रविवार, अप्रैल 28, 2013

अंधेरा

बैठकर कुछ पल
इंतजार के सूने पहलू मेँ,
सिसकती शाम गुजर गई  
छोड़कर  तन्हा सुसप्त
तन्हाईयां 


शैशव अधेरा घुटनों के बल ,
रेंगता हुआ ताकता है डर से
बादलों से झाँकते चाँद को,
चंचल चाँदनी रातभर, खेलती हैं
अंधेरे के खंडित अस्तित्व से ।
 
नवयौवना सी अल्हड़ चाँदनी
डालकर गलबहियाँ, चाँद को
मुस्कराती है मंद मंद और,
चिढ़ाती है अपाहिज अंधेरे को ।

तरुण ज्योत्स्ना के मोहपाश मेँ
आलिंगनबद्ध चाँद, सो गया  
पलभर को खोकर होशोहवास  ,
हो गया हरण, बेसुध चाँदनी का ,
ले उड़ा उसे अंधेरा
दूर .....बहुत दूर....

 
विक्रम”

 

13 टिप्‍पणियां:

  1. नज़र चूकी तो क्या क्या हो जाता है ...
    दरअसल नज़र भी नहीं ... किसी के मोहपाश का कसूर है ...
    अच्छी रचना है ...

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  2. हो गया हरण बेसुध चांदनी का ...
    बुराई का प्रतिक अँधेरा चाँद के ओझल होने का टकटकी लगाकर ओझल होने का इन्तजार करता है,और पल भर में ही अपना कब्जा जमा लेता है...सुंदर अभिव्यक्ति

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार के "रेवडियाँ ले लो रेवडियाँ" (चर्चा मंच-1230) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत खूब रचना | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  5. सार्थक और सुंदर प्रस्तुति
    सहजता से कही मर्म की बात
    बधाई

    आपके विचार की प्रतीक्षा में
    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
    jyoti-khare.blogspot.in
    कहाँ खड़ा है आज का मजदूर------?

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  6. "चंचल चाँदनी रातभर, खेलती हैं
    अंधेरे के खंडित अस्तित्व से ।"
    आपकी इन पक्तियों मे आशा ओर निराशा के बीच का ध्वन्ध का
    रमणिक चित्रण किया गया है

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत खूब...बहुत उत्कृष्ट मनभावन चित्रण...

    जवाब देंहटाएं

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