो पे उठा लेगा तो जीवन भर संघर्ष करती रेवती को आराम मिलेगा।  

वक़्त अपनी गति से गुजरता रहा। विनोद जवानी की देहलीज पे कदम रख चुका था। माँ की मेहनत रंग लाई और उसे एक कंपनी मे अच्छी पगार पे नौकरी भी मिल गई। रेवती चाची के दुखों का अंत हो गया था। वो अपनी खुशी को दोगुना करना चाहती थी। उसने विनोद की शादी करदी और घर में दुल्हन के आने से चहल पहल बढ़ गई थी। वो घर जो सुना सुना सा रहता था आज भरा भरा सा लग रहा था। रेवती चाची की मेहनत आखिर रंग लाई और उसने दुखों से संघर्ष कर खुशियों को हासिल किया।
विनोद की शादी के लगभग पाँच साल बाद दो दिन के लिए किसी कारणवश गाँव आया तो सोचा जाने से पहले रेवती चाची ने मिलता चलूँ। मैंने दरवाजे पे दस्तक दी तो रेवती चाची ने दरवाजा खोला, मुझे पहचानते हुये मेरे सिर पे हाथ फेरा और अंदर आने को कहा। घर के आँगन के बीचों बीच एक सिलाई मशीन रखी थी जिसके आस पास कपड़ों का ढेर पड़ा था।

“इस बार बहुत दिन बाद आए बेटे”, चाची ने पानी का गिलाश देते हुये कहाँ।
“हाँ चाची , बस ऐसे ही नहीं आ पाया “
“विनोद कहाँ है ?”, मैंने इधर उधर देखते हुये कहा।
“वो और बहू तो पिछले तीन साल से शहर में ही रहते हैं”, रेवती चाची ने मशीन चलाते हुये कहा।

कुछ देर की खामोशी के बाद में चाची को संघर्षरत छोड़कर चला आया।

   
"विक्रम"

शुक्रवार, अक्टूबर 19, 2012

सर्द सुबह की धुंध


सर्द सुबह की धुंध 
में भीगकर 
तुम चली आओ ..
इस तरफ के मौसम
अपनी तपस से 
झुलसाने लगे हैं 
उन हसीन ख्वाबों को 
और लगे हैं कुम्हलाने 
तुम्हारी यादों के 
मखमली अहसास..
अपने बदन से 
लिपटी इन मनचली
ओस की बुंदों को 
झटककर गिरा दो 
उन झुलसते लम्हों पर  
जो तन्हाईयों के बोझ
तले टूटने लगे हैं.. फिर 
समेट अपनी बाहों में 
पहुंचा दो शीतलता 
के चरमोत्कर्ष पर.. 
ठिठुरने ना देना 
 अपनी गरम 
साँसों से....मुझे

"विक्रम"

सोमवार, अक्टूबर 15, 2012

फर्क


कॉलेज छूटने के बाद  निहारिका अपने सहपाठी विकाश के जिद्द करने पर उसके साथ  पार्क मे घूमने चली गई। दोनों ने वहीं पे खाना खाया और बातों ही बातों मे कब सांझ हो गई पता ही नहीं चला।

“हमे अब चलना चाहिए विकाश “, निहारिका ने कहा।

“हाँ , चलो “, कहकर दोनों बाहर जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ गए।

घर पहुँचकर निहारिका तुरंत अपने कमरे मे गई तो पीछे पीछे  उसकी मम्मी  भी पैर पटकती हुई पहुँच गई । निहारिका को इसका पूर्वानुमान पहले से था।

“कॉलेज से आ रही हो या नौकरी से ? शाम के छ:  बज चुके है। कुछ तो ख्याल करो। “

“आज थोड़ी देर हो गई मम्मी , ....वो विकाश जिद्द करने लगा तो हम  साथ मे पार्क चले गए  फिर खाना खाने और घूमने मे वक़्त का पता ही नहीं चला” , निहारिका ने सांस छोड़कर कुर्सी पर बैठते हुये कहा 

“लड़की जात का इतनी देर तक घर से बाहर रहना और किसी पराए मर्द के साथ घूमना अच्छी बात नहीं है, किसी ने देख लिया तो लोग तरह  तरह की बातें बनाएँगे। ऊपर से मौहल्ले वालों को बैठे बिठाये  इज्जत उछालने  का मौका मिल जाएगा। “ मम्मी  उसके पास आकर फुसफुसाते हुये कहने लगी।

“लेकिन मम्मी ऐसा वैसा कुछ नहीं है, में और विकाश सिर्फ दोस्त है। और फिर उस दिन में आपके साथ बाजार गई थी तो आपने देखा की  राहुल भैया भी उस दिन एक लड़की के साथ बाजार मे घूम रहे थे”

“उसका क्या है , वो तो लड़का है “,  मम्मी उसके कंधे को हाथ से धकेलते हुये रसोई मे चली गई ।


शनिवार, अक्टूबर 13, 2012

अस्पृश्यता


चित्र मे जो आप देख रहे हैं ये मेरे गाँव का एक पुराना कुआं है जो आज से करीब पच्चीस  साल पहले बहुत आबाद  हुआ करता था ।  एक जमाना था जब इसपर एक साथ चार  रहट चलते थे और लोग अपनी बारी के इंतजार मे इसके चारों और बने चबूतरे  पर रातभर बैठे रहते थे।   

आज से करीब 20 से 25 साल पहले अस्पृश्यता बहुत ज्यादा थी, जो आज के दौर मे थोड़ा सा कम  है। ऊंच-नीच, छुआ-छुत का काफी बोलबाला था।  ऊँची जाति के लोग (खासकर  ब्राह्मण,बनिये)  नीची जाति के लोगों के पास से निकलते हुये निश्चित दूरी बनाकर निकलते थे और किसी चीज के लेन-देन के वक़्त हाथों मे एक निश्चित फासला रखते थे। मगर हँसी तब आती थी जब कोई नीची जाति का  आदमी बनिये की दुकान से कुछ खरीदने जाता तो बनिया उसके हाथ से पैसे लेते वक़्त कोई फासला नहीं रखता मगर उसके बदले समान देते वक़्त फासला बना लेता। कभी किसी नीची जाति के किसी सदस्य को किसी ऊँची जाति के घर किसी काम से जाना होता तो वो वहाँ पहुँचकर  घर के बाहर ही खड़ा हो जाता , उसको अंदर आने मे झिझक होती थी , हालांकि मैंने कभी सुना नहीं की किसी ऊँची जाति के आदमी ने उसको अंदर आने से मना किया हो , लेकिन लोगों ने अपनी धारणा कुछ ऐसी बना ली थी। ना कभी  नीची  जाति के लोगों ने  आगे बढकर इस अस्पर्शयता की दीवार को लांघने  की हिमाकत की और ना ही ऊँची जाति के लोगों ने इस दीवार की गिराने की।
...ऊँची जाति के लोग (खासकर ब्राह्मण,बनिये) नीची जाति के लोगों के पास से निकलते हुये निश्चित दूरी बनाकर निकलते थे और किसी चीज के लेन-देन के वक़्त हाथों मे एक निश्चित फासला रखते थे। मगर हँसी तब आती थी जब कोई नीची जाति का आदमी बनिये की दुकान से कुछ खरीदने जाता तो बनिया उसके हाथ से पैसे लेते वक़्त कोई फासला नहीं रखता मगर उसके बदले समान देते वक़्त फासला बना लेता।  

पानी की सतह  उन दिनों करीब सौ हाथ पे होती थी, यानि 150 फीट के आस पास। इसके आमने सामने के मुख्य भाग पे  पत्थर की बड़ी बड़ी सिलाओं  पे दो दो रहट आमने सामने लगे रहते थे । उस वक़्त इसका नाम “चार भूण (रहट) वाला कुआ” था जो आज भी वही है।  दाईं तरफ के दोनों रहट ऊंची जाति के लोगों के लिए थे और बायीं तरफ के दोनों रहटों में से एक ज्यादा नीची जाति और दूसरा कम नीची जाति के लिए आवंटित था।

ऐसा ही कुछ कुए से पानी निकालते  वक़्त होता , ज्यादा भीड़ होने पे ऊँची जाति के लोग नीची जाति वाले रहट की तरफ खिसकने लगते । चूंकि नीची जाति के लोगों की संख्या कम थी तो वहाँ भीड़ नहीं रहती थी। जब वहाँ नीची जाति के लोग नहीं होते तो ऊँची जाति वाले उस जगह पे थोड़ा पानी छिड़कते और उसके बाद अपने मटके वहाँ रख लेते। लेकिन कभी किसी का ध्यान उस तरफ नहीं गया की आखिरकार पानी तो उसी कुए से आता है  जिसमे दोनों जाति के लोगों की  रस्सी से बंधे बर्तन (डोल ) डुबकी लगाकर बाहर आते हैं। कभी कभी दोनों जातियों की रस्सियाँ और डोल अंदर आपस मे उलझ जाते और ऊपर आने पर वो अपनी अपनी रस्सियाँ अलग करके फिर से पानी खींचने मे लग जाते ।

ऐसा ही हाल कुए के बगल मे बने मंदिर में था। ऊँची जाति के लोग बड़े मजे से मंदिर के अंदर जाकर भगवान के दर्शन और पुजा-अर्चना कर  लेते थे मगर नीची जाति के लोगों के लिए मंदिर की सीढ़ियों के पास ही एक जगह निर्धारित की हुई थी जहां खड़े होकर वो “ऊँची जाति के  भगवान” की एक झलक पा लेते और वही से पूजा-अर्चना कर वापिस लोट जाते ।   

मतलब उस वक़्त मौकापरस्ती वाली छुआ-छूत थी। अगर समय है तो जात दिखाओ अन्यथा गर्दन नीची करके काम निकाल लो।  अब वक़्त ने करवट बदली है , बिजली पानी मे कुछ सरकारी दखलंदाज़ी होने से अब पानी खींचना नहीं पड़ता।   आज कभी गाँव जाता हूँ तो देखता हूँ तो वही नीची जाति के लोग जो घर के अंदर आने मे झिझकते थे आज बे-धडक अंदर आ जाते हैं और इशारा पाने पर पास रखी कुर्सी या स्टूल पे धडल्ले से  बैठ जाते हैं। हाथ मिलाना,साथ चलना तो आम हो गया। कुए की जगह अब पानी की टंकियाँ बनी है जिसमे नल लगे हैं मगर अब उन नलों  का जाति के हिसाब से बंटवारा नहीं किया गया। ये सामाजिक बदलाव की पहल वक़्त ने की है न की किसी जाति विशेष ने।

"विक्रम"

नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

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