सोमवार, जून 11, 2018

रिश्ता


अतीत के आले में
एक बेनाम-सा रिश्ता 
छुपाकर अपनों से, 
सहेज के रखा है वर्षों से...
मैं ताउम्र उसके लिए 
तलाशता रहा एक 
उपयुक्त सा सम्बोधन, 
ताकि पुकार सकूँ उसे...
मगर चाहकर भी,
आवंटित ना कर सका 
कोई सार्थक सा नाम,
और बस बैठाता रहा 
तारतम्य नामांकित 
और बेनाम-से 
रिश्तों के 
दरमियाँ 
उम्रभर..!

"विक्रम"


रविवार, मई 27, 2018

बंदा ये बिंदास है !!




 आज से करीब 5,6 साल पहले फेसबूक पर एक शख्स के साथ एक सामाजिक मुद्दे को लेकर बहुत खिंचतान हुई। कई दिनों तक हम दोनों के बीच काफी कहासुनी होती रही। मुद्दा हालांकि एक कम्यूनिटी से संबन्धित था ओर हम दोनों उसी कम्यूनिटी के थे । मगर एक दूसरे के विचारों से सहमत नहीं होने से बड़ी गंदी वाली बहस हो गई थी । कुछ दिन बोलचाल बंद हुई , एक दूसरे को ब्लॉक किया । मगर दोनों ही एक ऐसे स्टेट ओर बिरादरी से ताल्लुक रखते थे जहां जानवर तक को आदर से पुकारा जाता है, ओर इसी के चलते हमारी बहस का स्तर गिरा नहीं था।

 
बाद मे हम दोनों ने एक दूसरे से बात की, एक दूसरे को समझा ओर मुद्दे को सुलझा हम दोस्त बन गए । ओर मजे की बात देखिये मुझे सालभर बाद पता चला को वो साहब पुलिस इंस्पेक्टर थे । खैर जब इतनी गर्मागर्मी हुई तो जाहीर है दोस्ती भी होनी ही थी । उसके बाद हम 3,4 बार काफी सारे FB फ्रेंड्स के साथ मिले हैं , अक्सर गेट-टुगेदर होता रहता है ।

इनकी खासियत है समय मिलने पर खूब सारे दोस्त ओर खूब सारी मस्ती करना। हालांकि ऐसी नौकरी मे इतने सारे दोस्तों के लिए समय निकालना काफी मुश्किल होता है , मगर ये अपने दोस्तों के लिए समय निकाल ही लेते हैं। ये एक ज़िंदादिल , बेफ़िकरे ओर बिंदास इंसान हैं ।

“यायावर” तखल्लुस के साथ बेहतरीन कवितायें भी लिखते हैं, तरन्नुम के साथ इनकी कवितायें सुनने का मजा ही कुछ ओर है, अक्सर कवि-सम्मेलनों के लिए वक़्त निकाल लेते हैं। राजपूतों के इतिहास पर भी बहुत अच्छी पकड़ है इनकी। जिस शहर मे रहते हैं वहाँ से जब इनका तबादला होता है तो वहाँ के लोग इनका ट्रान्सफर रुकवाने ओर अपराधी ट्रान्सफर करवाने के लिए पूरा ज़ोर लगा देते हैं । अक्सर चर्चा मे रहने वाले इन शख्स का नाम है महावीर सिंह राठौड़ है !, आजकल सीकर शहर के कोतवाल हैं ।

बशीर बद्र साहब का एक शेर याद आता है की ;
"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों "
                               

रविवार, मार्च 11, 2018

मुलाक़ात

अचानक किसी ने ज़ीने में लगे  बिजली का स्विच ऑन किया तो छत पर दूर तक रोशनी फ़ेल गई।  किसी के आने आहट सुनकर राहुल ने पीछे पलट कर देखा तो एक युवती जिसने कमर से ट्राई कलर का दुपट्टा बांध रखा था , रस्सी से सुख चुके कपड़े उतार कर इकट्ठा कर रही थी। राहुल की तरह उसकी पीठ होने से वो उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था । दो दिन पहले ही वह किराए के इस मकान मे रहने आया था। उसे शहर के एक अच्छे कॉलेज मे दाखिला मिल गया था।  सूर्यास्त के समय अचानक बिजली गुल होने पर राहुल गर्मी से निजात पाने ऊपर छत पर जाकर टहलने चला आया था। विशाल छत पर घूमते हुये वो अक्सर मुड़ कर लड़की का चेहरा देखने को कोशिश कर रहा था।  अचानक लड़की पलटी , उसे महसूस हुआ की कोई उसे कनखियों से देख रहा है।

नज़रें मिली.... लड़की ने घूरने वाले अंदाज से राहुल को देखा.... राहुल को लगा जैसे किसी ने उसे चोरी करते हुये पकड़ लिया हो । उसने सकपका कर नजरे फेर ली। लड़की कपड़े लेकर नीचे जा चुकी थी, साथ ही ज़ीने की बत्ती भी बंद हो गई ।  दूर पेड़ों के झुरमुटों से निकलकर चाँद छत पर चाँदनी फैलाने आ गया था ।

दूसरे दिन राहुल फिर उसी वक़्त छत पर पहुँच गया, कल के अनुभव ने उसे बैचेन कर रखा था। कपड़े आज भी सूख रहे थे। कुछ देर बाद फिर वही आहट पाकर उसने मुड़कर देखा । वही लड़की थी , उसने आज भी वही ट्राई कलर का दुपट्टा कमर से बांध रखा था ओर चुपचाप कपड़े समेट रही थी।

कुछ देर पश्चात लड़की पलटी.... नज़रें मिली …… राहुल की धड़कने बढ़ने लगी ..... मगर राहुल ने आज हिम्मत करके अपनी नज़रें नहीं हटाई । कुछ देर पश्चात ,लड़की हल्के से मुस्कराई ,कपड़े उठाए ओर सीढ़ियाँ उतरकर नीचे चली गई। राहुल भी मुस्कराकर देर तक उसके बारे मे सोचता रहा। युवा दिल ख्वाबों में काफी दूर निकल चुका था।

सिलसिला चलता रहा, लेकिन अभी तक कोई बातचीत नहीं हो पाई थी। रोज की तरह आज भी राहुल तय समय पर छत पर पहुँच गया , उसने सोच लिया था की आज उससे बातों का सिलसिला शुरू करूंगा।
आज छत पर कपड़े नहीं थे ,बस उसका ट्राई कलर का दुपट्टा सूख रहा था। राहुल इंतज़ार करने लगा । वो नहीं आई। अंधेरा हो चुका था । राहुल थक हारकर नीचे आ गया। उसने बगल वाले मकान के बंद दरवाजे की तरफ देखा जिसमे वो लड़की रहती है ।

दूसरे दिन फिर राहुल इंतज़ार करता रहा मगर वो नहीं आई ,उसका दुपट्टा उड़कर अलगनी से नीचे गिर गया था ,उसने पास जाकर धड़कते दिल से दुपट्टे को उठाया ओर प्यार से वापिस अलगनी पर टांग दिया। ।
चार पाँच दिन बाद भी वो अपना दुपट्टा लेने नहीं आई तो राहुल खुद उसका दुपट्टा लेकर नीचे आया ओर बगल वाले मकान का दरवाजा खटखटाया।

एक अधेड़ सी औरत  ने दरवाजा खोला । राहुल की नज़रें घर के अंदर तक गई ओर फिर वापिस महिला के चेहरे पर टिक गई। उसने हाथ आगे बढ़ाकर दुपट्टा महिला की तरफ बढ़ाते हुये कहा ,”आंटी.... ये दुपट्टा आपकी बेटी का .... चार पाँच दिन से छत पर नीचे पड़ा हुआ था। महिला ने दुपट्टा ले लिया , वो कुछ नहीं बोली। राहुल को कोई जवाब नहीं  मिला  तो वो मुड़कर वापिस लौटने लगा।
“बेटे....”, महिला ने पीछे से पुकारा ।
“जी... जी आंटी “, राहुल ने वापिस मुड़ते हुये कहा ।
“इधर आओ...”
“जी...”
“वो तुम्हें भी दिखाई दी थी बेटे  ....?“, महिला ने पूछा।
“जी... मेरा मतलब मैंने उन्हे छत से कपड़े लाते हुये देखा था तो ....सोचा वो भूल गई होंगी ,इसलिए देने आया  था”, राहुल ने हकलाते हुये सफाई दी।
“अंदर आओ बेटे”, महिला ने घर के अंदर जाते हुये कहा। राहुल पीछे पीछे ड्राइंग रूम मे सोफ़े पर बैठ गया। महिला भी साइड के सोफ़े पर  बैठ गई।
“बेटे .... ओर मेरी बेटी थी “, महिला ने उदास स्वर मे कहा ।
“थी..... मतलब ?”
“हाँ बेटे, आज से दो  साल पहले वो एक हादसे में हमें छोड़कर चली गई थी।  उसने उस दिन यही ट्राई कलर वाला दुपट्टा पहन रखा था , जिसे हमने संभाल कर उसके कमरे मे उसकी बाकी यादों के साथ सहेज कर रखा हुआ है..... ।“, महिला ने रोते हुये कहा ।
राहुल के कानों मे सीटियाँ बज रही थी, वो बोझिल कदमों से अपने मकान की तरफ बढ़ गया।
 -विक्रम





शनिवार, मार्च 03, 2018

पारो भाभी



गांवों मे रिश्तों के लिए सम्बोधन होते हैं, चूंकि हम उस वक़्त बचपन के दौर मे थे तो वहीं पारो भाभी पचपन के दौर में थी इसलिए हमें उन्हे भाभी कहने मे झिझक महसूस करते थे जिसके चलते हम लोग उन्हे “ताई” कहकर पुकारते थे । हमने सुना था की पारो ने हम लोगों को गोद मे खिलाया था। वैसे पारो का असली नाम पारो नहीं था , वो तो गाँव वालों ने पारो के गाँव के नाम पर उनका नाम रख दिया था , उनके गाँव का नाम “पार” था इसलिए उनका नाम “पारली” या पारो” पड़ गया। पारो अपने दुखों से इतनी परेशान नहीं होती थी जितना वो दूसरों की दुख की खबर सुनकर परेशान हो जाती थी ।   जैसे ही उन्हे पता चलता की गाँव मे फलां की बहू को या बेटे या बेटी को बुखार है तो पारो भाभी वहाँ उनका दुख बांटने पहुँच जाती। पारो की सहानुभूति में औपचारिकता या दिखावा लेशमात्र का भी नही होता था , सामने वाले के दुख पर उनकी  आँखों से आँसू निकलने लगते थे ।

किसी परिवार का बीमार सदस्य जब तक ठीक नहीं हो जाता पारो बराबर उनके घर जाकर खैरियत लेती रहती थी । इस बीच पारो के अपने घर का काम बाकी पड़ा रहता था।  अपनी उम्र के आखिरी दौर मे पारो भाभी खुद बीमार रहने लगी मगर बावजूद इसके वो पास-पड़ोस की खोज खबर लेती रहती ओर हिम्मत करके वो लोगों के घर पहुँचकर बीमार का हाल-चाल पूछ लेती थी। मगर एक वक़्त ऐसा आया की  उनका चलना फिरना तक मुहाल हो गया  ओर अब वो घर मे कैद हो रह गई थी । दिनभर खटिया मे पड़ी पारो भाभी  गाँव के किसी व्यक्ति के आने की राह देखती रहती ताकि उससे गाँव के हाल पूछ सके , मगर थक-हारकर अपने ही बेटे या बहू से गाँव के हाल चाल पूछने लगती । लंबी बीमारी के बाद एक दिन पारो अपने अंतिम सफर पर निकल पड़ी। गाँव के कुछ लोग औपचारिकता निभाने आ गए थे।   
(सच्ची घटना पर आधारित)



रविवार, जनवरी 07, 2018

अनुबंधित यादें

मुंडेर  के दोनों ओर
 धूप में फैला दिया है
तुम्हारी अचैतन्य ओर   
सीलनभरी यादों को  ,
ज़हन मे क्रमबद्ध
अभिलिखित है वो  
सिलसिले,जो
आतुर है पुनरारंभ को ।
मासूम से बच्चे की मानिंद
हुलस कर, आ लगती हैं  
गले,कुछ उनींदी यादें ।  
जन्म-जन्मांतर तक
अनुबंधित है
तुम्हारी

यादें.....

"विक्रम"

रविवार, अक्टूबर 15, 2017

दर-ब-दर

बालिश्त दर बालिश्त
गुजरती उम्र,
गिनती रही पोरों
पे वो पड़ाव ,जो
बदलते रहे मायने
ज़िंदगी के ,
यादों की पुनरावृतियां
लाती रही सुनामीयां, 
बस यूँ कटता रहा
उबाऊ सफर
अनिश्चितताओं
के संग
दर-ब-दर..... बदस्तूर....

"विक्रम"

रविवार, अक्टूबर 08, 2017

अतीत

वक़्त के घोड़े पे सवार,
अतीत को पहलू में दबा , 
भागता रहा वो ताउम्र, 
मगर....
यादों के नुकीले तीर,
भेदते रहे,उसके
जिस्म-ओ-जान को,
और नोचते रहे ,
ज़हन से चिपके
अतीत के उस
हर एक लम्हे को….
-ak
 
 
 
 

शनिवार, अक्टूबर 07, 2017

यादों की जुंबिश

 

सुषुप्त शरीर में,
सिहरन-सी 
भर देती हैं 
यादों की एक 
हल्की-सी जुंबिश,
मगर....
बाद इसके, 
अंदर से कुछ 
यूँ टुकड़ों में 
बिखर जाता है,
बाद तूफान के
बिखरता है कोई 
आशियाना जैसे.....

 
"विक्रम"


बुधवार, जून 21, 2017

तक़सीम


वो बेनाम से रिश्तों के धागे
पूरी तरह से टूटे नहीं है,
अभी भी उलझे हैं 
मुझ में उनके कुछ तार,
मगर....,
वक़्त के पहिये
मे फँसकर,
अनवरत टूटते बंधनों को
सहेजने मे ,
मैं खुद टूट चुका हूँ ।
अपेक्षित है संचयन
उन धागों का तुमसे भी ,
तकसीम में ,
जिनके कुछ सिरे,
थे तुमसे भी लिपटे हुये ....

"विक्रम"

रविवार, जून 18, 2017

घर

भागते-दौड़ते....
अल सुबह भोर में ही,
लोगों के झुंड के झुंड ,
निकल पड़ते हैं सड़कों पे ,
और शाम के धुंधलके
से लेकर, देर रात तक,
लौटते रहते हैं उन घरों में,
जिनको,
बनाना तो आसान था
मगर ,

चलाना दुष्कर है.....

"विक्रम"

बुधवार, मई 31, 2017

ड्राई-क्लीन

गाँव के स्कूल मे जब जनवरी-फरवरी के महीनों मे सर्दी अपने पूरे शबाब पर होती थी तब हम हफ्ते में 3,4 बार बिना नहाये ही स्कूल चले जाते थे। लेकिन बावजूद इसके नहाये हुये से लगें, इसके लिए ड्राई-क्लीन जरूर करते थे । ड्राई-क्लीन के लिए एक लोटा हल्का गर्म पानी पर्याप्त होता था । उस लोटे से दोनों हाथ भिगोकर हाथ-पैरों पर तेल की भांति पानी से मालिश कर लेते थे , साथ ही साथ मुंह,गर्दन और बालों को चुपड़ना भी नहीं भूलते थे । उसके बाद “कच्ची घानी” वाला सरसों का तेल हथेली में गड्ढा बनाकर उसमे भरते और फिर दोनों हथेलियां चुपड़कर बालों में रमा लेते। हथेलियों मे बाकी बचे तेल को मुंह और हाथ पैर के उघड़े हिस्सों पर फेर लेते जिससे सर्दी से सुखी चमड़ी मे चमक आ जाती थी।

प्रार्थना होने के बाद मास्टर साहब एक एक छात्र की बाजू उठाकर उसकी कलाइयाँ, पायजामा उठाकर उसकी टांगे , गर्दन के आगे पीछे ऐसे देखते थे जैसे कसाई हलाल करने से पहले बकरे को देखता हैं । ड्राई-क्लीन मे अपारंगत छात्र इस जांच मे फेल हो जाते थे जिन्हे असेंबली के सामने खड़ा करके “धोया” जाता था। जो छात्र जांच मे पास हो जाते वो अपने ड्राई-क्लीनींग के हुनर पर खड़े खड़े मंद-मंद मुस्करा रहे होते। कुछ सालों ये सिलसिला बड़े आराम से चलता रहा मगर फिर नए हैड-मास्टर साहब का हमारे स्कूल मे पदार्पण हुआ।

उन्होने असेंबली मे कुछ नियमों मे फेरबदल किया जो उन्हे पसंद नहीं थे। अब वो हाथ-पैरों और गर्दन के साथ साथ पेट से शर्ट उठाकर भी देखने लगे, जिसे ड्राई-क्लीनिंग में सिद्दहस्त छात्र भी इस जांच से बच ना सके। उसके बाद हाथ-पैरों के साथ साथ पेट पर भी गीला हाथ फिराकर स्कूल जाना शुरू किया और नए हैड-मास्टर साहब की जांच मे पास होकर मास्टर साहब की बुद्धि पर तरस खाते हुये अकड़ के साथ असेंबली मे सिर ऊंचा करके खड़े रहते । मगर हम लोगों की ये चाल भी ज्यादा दिन तक नहीं चल पाई , क्योंकि अब पेट के साथ साथ पीठ भी जांच के दायरे मे आ गई थी। जिस पर खुजली करने से बनी लाइनों का पूरा जाल मिलता था । हैड-मास्टर साहब अपनी इस जीत पर फुले नहीं समा रहे थे । अब असेंबली के सामने वो चंद लड़के ही खड़े होते थे जो सम्पूर्ण-रूप से नहा कर आए हुये होते थे , बाकी पूरी असेंबली की कपड़े उतारने जैसी बे-इज्जती की जाती थी ।

और फिर असेंबली के सामने घूम-घूमकर हैड-मास्टर साहब बड़े फख्र से हमें कह रहे होते की, “ये ड्राई-क्लीन उन्होने भी अपने स्कूल के दिनों मे बहुत की है ।“

"विक्रम"

रविवार, अप्रैल 30, 2017

खयालात

बस स्टैंड वहाँ से करीब 2 किलोमीटर था। आसपास किसी पेड़ तक की छाया नहीं थी । जून की दोपहरी में ,मैं वहीं धूप मे खड़े होकर किसी साधन का इंतज़ार करने लगा । मुस्लिम बहूल होने के कारण अधिकतर लोग वही नज़र आ रहे थे । मुझे जालीदार टोपी ,अरबी लिबास और बकरे जैसी दाढ़ी वालों से हमेशा नफरत रही है । इसके पीछे का कारण मुझे भी नहीं पता, मगर ना जाने क्यों ऐसी शक्लों से चिढ़ सी होने लगती है । देहात का इलाका होने के कारण इक्का दुक्का दुपहिया वाहन ही आ रहे थे, जिनमे अधिकतर पर 2 या 3 सवारी पहले से ही बैठी होती थी जिन्हे रुकने के लिए कह भी नहीं सकता था। यदा कदा मुझे कोई इकलौता गैर मुस्लिम नज़र आता तो मैं हाथ देकर लिफ्ट के लिए इशारा करता मगर मुझे अनदेखा करके आगे निकल जाते।

जो शक्ल और पहनावे से मुझे अपने मजहब के नज़र नहीं आते थे उनको मैंने रुकने का इशारा भी नहीं किया। करीब आधा घंटा धूप मे खड़े खड़े मे काफी परेशान हो चुका था , सो हारकर मैंने पैदल ही चलकर बस स्टेंड तक पहुँचने का निर्णय किया। साथ साथ मैं पीछे मुड़कर देखे जा रहा था की शायद कोई लिफ्ट मिल जाए।

तभी एक जालीदार टोपी पहने शख्स ने मेरे पास से गुजरते हुये मुझे देखकर अपनी स्कूटी को ब्रेक लगाया और थोड़ा आगे जाकर रुक गया । उसके पीछे उसका 6,7 साल का बच्चा बैठा था जिसे उसने अपने आगे खड़ा कर लिया। मैं तब तक पास मे आ चुका था और बिना ध्यान दिये पास से गुजरने लगा।
“आइये, मैं छोड़ देता हूँ , बहुत धूप है.... कहाँ जाना है ?”, उसने कहा।
“बस स्टैंड”, कहकर मैं चुपचाप पीछे बैठ गया।
“बहुत धूप है , ऐसी धूप मैं पैदल चले तो तबीयत खराब हो जाता”, उसने कहा।
“जी...जी हाँ, आज बहुत धूप है।“
उसने बस स्टैंड के गेट के पास अपनी स्कूटी को रोककर मुझे पूछा , “कहाँ की बस पकडनी है ?”
“कानपुर”, मैंने उतरते हुये कहा।
“सात नंबर से जाएगी , अभी 15 मिनिट बाद ही है एक बस“, उसने घड़ी देखते हुये कहा।
“जी… शुक्रिया”, मैंने कहा ।

औए वो शख्स मुस्करा कर आगे चला गया ।

-"विक्रम"

शनिवार, मार्च 18, 2017

महंत योगी आदित्यनाथ

योगी आदित्यनाथ (अजय सिंह )  का जन्म  5 जून 1972 को हुआ था। 18 मार्च  2017 को इन्हे उत्तर प्रदेश का  मुख्यमन्त्री चुना गया है। ये गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर के महन्त भी हैं। वे 2014 लोक सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर से लोक सभा सांसद चुने गए। वे 1998 से लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। आदित्यनाथ गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महन्त अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं। वह हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं, जो कि हिन्दू युवाओं का सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह है।

आदित्यनाथ बारहवीं लोक सभा (1998-99) के सबसे युवा सांसद थे। उस समय उनकी उम्र महज 26वर्ष थी। उन्होंने गढ़वाल विश्विद्यालय से गणित से बी.एस.सी किया है। उन्होंने धर्मांतरण (जैसे निम्न वर्ग हिंदुओं को ईसाई बनाना) गौ वध रोकने की दिशा में सार्थक कार्य किये हैं। वे 2017 तक गोरखपुर से लगातार 5बार से सांसद हैं।

योगी आदित्यनाथ सबसे पहले 1998 में गोरखपुर से चुनाव भाजपा प्रत्याशी के तौर पर लड़े और तब उन्होंने बहुत ही कम अंतर से जीत दर्ज की। लेकिन उसके बाद हर चुनाव में उनका जीत का अंतर बढ़ता गया और वे 1999, 2004, 2009 व 2014में सांसद चुने गए।[4] योगी जी ने अप्रैल २००२ मे हिन्दु युवा वाहिनी बनायी जिसके कार्यकर्ता पूरे देश मे हिन्दु धर्म विरोधी कार्यो को रोकने का काम कर रहे है।

7 सितम्बर 2008 को सांसद योगी आदित्यनाथ आजमगढ़ में जानलेवा हिंसक हमला हुआ था। इस हमले में वे बाल-बाल बच गये। यह हमला इतना बड़ा था की सौ से अधिक वाहनों को हमलावरों ने घेर लिया और लोगों को लहुलुहान कर दिया।उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्य‍नाथ एक बार लोकसभा में यूपी पुलिस की बर्बरता का वर्णन करते हुए रो पड़े थे. प्रखर एवं उग्र हिंदुत्व के पोषक माने जाने वाले आक्रामक बीजेपी नेताओं में गिने जाने वाले योगी आदित्यनाथ लोकसभा में जोर-जोर से रोने लगे थे. वर्ष 2006 में लोकसभा में पुलिस‍ की प्रताड़ना का जिक्र करते हुए योगी रोने लगे थे, तब मुलायम सिंह यादव यूपी के सीएम थे.

वर्ष 2006 में गोरखपुर से बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ ने अपनी बात रखने के लिए लोकसभा अध्यक्ष से विशेष अनुमति ली थी. तब पूर्वांचल के कई कस्बों में सांप्रदायिक हिंसा फैली थी. जब आदित्यनाथ अपनी बात रखने के लिए खड़े हुए तो फूट-फूट कर रोने लगे. कुछ देर तक वे कुछ बोल ही नहीं पाए और जब बोले तो कहा कि उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रही है और उन्हें जान का खतरा है।

2014 लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर योगी आदित्यनाथ ने 'लव जिहाद' को बड़ा मुद्दा बनाया था. इस दौरान योगी का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वो अपने समर्थकों से कहते सुनाई दे रहे थे कि हमने फैसला किया है कि अगर वे एक हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन करवाते हैं तो हम 100 मुस्लिम लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाएंगे.फरवरी 2015में विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में योगी ने कहा कि अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश के सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. उन्होंने कहा कि काशी की मस्जिद में शिव और पार्वती विराजमान हैं. मक्का में गैर मुस्लिम नहीं जा सकता है. वेटिकन सिटी में गैर ईसाई नहीं जा सकता है. हमारे यहां हर कोई आ सकता है. वेटिकन सिटी मदर टेरेसा को संत घोषित करता है, लेकिन विदेशी भारतीय संतों को हेय दृष्टिकोण से देखते हैं.

योग के ऊपर भी विवादित बयान देते हुए योगी आदित्‍यनाथ ने कहा था कि जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए. उन्होंने ने यहां तक कहा कि लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए.  योगी आदित्यनाथ अप्रैल 2105में कहा था कि हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गैर हिन्दुओं को नहीं जाना चाहिए. उन्होंने कहा ये नियम पहले से ही हैं जिसे वो बस दोहरा रहे हैं.

योग के ऊपर भी विवादित बयान देते हुए योगी आदित्‍यनाथ ने कहा था कि जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए. उन्होंने ने यहां तक कहा कि लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए. योगी आदित्यनाथ अप्रैल 2105 में कहा था कि हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गैर हिन्दुओं को नहीं जाना चाहिए. उन्होंने कहा ये नियम पहले से ही हैं जिसे वो बस दोहरा रहे हैं.

आइए आपको बताते हैं क्या है योगी आदित्यनाथ की रूटीन
योगी आदित्यनाथ रोज सूरज उगने से पहले यानि सुबह तीन बजे जग जाते हैं. इसके बाद नहा-धोकर वे पूजा करते हैं. गोरखनाथ मंदिर के महंत योगी आदित्यनाथ मंदिर के ठीक बगल वाली बिल्डिंग में ऊपर रहते हैं.

सुबह चार बजे योग करने के बाद योगी नीचे आते हैं और मुख्य मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा के दौरान वे सबसे अंत में महंत अवैद्धनाथ के मंदिर में पूजा करते हैं. पूजा अर्चना के बाद योगी आदित्यानाथ गौशाला जाते हैं.गौशाला में करीब 150से 200 गायें हैं. गौशाला की सारी गायों को योगी अपने हाथों से चारा खिलाते हैं. गौशाला से सात बजे निकलने के बाद महंत योगी आदित्यनाथ नाश्ता करते हैं. अपने खाने में वे हल्का शाकाहारी भोजन लेते हैं.आठ बजे के बाद योगी का जनता दरबार होता है. जिसमें गोरखपुर शहर के लोग आते हैं और अपनी समस्या लोग सुनाते हैं. योगी उनकी समस्याओं का निपटारा करते हैं. रात 10 से 11 बजे तक योगी सोने चले जाते हैं.

 

नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

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