रविवार, जून 30, 2013

- दीवारें –

गाँव से उस दिन काकी की मौत की खबर सुनकर बहुत अफसोस हुआ। मेरा उनसे माँ बेटे का सा रिश्ता बन गया था। बचपन मे में रोजाना काकी के घर उनके दोनों बड़े बेटों मोहन और सोहन के साथ खेला करता था। उनके दो और बेटे थे जो उस वक्त बहुत छोटे थे।

काकी मुझे भी अपने बच्चो की भांति प्यार करती थी और में काकी के निश्चल और ममता से सरोबर प्यार मे डूबकर घर जाना ही भूल जाता था। माँ मुझे अक्सर उनके घर से जबर्दस्ती खींच कर घर ले आती थी मगर में फिर से कोई बहाना बनाकर भाग आता था।

में रात मे अक्सर काकी के घर मे ही मोहन और सोहन के साथ सो जाता था। घर काफी बड़ा था लेकिन हम लोग गर्मियों मे घर के बाहर के खुले अहाते मे सोते थे। रातभर खुले आसमान के नीचे खुली हवा मे सोना किसी जन्नत से कम ना होता था। हम सुबहा देर तक सोये रहते। मोहन और सोहन अक्सर उठ जाते थे मगर में सोया रहता। फिर सुबह माँ आती और काकी से बोलती की तुम इसको क्यों उठती, तो काकी कहती सोने दो बच्चा है ,अपने आप उठ जाएगा अभी। लेकिन काकी के मना करने पर माँ मुझे उठाकर घर ले जाती।

वक़्त गुजरता रहा और वक़्त के साथ साथ हम लोग भी बड़े हो गए, मेरी सरकारी नौकरी लगने के बाद हम लोग गाँव से शहर मे ही आकर बस गए, और फिर धीरे धीरे  गाँव में आना जाना भी एक तरह से ख़तम हो गया।

लगभग आठ साल पहले मोहन और सोहन की शादी मे और उसके चार साल बाद बाद उनके दोनों छोटे भाइयों की शादी मे हम लोग गाँव गए थे। काफी सालों बाद काकी से मिला तो काकी देखते ही रो पड़ी और मुझे अपने पास बैठाकर माँ ,बाबूजी और बाकी सदस्यों का हाल पूछती रही और साथ ही मोहन और सोहन की बहूओं को आदेश पे आदेश दिये जा रही थी की लड़के के लिए दूध लेकर आओ, मिठाई लेकर आओ , और हाँ दूध मे मलाई जरुर डालके लाना इसको बहुत पसंद है, कहते हुये काकी हँसकर मेरे सिर पर अपने झुर्रीदार हाथ फिराती।

उसके बाद जब पिछले साल किसी काम से गाँव जाना हुआ तो काकी से मिलने की ललक को नहीं रोक पाया और काकी के घर की तरफ चल पड़ा। उस वक्त काकी से मिले लगभग चार साल हो गए थे। काकी का घर काफी बदला हुआ सा लगा। खुले अहाते के चारों तरफ ऊंची चारदीवारी बना दी गई दी। पहले जहां अहाते मे घुसने का एक ही रास्ता था अब वहाँ चारदीवारी मे अलग अलग चार दरवाजे नजर आ रहे थे। में सोच विचारकर एक दरवाजे मे घुस गया। वहाँ बचपन का दोस्त मोहन बैठा था, उस से मिलने के बाद मैंने पूछा, “काकी कहाँ है  ?” जवाब मे मोहन ने एक तरफ इशारा करके कहा की वहाँ अजय के घर मे हैं। मैं उसका जवाब सुनकर भौचक्का सा रह गया। मोहन से काफी बात करने के बाद पता चला की वो चारों भाई अलग अलग हो गए हैं और अब काकी छोटे बेटे अजय के साथ बगल वाले घर मे रहती है।

में बड़े दुखी मन से मोहन के घर से बाहर आया। मैंने अपने चारों तरफ नजर घुमाकर वो अहाता तलाशने की कोशिश की जहां हमारा बचपन गुजरा था। मगर अब वहाँ सिर्फ दीवारें ही दीवारें नज़र आ रही थी। बाहर आकर चारदीवारी से एक दूसरे घर मे घुसा जो मोहन के अनुसार अजय का था। घर मे घुसते ही  चूल्हे के सामने काकी को बैठा पाया। उनके पास जाकर उनके पैर छूए और पास मे ही जमीन पर बैठ गया। जाड़े का मौसम था सो चूल्हे के सामने बैठकर काकी से बात करके मैं फिर से बचपन में खो जाना चाहता था। मुझे पहचानकर काकी बहुत खुश हुई थी  इस बात का अंदाजा मुझे तब लगा जब चुपके से उन्होने आँचल से खुशी से छलक़ते आँसू पोंछ लिए थे। काकी काफी बूढ़ी लग रही थी। उनके चेहरे से थकान साफ झलक रही थी। वहीं बैठे बैठे काकी ने मेरे लिए चाय बनाई और चाय पीने के दौरान मुझसे परिवार के हालचाल लेती रही।

काकी के साथ काफी वक़्त बिताने के बाद मैंने उनसे विदा लेनी चाही और जवाब मे उन्होने सदा की भांति सिर पर हाथ फिराते हुये कहाँ था, “जब भी गाँव आओ मिलने जरूर आना बेटे, मेरा तो अब कोई भरोसा नहीं कब ऊपर से बुलावा आ जाए , ये कहकर वो हंस पड़ी थी।
 
 -विक्रम
 

बुधवार, जून 19, 2013

- तेरी यादें –

 

सांझ के ढलते ही
मुझे पाकर तन्हा ,
सताने बेपन्हा
यूं दबे पांव ,
तेरी यादों का चले आना
तुम्ही कहो ये कोई बात है ?
 
बैठकर पहलू मे, मेरे
कांधे से लिपटकर, 
रातभर सिसक कर ,
देती हैं मुझे उलाहने पे उलाहना
तुम्ही कहो ये कोई बात है ?
 
अरुणोदय आँखों में, कुछ
ख्वाबों को छोड़कर,  
कुहासे को ओढ़कर 
तेरी यादों का चुपके से चले जाना
तुम्ही कहो ये कोई बात है ?


 


-विक्रम   

 

बुधवार, जून 05, 2013

चेन्नई का सापड़

सन 2003 मे मैं कंपनी के काम से पहली बार दक्षिण भारत (मद्रास चैन्नई) आया था। उस दिन ट्रेन अपने निर्धारित समय से करीब 2 घंटे लेट  थी। रात के करीब 10 बजे थे तो मैंने सोचा पहले खाना खाया जाए फिर कोई होटल तलाशता हूँ स्टेशन से बाहर आकर  सामने ही कुछ दूरी पर एक  रेस्टोरेन्ट मे चला गया। अंदर ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी बस  दो चार लोग ही बैठे थे । मैंने एक खाली टेबल देखा और अपने समान को पास रखकर वेटर का ऑर्डर लेने के लिए इंतजार करने लगा। तभी एक लड़का आया उसने केले का बड़ा सा पत्ता सामने टेबल पर बिछा दिया और एक प्लास्टिक का छोटा सा पानी का गिलाश भी रख दिया। में कुछ  कह पाता तब तक एक और वेटर आया और उस पत्ते के ऊपर चारों चारों तरफ 4, 5 कोई सब्जी जैसी सामग्री प्रसाद स्वरूप जल्दी जल्दी रखी और जैसे आया था वैसे ही जल्दी से चला भी गया । मेरे संभलने से पहले  एक और वेटर आया और उसने एक बड़े से स्टील के प्याले को अपने हाथ मे पकड़ी चावल से भरी बाल्टी मे डाला और चावल से लबालब भरकर उसे केले के पत्ते के बीचों बीच पलट दिया।
मैं मुँह खोल पता उस से पहले एक और वेटर आया और उसने एक जग जैसा कोई बर्तन अपने हाथ मे पकड़ी बाल्टी मे डुबोया और उसमे से सब्जी का ढेर सारा रस्सा  (सांभर) चावलों पे पलट दिया जिस से पत्ते पर बाढ़ जैसे हालत पैदा हो गए।  मैं जैसे तैसे करके सांभर के बहाव को चावल का बांध बनाकर रोकने की कोशिश करने लगा  मैंने आस पास नजर घुमाकर देखा की कहीं कोई मुझे इस हालात से दो चार होते हुये देख तो नहीं रहा। पास मे बैठे दो चार लोग जो अपने रंग-रूप की वजह से पक्के मद्रासी लग रहे  थे वो  कलाई तक अपने हाथ को चावलों के ढेर मे घुसेड़ कर खाने का लुत्फ उठा रहे थे। मैंने बड़े दीन भाव से वेटर की तरफ देखा जो पहले से मेरी तरफ बड़े कौतूहल से देखे जा रहा था। मैंने मिन्नत सी करते हुये चम्मच मांगी तो उसने मुझे ऐसे घूरा जैसे मैंने उस से पैसे मांग लिए हों। वो इंकार मे गर्दन हिलाकर एक और को चला गया।
गाँव मे छोटे थे तब बड़े बूढ़े कहते थे की राजपूत लोग पत्ते (पत्तल) पे खाना नहीं खाते। लेकिन जहां बर्तन के नाम पे चम्मच तक नहीं हो वहाँ समझौता करने के सिवा कोई चारा नहीं रहता। मैंने कभी ऐसे चावल नहीं खाये थे। हमारे इधर (राजस्थान मे ) साल मे सायद 2 या 3 बार किसी त्यौहार पर ही चावल बनते हैं और वो भी घी और खांड (चीनी) के साथ खाये जाते हैं।
खैर हर तरफ से मायूस होकर मैंने सामने पड़े ढेर मे स्वाद तलाशना शुरू किया। चावल को सभी सब्जी जैसे दिखने वाले पदार्थों के साथ अलग अलग मिलाकर खाने में कुछ खाने जैसा टेस्ट  परखने की कोशिश की। मगर काफी जद्दोजहद के बाद कुछ समझ नहीं आया तो आस पास बैठे लोगों को देखने लगा जो बड़ी तल्लीनता से चावल के ढेर को समेट रहे थे। मैं उनके खाने के तरीके की ऐसे नकल करने लगा जैसे परीक्षा हाल मे परीक्षार्थी करता है। काफी माथापच्ची के बाद पेट मे कुछ उतारने मे कामयाब रहा। मगर तभी सोचने लगा की  इस पत्ता रूपी प्लेट को भी कहीं खाना तो नहीं है ?  मगर तभी सामने देखा एक महाशय अपना खाना खत्म कर चुके थे और उन्होने अपने पत्ते को एक तह मे मोड़ा और टेबल पर रखकर खड़ा हो गया। मैंने भी  तुरंत उसकी देखा देखी अपने पत्ते को फ़ोल्ड किया मगर तभी पास आकर एक  वेटर बोल पड़ा। सापड़ नल्ला एल्लुवा ?’( खाना अच्छा नहीं क्या ?)। मेरी समझ नहीं आया तो उसने टूटी फूटी हिन्दी मे दोहराया। मैंने कहाँ , “अच्छा था। फिर उसने कहा की अगर खाना अच्छा लगे तो पत्ते को अपनी तरफ फ़ोल्ड करते हैं और अच्छा ना लगे तो दूसरी तरफ फ़ोल्ड करते हैं।
इस से पहले की कुछ और गलती हो जाए मैंने जल्दी से काउंटर पर  पेमेंट पूछा था पता चला खाने का बिल था सिर्फ 12 रुपए। मैंने भुगतान किया और होटल तलाशने निकल पड़ा।       
 

रविवार, मई 26, 2013

स्मृतियां

मायूसियां ओढ़कर 
लेटी हैं,
उम्मीदों की राहें, ओर
विलुप्त होता वक़्त की 
गहराइयों में 
तेरा अहसास 



दीर्घकालीन अंतराल  के
बोझ से चरमराकर 
बिखरने लगा है तिलस्म, 
तेरे तसव्वुर  का । 

वक़्त के हाथों खंडित   
होने लगे है, 
तेरी स्मृतियों के स्तम्भ,
बावजूद  मेरी तिश्नगी 
आज भी अक्षुण्ण है। 

बतौर अमानत ,
मेरे हिस्से में दर्ज़ हैं
धुंधले आलिंगन, 
अधूरी मुस्कराहटें और 
अल्प अधूरी-सी मुलाकातें .........  


“विक्रम”

शनिवार, मई 18, 2013

माँ

हैलो माँ ... में रवि बोल रहा हूँ.... , कैसी हो माँ.... ?
 
मैं.... मैं ठीक हूँ बेटे..... , ये बताओ तुम और बहू दोनों कैसे हो ?
 
हम दोनों ठीक है माँ...आपकी बहुत याद आती है, ...अच्छा सुनो माँ , में अगले महीने इंडिया आ रहा हूँ..... तुम्हें लेने।
 
क्या... ?
 
हाँ माँ.... , अब हम सब साथ ही रहेंगे...., नीतू कह रही थी माज़ी को अमेरिका ले आओ वहाँ अकेली बहुत परेशान हो रही होंगी। हैलो ....सुन रही हो माँ...?
“हाँ...हाँ बेटे...“, बूढ़ी आंखो से खुशी की अश्रुधारा बह निकली, बेटे और बहू का प्यार नस नस में दौड़ने लगा। जीवन के सत्तर साल गुजार चुकी  सावित्री ने जल्दी से अपने पल्लू से आँसू पोंछे और बेटे से बात करने लगी।
पूरे दो साल बाद बेटा घर आ रहा था। बूढ़ी सावित्री ने मोहल्ले भर मे दौड़ दौड़ कर ये खबर सबको सुना दी। सभी खुश थे की चलो बुढ़ापा चैन से बेटे और बहू के साथ गुजर जाएगा।
रवि अकेला आया था , उसने कहा की माँ हमे जल्दी ही वापिस जाना है इसलिए जो भी रुपया पैसा किसी से लेना है वो लेकर रखलों और तब तक मे किसी प्रोपेर्टी डीलर से मकान की बात करता हूँ।
“मकान...?”, माँ ने पूछा।
हाँ माँ, अब ये मकान बेचना पड़ेगा वरना कौन इसकी देखभाल करेगा। हम सब तो अब अमेरिका मे ही रहेंगे। बूढ़ी आंखो ने मकान के कोने कोने को ऐसे निहारा जैसे किसी अबोध बच्चे को सहला रही हो।
आनन फानन और औने-पौने दाम मे रवि ने मकान बेच दिया। सावित्री देवी ने वो जरूरी सामान समेटा जिस से उनको बहुत ज्यादा लगाव था। रवि टैक्सी मँगवा चुका था।
एयरपोर्ट पहुँचकर रवि ने कहा ,”माँ तुम यहाँ बैठो मे अंदर जाकर सामान की जांच और बोर्डिंग और विजा का काम निपटा लेता हूँ। “
“ठीक है बेटे। “, सावित्री देवी वही पास की बेंच पर बैठ गई।
काफी समय बीत चुका था। बाहर बैठी सावित्री देवी बार बार उस दरवाजे की तरफ देख रही थी जिसमे रवि गया था लेकिन अभी तक बाहर नहीं आया। शायद अंदर बहुत भीड़ होगी... , सोचकर बूढ़ी आंखे फिर से टकटकी लगाए देखने लगती।
अंधेरा हो चुका था। एयरपोर्ट के बाहर गहमागहमी कम हो चुकी थी।
“माजी..., किस से मिलना है ?”, एक कर्मचारी ने वृद्धा से पूछा ।
“मेरा बेटा अंदर गया था..... टिकिट लेने , वो मुझे अमेरिका लेकर जा रहा है ....”, सावित्री देबी ने घबराकर कहा।
“लेकिन अंदर तो कोई पैसेंजर नहीं है , अमेरिका जाने वाली फ्लाइट तो दोपहर मे ही चली गई। क्या नाम था आपके बेटे का ?”, कर्मचारी ने सवाल किया।
“र....रवि....”, सावित्री के चेहरे पे चिंता की लकीरें उभर आई। कर्मचारी अंदर गया और कुछ देर बाद बाहर आकर बोला, “माजी.... आपका बेटा रवि तो अमेरिका जाने वाली फ्लाइट से कब का जा चुका...।”
“क्या.....”, वृद्धा की आंखो से गरम आँसुओं का सैलाब फुट पड़ा। बूढ़ी माँ का रोम रोम कांप उठा।
किसी तरह वापिस घर पहुंची जो अब बिक चुका था।
रात में घर के बाहर चबूतरे पर ही सो गई।
सुबह हुई तो दयालु मकान मालिक ने एक कमरा रहने को दे दिया। पति की पेंशन से घर का किराया और खाने का काम चलने लगा। समय गुजरने लगा। एक दिन मकान मालिक ने वृद्धा से पूछा।
“माजी... क्यों नही आप अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ चली जाए, अब आपकी उम्र भी बहुत हो गई, अकेली कब तक रह पाएँगी।
“हाँ, चली तो जाऊँ, लेकिन कल को मेरा बेटा आया तो..?, यहाँ फिर कौन उसका ख्याल रखेगा?
 
“विक्रम”
 

रविवार, मई 12, 2013

गरीब की बेटी

बूढ़ा और अपाहिज हरीराम जवान होती बिटिया की शादी की चिंता मे खटिया पे करवटें बदल बदल कर अपनी नींदे न्योछावर करने के सिवा और कर भी क्या सकता था। घर के अंदर आँगन मे हरीराम की पत्नी ज्जों और उसकी सोलह वर्षीय एकलौती बेटी मुन्नी लेटी हुई थी। ज्जों घर के बाहर चबूतरे पर लेटे हरीराम की चिंता समझती थी।

सुबह पौ फटने से पहले रज्जो हरीराम को चाय देने बाहर आई । हरीराम खटिया पे पैर सिकोड़ कर हाथ का तकिया बना अब भी सोच मे खोया हुआ था। रज्जो के हाथ मे चाय का गिलाश देखकर बैठ गया,  गिलाश को हाथ में लिया  और पैर नीचे लटकाकर चाय पीने लगा। रज्जो वही पास में नीचे चबूतरे पर बैठ गई।

“आप एक बार प्रधान जी से बात करके देखिये ना” , कुछ देर की शांति के बाद रज्जो ने धीरे से कहा ।

 “सुना है प्रधान जी ने बिमला की बेटी की शादी मे उन लोगों की काफी मदद की थी”, रज्जो ने पति के चेहरे की तरफ देखते हुये कहा । हरीराम अब रज्जो की बातों को सुनने लगा था और किसी निष्कर्ष पे पहुँचने की कोशिश कर रहा था। उसकी नजरे अब भी शून्य मे कुछ हल खोज रही थी।
...“अरे ! सिर्फ 48 साल का ही तो है। आज कल तो इस उम्र मे ही शादी करते हैं लोग , अच्छा इधर आओ , मे तुम्हें ये देना तो भूल ही गया था”, कहकर प्रधान हरीराम को एक तरफ ले गया और तीस हजार के नोटों की तीन गड्डियाँ निकालकर उसके फट्टे से अंगोछे मे लपेटकर उसे थमा दी। नोटों की गड्डियाँ समेटे वो भारी कदमों से घर की तरफ चल पड़ा जहां उसकी मासूम बच्ची अपने से उम्र मे तीन गुणा बड़े प्रोढ़ के साथ माँ-बाप की लाचारी का सौदा कर रही थी।  

 “क्या है रे हरिया ! कैसे आना हुआ ?”,  थोड़ी देर बाद अंदर से एक रौबदार आवाज आई । अंदर आ जा, आवाज मे एक निर्देश था।

हरीराम हाथ जोड़ता हुआ अंदर आकर वही जमीन पर बैठ गया। सामने पलंग पर रोबीले चेहरे वाले प्रधान जी बैठे हुक्का गुड्गुड़ा रहा थे।

“हूँ ?” , गर्दन को प्रश्नवाचक मुद्रा मे हिलाकर फिर से प्रधान जी ने आने का कारण पूछा।

हरीराम ने जवाब मे हाथ जोड़ दिये और कुछ देर रुककर बोला ,”मालिक, बिटिया की शादी करनी थी। “

“हूँ”, प्रधान जी ने एक गहरा कश लिया और तकिये को गोद में रखकर सोचने लगे। हरीराम की नजरे बड़ी उम्मीद के साथ प्रधान जी के चेहरे पे टिक गई। कुछ देर की चुप्पी के बाद प्रधान जी ने कहा ,” कोई लड़का देखा है ?”

“....” हरीराम ने इंकार मे सिर हिलाया

“ठीक है ,मेरी नजर मे एक दो लड़का हैं”, प्रधान जी ने थोड़ी देर सोचकर कहा। “दहेज का भी झंझट नहीं। लड़का विधुर है लेकिन कोई बच्चे वच्चे नहीं है। बहुत पैसे वाले खानदान से ताल्लुक रखता है। शादी का पूरा खर्च वो ही उठाएगा तुम्हें चिंता की जरूरत नहीं।   

घर आकर हरीराम ने पत्नी से प्रधान जी से हुई बातें बताई। पति की बात सुनकर रज्जो कुछ देर खामोश हो गई और कुछ सोचने लगी। उधर हरीराम भी गहरी सोचों में डूब गया।

“बिमला ने भी तो अपनी बेटी विधुर से ही ब्याही है, लड़के की उम्र ही कितनी है..... सिर्फ 35 साल , आज उसकी बेटी राज करती है। “, रज्जो ने मन ही मन सोचा।

कुछ दिनो बाद लड़के की माँ, बहन और अन्य सदस्य मुन्नी को देखने और आए, उन्हे मुन्नी बहुत पसंद आई और जाते वक्त पीछे मुन्नी के लिए गहनों और कपड़ों का ढेर छोड़ गए। हरीराम और रज्जो बहुत खुश थे। मासूम मुन्नी भी गहनों और कपड़ों के देख उछलने लगी थी। वो अपनी सहेलियों को ससुराल पक्ष की तरफ से मिली चीजों के बारे मे बताते बताते नहीं थकती। आज इस गरीब परिवार मे खुशी ने अपना दामन फैला दिया था। लेकिन खुशी को गरीब का घर ज्यादा देर रास नहीं आता।

शादी के मंडप पे पचास साल के दूल्हे को देख रज्जो ने हरीराम को को एक तरफ लेजाकर कुछ कहा। हरीराम मंडप से बाहर आया और दूल्हे के परिवार वालों के साथ खड़े प्रधान जी की तरफ हाथ जोड़कर कुछ कहना चाहा। हरीराम का आशय समझ प्रधान जी खुद उसके पास आए और उसे एक तरफ लेजाकर पूछने लगे।

 सरकार ..... वो ... दूल्हे की उम्र.....”, कहकर हरीराम रुआंसा होकर प्रधान के चेहरे को देखने लगा।

“अरे ! सिर्फ 48 साल का ही तो है। आज कल तो इस उम्र मे ही शादी करते हैं लोग , अच्छा इधर आओ , मे तुम्हें ये देना तो भूल ही गया था”, कहकर प्रधान हरीराम को एक तरफ ले गया और तीस हजार के नोटों की तीन गड्डियाँ निकालकर उसके फट्टे से अंगोछे मे लपेटकर उसे थमा दी। नोटों की गड्डियाँ समेटे वो भारी कदमों से घर की तरफ चल पड़ा जहां उसकी मासूम बच्ची अपने से उम्र मे तीन गुणा बड़े प्रोढ़ के साथ माँ-बाप की लाचारी का सौदा कर रही थी।

हरीराम को आता देख पत्नी उसके पास आई , हरीराम ने नोटो की गड्डियाँ उसको थमा दी और खुद बाहर चला गया। रज्जो कुछ देर उस भार को उठाए खड़ी रही जिसके नीचे बेटी की खुशियाँ दबा दी गई थी ।

बूढ़े माँ बाप को गुजर बसर के लिए काफी पैसे देकर मुन्नी विदा हो गई। साल दर साल गुजरते गए। मुन्नी अक्सर माँ बाप से मिलने आती। रज्जो बेटी से उसके हाल चाल पूछती और बेटी माँ को अपनी नर्क बन चुकी ज़िंदगी का हाल सुना देती। माँ बेटी कुछ देर आंसू बहा मन हल्का कर लेती। रज्जो फिर पति के सामने बेटी के दुखों का रोना रोती और फिर बूढ़े माँ बाप मिलकर बेटी के दुख में शामिल हो आंसू बहाने लगते।    

मुन्नी का पति पैसेवाला मगर शराबी था अक्सर मुन्नी को पीटता रहता था। गुस्से मे वो मासूम मुन्नी को अपने नीचे दबाकर उसपर पालथी मारकर बैठ जाता और शराब पीता रहता। मुन्नी दर्द से कराहती रहती , आखिरकार वो नशे मे धुत हो  एक तरफ लुढ़क जाता और तब तक मुन्नी भी बेहोश हो चुकी होती।

एक दिन ऐसी ही तकलीफ़ों से हारकर मुन्नी दुनिया से चल बसी। हरीराम और रज्जो को खबर मिली तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। पड़ौस के लोगों ने लड़के वालों पे दहेज-हत्या का केस करने की सलाह दी। हरीराम प्रधान के पास गया और अपना दुखड़ा सुनाया। प्रधान उसको लेकर लड़के वालों के घर गया। हरीराम आँगन मे पड़े मुन्नी के शव के पास बैठकर रोने लगा। प्रधान जी अंदर जाकर परिवार के लोगों से मिले और बताया की हरीराम दहेज-हत्या का केस करने को कहता है।

सुनकर परिवार के लोग डर गए।

“प्रधान जी आप ही कुछ कीजिये, ऐसे तो बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा, आप तो जानते हैं हमने दहेज नहीं लिया बल्कि हमने तो आपके ही हाथों से शादी के वक़्त उसको दो लाख रुपए भिजवाए थे।“

“हाँ, वो तो मेने उसको शादी के वक़्त ही दे दिये थे, अब ऐसा करो चार पाँच लाख देकर मामला रफा दफा करवा दो। मे हरीराम को वो पैसे देकर चुप करवा दूंगा”, प्रधान जी ने फुसफुसाकर परिवार वालों को कहा।  

कुछ देर बाद प्रधान जी बेटी से लिपटकर रोते हुये हरीराम के पास आए, उसे उठाया और बाहर अपनी जीप मे बैठाकर वापिस गाँव ले गए। अपने घर के बाहर जीप को रोका और हरीराम के फट्टे अंगोछे मे फिर से तीस हजार की तीन गड्डियाँ डालकर कहा, “हरिया वो लोग बहुत पैसे वाले हैं, पुलिस केस मे उनसे लड़ना तुम्हारे बस की बात नहीं। फिलहाल तुम ये पैसे रखो में आगे उन लोगों से बात करूंगा। अब तुम घर जाओ।”

हरीराम भारी कदमों से अपनी इकलौती बैसाखी को बगल मे दबाये अपनी इकलौती बेटी की याद मे फफककर घर की तरफ चल पड़ा।


विक्रम”








  

 

रविवार, अप्रैल 28, 2013

अंधेरा

बैठकर कुछ पल
इंतजार के सूने पहलू मेँ,
सिसकती शाम गुजर गई  
छोड़कर  तन्हा सुसप्त
तन्हाईयां 


शैशव अधेरा घुटनों के बल ,
रेंगता हुआ ताकता है डर से
बादलों से झाँकते चाँद को,
चंचल चाँदनी रातभर, खेलती हैं
अंधेरे के खंडित अस्तित्व से ।
 
नवयौवना सी अल्हड़ चाँदनी
डालकर गलबहियाँ, चाँद को
मुस्कराती है मंद मंद और,
चिढ़ाती है अपाहिज अंधेरे को ।

तरुण ज्योत्स्ना के मोहपाश मेँ
आलिंगनबद्ध चाँद, सो गया  
पलभर को खोकर होशोहवास  ,
हो गया हरण, बेसुध चाँदनी का ,
ले उड़ा उसे अंधेरा
दूर .....बहुत दूर....

 
विक्रम”

 

नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

Details