रविवार, मार्च 31, 2013

डॉ. बकरा



आजकल अख़बार, टीवी और दीवारों पे विज्ञापनों के जरिये रोज रोज छाए रहने वाले डॉ. बकरा का नाम सुनकर मेरे एक दोस्त का दिल उनपे आ गया। दोस्त को कुछ दिनो से सोरियासिस (चर्म रोग) था। उसने डॉ.बकरा के बारे मे कहीं पढ़ा जो कुछ ही दिनो मे गंजे लोगों के सिर पर बालों की फ़सल लहलहाने के दावे करता था और  सोरियासिस का इलाज होम्योपैथिक के जरिये करने का दंभ भर रहा था। एक रोज सुबह सुबह अख़बार लेकर मेरे घर आ धमका और बड़े गर्व से बोला, यार आज मेरा डॉ.बकरा से अपॉइन्ट्मन्ट है इसलिए तुम भी मेरे साथ चलो ताकि तुम्हें भी थोड़ा अनुभव हो की वर्ल्ड क्लास डॉ. कैसे होते हैं।

मैंने उसके हाथ का अख़बार लिया और पढ़ा , मै बोला ,”यार इन इश्तहारों पे मत जाओ , इनका कोई भरोसा नहीं। दोस्त ने मुह बिचकाया और बोला ,”यार तुम रहोगे वही देहाती के देहाती, डॉ.बकरा सिर्फ 250 रुपए लेते हैं, और वो भी परामर्श के तौर पर , ना तुम्हारे इन नुक्कड़ वाले एमबीबीएस की तरह लूटते नहीं
काफी जद्दोजहद के बाद मैं उसके साथ चलने को तैयार हो गया। डॉ. बकरा का क्लीनिक किसी पाँच सितारा होटल के रिसेप्शन सा था। लाल और नीले रंगों का समावेश हर जगह नज़र आ रहा था। 

रिसेप्शनिस्ट के पीछे की दीवार पे अनेकों डाक्टरों के नाम उनकी डिग्री के साथ लिखे हुये थे, वो शायद वहाँ आते होंगे। इंतजार मे बैठे लोगों के सामने की दीवार पर डॉ॰ बकरा की अनेकों तस्वीरें लगी थी जिसमे डॉ. बकरा अनेकों फिल्मी हीरो और हीरोइनों के साथ खड़ा मुस्करा रहा था। कुछ बड़े बड़े नेता लोग के साथ भी डॉ. बकरा अपना चोखटा लिए मुस्करा रहा था। बायीं तरफ की दीवार पे कुछ बड़ेमरीजों (लोगों) से लेकर अप्रीशीऐशन (Appreciation) पत्रों की फोटो कॉपी चिपकाई हुई थी जो मरीजों मे विश्वास पैदा करने का मार्केटिंग का नया तरीका था।  कई बेशकीमती सोफ़ों पे 3,4 लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे और समय बिताने के लिए कुछ अपने मोबाइल और कुछ अपने लैपटाप पे लगे हुये थे। पहली बार किसी डॉ. के क्लीनिक मे लैपटाप पे काम करते हुये मरीज को देखकर आश्चर्य हुआ। ये सब देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ और मुझे हैरानी में देखकर मेरा दोस्त ऐसे मुस्करा रहा था जैसे बच्चे को चिड़ियाघर देखकर खुश होने पर उसके पापा मुस्कराते हैं। कुछ देर पश्चात नीले रंग के कपड़े पहने हुये एक कम्पाउडर नीले रंग के छोटे से सुंदर से बैग मे दवा भरके एक मरीज को देने आया। मरीज ने अपना लैपटाप बंद किया और दवाओं का बैग लेकर बड़े गर्व से बाहर चला गया।  
मेरे दोस्त ने रिस्पेशन पर बैठे एक साहब से कहा की मुझे ये SMS मिला है और डॉ. साहब से मेरा अपोइनमेंट है
आप फ़र्स्ट टाइम आए है सर ?”, रिस्पेशन  पर बैठे व्यक्ति ने विनम्र लहजे में पूछा
हाँ”, दोस्त ने कहा ।
आप ये फॉर्म भर दीजिये”, उसने एक फॉर्म दोस्त की तरफ बढ़ा दिया। दोस्त ने फॉर्म लिया और मेरे पास आकर भरने लगा। भरने के बाद फॉर्म रिसेप्शन पर दे दिया।
कुछ देर के इंतजार के बाद दोस्त का नाम पुकारा गया, मै भी दोस्त के साथ जाने लगा तो रिस्पेसन पर बैठे व्यक्ति ने सिर्फ मरीज को जाने को कहा। में वापिस आकर क्लीनिक का वैभव देखने लगा। पास ही रखे फिल्टर से मैंने ठंडा पानी पिया और दीवार पे लगे टीवी को देखने लगा।
करीब आधे घंटे के बाद दोस्त बाहर आया , उसके चेहरे से लग रहा था की डॉ. ने उसे कोई बड़ी बीमारी बताई थी। रिस्पेशन पर आकार उसने क्रेडिट कार्ड से करीब आठ हज़ार रुपए का पेमेंट किया और बुझे मन से मेरे पास आकार बैठ गया। मैंने पूछा ,”क्या कहा डॉ.बकरा ने
अंदर डॉ. बकरा नहीं कोई लेडी डॉक्टर है , उसने कहा की इलाज लंबा चलेगा
कितना लंबा”, मैंने उसके और करीब होते हुये पूछा ।
कई पैकेज बताए हैं जिनकी अलग अलह कीमत है ,दोस्त ने कहा ।
पैकेज ?” , मैंने आश्चर्य से पूछा।
हाँ , छ: महीने से लेकर पाँच साल तक का”, दोस्त ने उदास होते हुये कहा।
लेकिन उस विज्ञापन मे तो छपा था सिर्फ 250 रुपए लेते हैं फिर ये तुमने आठ हज़ार क्यों दिये ?
मैंने छ: महीने का प्लान लिया है”, दोस्त ने कहा ।
 
प्लान ? , अरे तुम सलाह के लिए आए थे या किसी ट्रैवल प्लान के लिए ?”, मैंने कहा ।
नहीं, वो उस आठ हज़ार रुपए मे छ: महीने का परामर्श , चैकउप ,दवाइयाँ सब देंगे”, दोस्त ने कहा।
चलो फिर ठीक है अगर बीमारी ही ऐसी है जिसको ठीक होने मे ज्यादा समय लगेगा तो छ: महीने दवा दारू का खर्चा तो इतना हो ही जाता ,दोस्त भी मेरे जवाब से कुछ संतुष्ट हुआ और दवाइयाँ मिलने का इंतजार करने लगा।
कुछ देर बाद वही  कम्पाउडर वैसा ही दवाओं का थैला लेकर दोस्त के पास आया और वो छोटा सा बैग उसे देते हुये बोला।
सर , ये तीन दिन की दवा है सुबह शाम लेनी है। तीन दिन के बाद आपको फिर से परामर्श के लिए आना है तब और दवाइयाँ दी जाएंगी।“, कहकर वो चला गया।
उसके जाने के बाद दोस्त ने सोफ़े पर संभलकर बैठते हुये बैग को खोला , मैं भी उत्सुकतावश उस बैग को देखने लगा। उसके अंदर एन छोटा सा नीले रंग का लिफाफा था। लिफाफे को दबाने से लग रहा था उसमे कुछ है। दोस्त ने लिफाफा खोला तो उसमे होम्योपैथिककी चूसने वाली सफ़ेद रंग छोटी छोटी छ: गोलियां थी। दोस्त ने गोलियां उलट-पलट कर देखी। मैं उन आठ हज़ार की छ: गोलियों को देखता रह गया। खैर मैं जैसे तैसे दोस्त को समझा बुझाकर घर ले आया और कहा की सायद तीन दिन बाद और दवाइयाँ देंगे।
 
अगले तीन दिन दोस्त उन गोलियों को चूसता रह, और फिर तीन दिन बाद, मुझे फिर से उसके साथ डॉ.बकरा के भव्य क्लीनिक के दर्शनार्थ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कड़ी धूप के बाद डॉ.बकरा के क्लीनिक के ए.सी की ठंठक से काफी सुकून मिला। ये बात अलग है की उस सुकून के लिए मेरे दोस्त ने आठ हज़ार रुपए दिये थे।
 
कुछ समय के आन्दालोक अनुभव के पश्चात दोस्त का नाम पुकारा गया। वो अंदर गया और उस दिन की तरह आधे घंटे बाद बाहर आया। मुझे मन से मेरे पास आकार बैठ गया। 
क्या कहा डॉ. ने”, मैंने पूछा ।

कहा है इंतजार कीजिये ,काउंटर से दवा मिलेंगी
हम इंतजार करने लगे। कुछ ही समय पश्चात काउंटर से दोस्त का नाम पुकारा गया तो मैं भी दोस्त के साथ बढ़ गया। फिर वही नीला बैग हमारी तरफ बढ़ाया गया, उसे खोला तो उसमे वैसा ही नीले रंग का लिफाफा और उसमे वही छ: नन्ही नन्ही गोलियां थी। दोस्त ने काउंटर के उस तरफ बैठे व्यक्ति से पूछा, डॉ. ने एक Ointment (मरहम) के लिया बोला था
हाँ”, ये लीजिये , इसके 270 रुपए आपको देने होंगे”, दवा देने वाले ने कहा ।
 
क्या !, लेकिन दवाओं के लिए मैंने आठ हज़ार पहले ही जमा करा दिये”, दोस्त ने आश्चर्य से कहा।
सर , वो सिर्फ गोलियों और परामर्श के दिये हैं”, दवा देने वाले ने विनम्र भाव से कहा।
लेकिन ये दवा भी सोरियासिस के लिए है”, दोस्त ने कहा।
जी हाँ, लेकिन ये क्रीम है इसलिए आपको इसके पैसे अलग से देने होंगे
काफी बहस के बाद मैं बकराबन चुके अपने लूटे पिटे दोस्त को घर ले आया। दूसरे दिन उसे एक प्राइवेट क्लीनिक मे दिखाया। डॉ. की फ़ीस और दवाओं के मिलाकर कुल 200 रुपए खर्च हुये। एक महीने के इलाज के बाद मात्र 500 से 600 रुपए खर्च करने के बाद दोस्त की बीमारी लगभग ठीक हो चुकी थी। अलमारी मे पड़ी डॉ. बकरा की दी हुई वो मीठी गोलीयां  आजकल उसके बच्चे चुराकर चूसते रहते हैं।



-“विक्रम”

    

मंगलवार, मार्च 26, 2013

मिट चुकी वो राहगुजर


धुंधला गए वो सभी निशां
मिट चुकी वो राहगुजर

बुढ़ा हो चला अब , वो 
किनारें का  पुराना मकान,
जो था कभी हमारी 
मुलाकातों का निगहबान ।

बिखर गए वो  दीवार-ओ-दर ... मिट चुकी वो राहगुजर...

उग आई उन राहों पे  
नीरस सी तनहाइयाँ
फैली हैं फिज़ाओं में
जुदाई की रुसवाईयां 

क्यों बिछड़ गए तुम हमसफर  ... मिट चुकी वो राहगुजर...

उग आए उस झील मे 
कुछ छोटे कुछ बड़े मकान ।
गोद मे ढलती थी जिसके   
अपनी सुबह अपनी शाम 

कहाँ गई वो सभी लहर  ... मिट चुकी वो राहगुजर...
 
बसी है बरसों बाद भी
तेरी महक फिज़ाओं मे

एक ख्याल गर्म सासों का
और कदम जाते हैं  बहक
 

फिर आता नहीं कुछ भी नज़र ... मिट चुकी वो राहगुजर...

 
- विक्रम


 
 
 
 
 
 

बुधवार, मार्च 13, 2013

फेसबूक से फ्रेंडशिप तक


अक्सर सुनने मे आता है  की फेसबूक या अन्य किसी सोशल साइट्स से कैसे अपराधों को अंजाम दिया जाता है । मगर इसके पीछे सोशल साइट्स का कसूर नहीं बल्कि ये इंसानी दिमाग का फितूर है जो किसी भी चीज को मध्यम बनाकर ऐसे अपराधो को जन्म देता है । में भी फेसबूक पिछले दो तीन साल से इस्तेमाल कर रहा हूँ। इन सालों में बहुत से दोस्त बनाए, कुछ हाय हैलो तक सीमित रहे , कुछ बरसों पुराने दोस्त अक्सर मिल गए , कुछ काफी क्लोज फ्रेंड्स भी बने जिनसे अक्सर बातें होती , फोन नंबर तक भी हमने शेयर किए।  

अभी इसी माह 03 मार्च’2013 को कुछ दोस्तों ने एक सामाजिक समारोह के दौरान मिलने का निश्चय किया। में पहले किसी से आपने सामने नहीं मिला था मगर हर एक की फेसबूक के मध्यम से एक छवि मेरे मानस पटल पर थी। अक्सर होने वाली बातों के दरम्यान उनके वक्तित्व का भी एक रेखाचित्र दिमाग में कहीं अंकित हो चुका था।  

03-मार्च-2013 को  जयपुर के राजपूत सभा भवन” मे  कुँवर आयुवान सिंह हुडील का  स्मृति समारोह मनाया जाना था। और इसी दिन अधिक से अधिक फेसबूक दोस्तों के इकट्ठे होने का प्रोग्राम था तो मेंने भी जाने का प्रोग्राम बनाया , मुझे बंगलोर से जयपुर के लिए निकलना था, सो नए दोस्तों से मिलने की उत्कंठा में सुबह 4 बजे उठकर जल्दी जल्दी से तैयार होकर एयरपोर्ट के लिए निकला। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार मे निर्धारित समय पर वहाँ पहुँच गया जहां करीब हजारों लोगों का मजमा लगा था। राजपूत समाज के अनेकों स्त्री पुरुष समाज के प्रतिष्ठित लोगों के प्रवचन सुन रहे थे।


अब मुद्दा ये उठा खड़ा हुआ की पहचाने कैसे ? मगर इसका हल भी हर एक के पास था और वो था सभी की फेसबूक प्रोफ़ाइल में असली फोटो का होना। मेरे समारोह मे शामिल होने से पहले ही गेट पर मुझे एक दोस्त (भँवर सिंह राठोड़) ने पहचान लिया। बहुत ही मिलनसार और मृदु स्वभाव के स्वामी। उनसे कुछ ही पलों के वार्तालाप से अपनापन का अहसास  होने लगता है। वो मुझे बाकी के दोस्तों से मिलने ले गए जो भीड़ मे यहाँ वहाँ बैठे हुये थे।
  

सामने ही कुछ कदम की दूरी पर महावीर सिंह राठोर बैठे हुये मिले जिन्हे मैंने दूर से ही पहचान लिया। एक युवा पुलिस ऑफिसर होते हुये भी सामाजिक कार्यक्रमों में अच्छा दखल रखते हैं। इनसे फेसबूक के शुरुवाती दिनों में कुछेक राजपूत सामाज की  बातों को लेकर  मेरी अच्छी ख़ासी बहस हुई थी, यहाँ तक की मैंने इन्हे ब्लॉक तक कर दिया था। मगर धीरे धीरे एक दूसरे को हमने समझने की कोशिश की तो वक़्त के साथ साथ हम बहुत अच्छे दोस्त साबित हुये जिसकी बदौलत मे आज हजारों किलोमीटर का सफर तय कर इनसे मिलने आ गया। बहुत ही सुलझे हूए व्यक्ति। इनसे मिलकर लगता नहीं की आप किसी पुलिस ऑफिसर से मिल रहे हैं। बहुत ही शांत और सौम्य स्वभाव के धनी। अपनी ईमानदारी के चलते नेता लोगों की आँख की किरकिरी बने महावीर सिंह जी अक्सर अखबारों मे जगह पाते रहते हैं। एक अच्छे लेखक और बहुत ही प्यारी से बेटी के पिता महावीर सिंह जी कुल मिलाकर एक शानदार इंसान हैं और मुझे फ़क्र है की ये मेरे फेसबूक फ्रेंड हैं।

 उम्मेद सिंह “करीरी” , एक होनहार और कर्मठ युवा हैं, जो समाज के नाम पर या दलगत राजनीति करने वालों को उनकी औकात याद दिलाते हैं। समाज के नाम पर बिजनेस करने वालों के घोर विरोधी रहे उम्मेद सिंह जी अक्सर अपने विरोध का बिगुल बजाते नजर आते हैं। समाज हित के लिए सदा सजग रहते हैं। जमीन से जुड़ा व्यक्तित्त्व हर किसी को इनका मुरीद बना सकता है। पिछले दिनो इन्होने एक बहुत ही गरीब परिवार जिसमे एक अपंग बेटा और उसकी माँ थे , उनकी फेसबूक के माध्यम से काफी आर्थिक सहायता की। अक्सर ऐसे ही सामाजिक कार्यक्रमों मे उलझे रहने से उम्मेद सिंह जी को  आत्म संतुष्टि मिलती है।




शिखा सिंह चौहान , एक हंसमुख और खुले विचारों की महिला। लड़की होना कभी उसके आड़े नहीं आया, परिवार से स्वतन्त्रता मिली तो अपनी राहें खुद तय की। एक सफल गृहणी और दो प्यारी सी बच्चियों की माँ होने की जिम्मेदारियों के साथ साथ सामाजिक कार्यक्रमों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करवाती हैं। शिखा भी उसी सुबह दिल्ली से फ्लाइट द्वारा जयपुर पहुंची थी। शिखा के सामने कोई भी अंजान ज्यादा देर तक अंजान बना नहीं रह सकता, वो बहुत जल्दी घुलमिल जाती है। जब बोलने लगती है तो बस शिखा ही बोलती है बाकी चुप ही हो जाते हैं।


 वीरेंद्र सिंह शेखावत, हरफनमौला,बिंदास जैसे शब्द सायद इन्ही के लिए बने थे। बहुत खुशमिजाज़ व्यक्तित्व। “टेंशन लेने का नहीं देने का” जैसे संवाद इनपे खूब जमते हैं। मदद के लिए हर वक्त तैयार रहने वाले वीरेंद्र सिंह जी दोस्तों मे अपना एक ख़ास मुकाम रखते हैं। हंसी-मज़ाक के साथ माहौल को अपने हक मे करने का हुनर इन्हे खूब आता है। ज़िंदगी का लुत्फ़ पूरे जोश से उठाते हैं, इसी वजह से मायूसीयां इनसे फ़ासला बनाकर ही रहती है।

 राजवीर चौहान, बहुत मिलनसार और सौम्य  स्वभाव के राजवीर जी को पहचान ने मे मुझे थोड़ी दिक्कत हुई क्योंकि इनकी पहले प्रोफ़ाइल मे लगी फोटो के क्लोजउप वाला फोटो नहीं था। लेकिन मैंने इनकी आवाज से इन्हे तुरंत पहचान लिया। मेरी और राजवीर जी की अक्सर फोन पे काफी बातें होती थी मगर हमे मिले थे पहली बार। खुले दिलोदिमाग वाला इनका व्यक्तित्व  हर किसी को आकर्षित करने वाला है। जमीन से जुड़े एक मिलनसार व्यक्ति हैं।



 बलबीर राठोर , राहुल सिंह शेखावत काफी युवा है। इस उम्र मे भी सामाजिक गतिविधियों मे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। अपने बड़ो का आदर करना इनके संस्कारों मे शुमार हैं , और वही असामाजिक हरकतों और तत्वों से निपटना बखूबी आता है। इनसे मिलकर काफी अच्छा लगा। ऐसे युवा ही भविष्य मे समाज को सदा शीर्ष रखेंगे।

   

बाकी के सदस्यों का परिचय अगले अंक मे ।

 शाम को सभी सदस्यों के लिए शानदार दावत का इंतजाम भी महावीर सिंह जी ने किया।














 


 







·         1. कुँवर आयुवान सिंह के बारें मे अधिक जानकारी के लिए श्री रतन  सिंह शेखावत के ब्लॉग (http://www.gyandarpan.com/2011/10/blog-post_16.html ) पर विजिट करें।

शनिवार, फ़रवरी 16, 2013

जज़्बात



बरसों बाद भी महफूज़ रखा है
तेरे  शहर ने बीते लमहात को  

उधर उस राहगुज़र
के दोनों किनारों पर
साथ-साथ चलते हुये
हम आज भी
अक्सर नजर आते हैं

एक दूसरे को अक्सर
कनखियों से देखना , फिर
नजरों का टकराना ....और  
मसलसल देखते जाना.....

बहानों की आड़ मे
मिलने के कवायत
और मिलने पर रोकती
समाज की रवायत

चलो फिर गुलजार करें
दिल के दरीचे को, जो
खिज़ा की आंधीयों से
जमींदोज़ हुये पड़े है

क्यों न हम फिर से   
जगाएँ उस अहसासात को
आज तुम कुछ हवा तो दो, 
मेरे जज्बाती खयालात को

 

/विक्रम/

 

बुधवार, जनवरी 23, 2013

योजना


प्राचीन समय मे एक राज्य हुआ करता था जिसके राजा का चुनाव वहाँ की जनता क्रमबद्ध तरीके से करती थी, यानी आज इस परिवार का सदस्य राजा बनेगा तो कल उसके पास वाले दूसरे परिवार का सदस्य। पाँच साल तक राजा बने व्यक्ति की खूब सेवा की जाती उसे हर सुख दिया जाता। महल के सभी दास दासियाँ उसके आगे पीछे घूमते रहते। महल की सभी रानियों पे उसका अधिकार होता था। राज्य की जनता उसे खूब सम्मान देती। राजा जो भी कहता उसकी आज्ञा का पालन किया जाता। मगर शर्त ये होती की पाँच साल के बाद उसे राज्य की सीमाओं के उस उस पार बहती नदी के दूसरी तरफ वाले जंगल मे छोड़ देते जहां या तो वो खुद भूख प्यास से मर जाता नहीं तो उसे कोई जंगली जानवर खा जाता।

...“अरे ! तूँ पागल हो गया है क्या ? अब तूँ हमारे जैसा साधारण इंसान है और आज का दिन सायद तुम्हारा आखिरी दिन है। हम तुम्हें नदी के उस पार के घने जंगल मे छोड़ देंगे जहां तुम्हें कोई जंगली जानवर खा जाएगा। “।  
जब भी पाँच साल पूरे होते यही प्रथा दोहराई जाती। जनता मे एक तरह का उत्सव मनाया जाता। बैंड बाजे और पूरी धूम धाम से राजा को विदा किया जाता। विदा होने वाला राजा मौत की सजा मिले कैदी सा आगे आगे चल पड़ता। और फिर उसी दिन कोई दूसरा साधारण आदमी राजा चुना जाता और उसे राजमहल पहुंचा दिया जाता। जब भी कोई व्यक्ति राजा चुना जाता वो बहुत उदास हो जाता,क्योंकि उसे पता होता था की अब उसकी ज़िंदगी सिर्फ पाँच साल और बची है।
 

ऐसे ही एक विदाई समारोह मे राजा को विदाई दी जा रही थी और राजा बहुत खुश नजर आ रहा था और हँसे जा रहा था। लोग सोचने लगे की आखिर राजा खुश क्यों है? कुछ ने कहा की मौत के डर से  राजा पागल हो गया है और तभी ऐसी हरकत कर रहा है। जब उसे राज्य की सीमा पर बहती नदी के उस पार के जंगलों मे छोड़ने के लिए नौका मे बैठाया गया तो वो और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा। नौका चला रहे मल्लाहो ने उसे डांटते हुये कहा की “अरे ! तूँ पागल हो गया है क्या ? अब तूँ हमारे जैसा साधारण इंसान है और आज का दिन सायद तुम्हारा आखिरी दिन है। हम तुम्हें नदी के उस पार के घने जंगल मे छोड़ देंगे जहां तुम्हें कोई जंगली जानवर खा जाएगा। “
 

राजा से आम इंसान बने व्यक्ति ने मुस्करा कर कहा , “अरे मूर्खो, में अब भी राजा हूँ, और अब अपने नए राज्य मे जा रहा हूँ। मैंने अपने पहले साल के कार्यकाल मे नदी के उस पार के जंगल के सभी हिसक जानवर मरवा दिये थे। कार्यकाल के दूसरे साल वहाँ के जंगल साफ करवा दिये तथा दूसरे साल वहाँ मकान बनवा दिये। तीसरे साल वहाँ सड़के और खेती के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कारवाई थी। चौथे और पांचवे साल वहाँ जंगली कबीले के लोगों को लाकर बसाया और उनके लिए हर सुख सुविधा मुहैया कारवाई। अब में वहाँ का राजा हूँ और वो सब मेरी प्रजा है जो मेरे आने का इंतजार कर रही है ।

- विक्रम

रविवार, जनवरी 13, 2013

मेहँदी के फुल



दूर दूर तक विस्तृत रेगिस्तान। सूना और शांत। कही कही पर छोटी छोटी बेर की झाडियाँ और खेजडे के वृक्ष। शेष रेत ही रेत। आग उगलती धुप और स्तब्ध पवन। ऐसी निस्तब्धता को भंग करती हुई एक बस कच्ची सड़क पर तेज रफ़्तार से जा रही थी। बस में पूरे यात्री थे। ड्राईवर के ठीक पास दो बूढ़े चौधरी बैठे थे जिनके चेहरे पर जीवन के संघर्ष की प्रतिरूप झुर्रियाँ झलक रही थी। पीछे कितने अपिरिचित, अनजान स्त्री पुरुष। पुरुष रंग बिरंगे साफे पहने हुए व् स्त्रियां ओढने ओढ़े हुई थी। सबसे पीछे की सीट पर एक राजपूत मुकलावा (गौना) करके आ रहा था। उसके चार सीट आगे एक सेठ अपनी नवविवाहित बेटी को लेकर अपने गाँव लौट रहा था।

वह लड़की अद्वीतीय सुंदरी थी। उसका केसर सा रंग केसरिया वस्त्रों में एकमेक हो रहा था और ओढनी पर सलमे सितारे जड़े हुए थे जो उसके सौंदर्य में चार चाँद लगा रहे थे। कच्ची सड़क होने की वजह से हिचकोले जरूरत से ज्यादा आ रहे थे पर ड्राईवर अत्यंत सजगता से स्टीयरिंग सम्हाले था। अप्रत्याशित,जिधर बस जा रही थी उसके पूर्व की ओर धुल के बादल उड़ते नज़र आये। सारे यात्री शंकित हो गए। एक चौधरी ने बीडी सुलगाते हुए कहा,“शायद ‘भटलोटिया’ (हवा और धुल का गुब्बार) उठा है।” दूसरा चौधरी जिसकी आवाज़ भारी थी,बोला “आंधी भी आ सकती है।इस मरुभूमि में बरखा कम आंधी ज्यादा आती है।” सेठ ने अपनी इन्द्रधनुषी पगड़ी को उतारकर अपने गंजे सर पर चमकती पसीने की बूंद को पोंछा।फिर अपनी लाडली नवविवाहित लड़की मन्नी से धीरे धीरे कहने लगा, “सुन री लाडली, आंधी आने वाली है, जरा सचेत रहना।”

नवविवाहिता मन्नी ने गले में सोने का तिमणिया और काठलिया पहन रखा था। सिर पर बड़ा बोर था। दोनों कानो में बालियाँ झलमला रही थी।नाक में काँटा था।पांवो में चांदी के भारी भारी बिछ्वे।बाप का संकेत पाकर मन्नी ने अपने ओढने से अपने शारीर को ढांक लिया। मुकलावा करके आने वाला राजपूत अपनी कमर में लटकती तलवार को यूँ ही देख रहा था। उसके समीप उसका मित्र अपने हाथ की कटार से खेल सा रहा था। धुल के बादल और गहरे हुए।वे बस के समीप आने लगे।यात्रियों की आँखे उस ओर जम गयी।ड्राईवर ने बस की रफ़्तार को और तेज कर दिया। तभी गोली की आवाज़ सुनाई पड़ी। गोली की आवाज़ के साथ यात्रियों ने देखा कि धुल के बादलों को चीरती हुई एक जीप आ रही है।जीप में चार आदमी बैठे हैं जिनके चेहरे कपड़ो से ढके हुए हैं।

एक यात्री चिल्लाया, “डाकू! डाकू आ गए हैं!” सारी बस में सनसनी फ़ैल गई। डाकू शब्द फुसफुसाहट में बदल गया। सेठ ने जोर से कहा, “बस और तेज करो।” एक गोली बस के अगले शीशे के ऊपर की ओर टकराकर हवा में उड़ गयी।ड्राईवर के हाथ से स्टीयरिंग छूट गया।उसने घबराकर गाडी रोक दी।चंद क्षणों में ही जीप बस के आगे थी। अब यात्री जीप में बैठे सभी लोगो को अच्छी तरह देख सकते थे। बस में मृत्यु सा सन्नाटा छा गया था। लोग एक दुसरे को शंकित दृष्टि से ऐसे देख रहे थे जैसे वे पूछ रहें हो की अब क्या होगा? जीप में बैठे डाकू उतर आये थे। ड्राईवर के अतिरिक्त पांच लोग और थे। एक के हाथ में तनी हुई बन्दूक थी। बन्दूकधारी ने गरजकर क़हा, “तुम लोग अपनी जान की खैर चाहते हो तो चुपचाप बैठे रहो।कोई भी हिले दुले नहीं!” यात्रियों की साँसे गले की गले में रह गयी।

बन्दूकधारी ने फिर अपना परिचय दिया, “मैं डाकू तेज सिंह हूँ। मैं तुम लोगो में से किसी को कुछ नहीं कहूँगा...मैं सिर्फ इस सेठ की बेटी को लेने आया हूँ।” शेष यात्रियों ने राहत का अनुभव किया लेकिन सेठ और उसकी नव परिणीता बेटी काँप उठी।लड़की मन्नी अपने बाप से चिपट गयी। तेज सिंह उन दिनों राजस्थान का कुख्यात डाकू था। उसने कई जाने ली थी और वह सच्चे डाकुओं की मान मर्यादा का परित्याग कर के नीच से नीच काम करने पर उतारू हो गया था। चूँकि दुसरे डाकू अपने पेशे की नैतिकता और उसके धर्म को लेकर चलते थे, इसलिए उन्होंने तेज सिंह को स्पष्ट कह दिया था कि वे अब उसके साथ नहीं रह सकते।लड़कियों की इज्ज़त से खेलना उनका धर्म नहीं है...पर वासना में लिप्त तेज सिंह ने उनकी कोई परवाह नहीं की। तेज सिंह में एक राक्षश की सारी प्रवृतियाँ उत्पन्न हो गयी थी।

तेज सिंह एक बार फिर सिंह की भाँती गरजा, “सेठ,अपनी बेटी मेरे हवाले राजी खुशी कर दे।” मन्नी ने अपने बाप को मजबूती से पकड़ इया। दोनों थर थर कांपने लगे।दोनों के चेहरे वर्षों से बीमार की तरह पीले पड़ गए थे। तेज सिंह की आँखों में रक्तिम डोरे उतर आये।वह उस खिडकी के पास आकर बोला, “सुना नहीं सेठ? लड़की को मेरे हवाले करो वरना मैं गोली मारता हूँ।” लड़की क्रंदन करती हुई अपने भयभीत बाप से और लिपट गयी। रूआंसे स्वर में बोली, “नहीं बापू, नहीं! मुझे इसके हवाले न करना...बापू...” तेज सिंह चिल्लाया, “बन्ना, जाकर लड़की को ले आ।” तेज सिंह का साथी अपने सरदार का आदेश पाकर बस में घुसा।तेज सिंह ने तत्काल एक हवाई फायर किया। सारे यात्री कलेजा पकड़ कर बैठ गये। उन्हें महसूस हुआ की गोली उनके सीने में दाग दी गयी है।सबकी आँखों में आशंकित म्रत्यु का भय और जड़ता उभर उठी।


बन्ना ने भीतर घुसकर बाप से लिपटी बेटी को छुड़ाना चाहा।बाप ने कांपते हाथों को जोड़कर प्रार्थना की, “माई बाप! मेरी बेटी को छोड़ दीजिए, में आपको सारे जेवर दे दूँगा।” परन्तु हवस में अंधे तेज सिंह को उस लड़की के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। जब बाप ने लड़की को नहीं छोड़ा, तब तेज सिंह ने बन्दूक के पिछले हिस्से से सेठ के सिर पर चोट की। आर्क्त्नादो के बीच लड़की घसीटकर बाहर निकाल ली गयी। सब यात्री निर्जीव से बैठे रहे।वे गूंगे बहरे बनकर अपनी सीटों से चिपक गए थे। लग रहा था कोई भी नहीं है इस बस में।
लड़की अब भी चीख चिल्ला रही थी। बन्ना उसे अपनी बाहों में ले चूका था। तभी मुकलावा करके लौट रहे राजपूत युवक की पत्नी थोडा सा घूंघट हटाकर बस में बैठे हुए लोगो से तेज स्वर में बोली, “आप सब चुल्लूभर पानी में डूब मरिये। आपके सामने एक लड़की को डाकू उठाकर ले जा रहे हैं, और आप हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। थू है आप सब पर।” अचानक इस तेज फर्कार बस में तनिक हलचल हुई। राजपूत अपनी पत्नी को प्रशनवाचक दृष्टि से देखने लगा। 

शायद वह सोच रहा हो कि इसे यकायक यह क्या हो गया है? या हमारी कौटुम्बिक परम्पराओ को तोड़कर क्यों हुंकार रही है? सबके सामने क्यों बोल रही है? राजपूत-पत्नी की आँखों से अंगारे बरस रहे थे। उसने थोडा सा घूंघट खीचकर अपने पति से पुनः कहा, “मैं आप से क्षमा मांगती हूँ,कुंवर सा! आप मुझे मेरी इस गलती की बाद में कोई सजा दे दीजियेया,किन्तु कुंवर सा, आज मुझे मालूम हो गया कि आपकी रजपूताई घास चरने चली गयी है। जो क्षत्रिय गौ,ब्राह्मण,अबला का रक्षक कहलाता था,उसी के सामने एक लड़की मुक्ति की भीख मांग रही है और आप पत्थर की तरह चुपचाप बैठे हैं?आपका खून पानी हो गया है? वर्ना क्या मजाल थी कि एक सच्चे राजपूत के होते हुए कोई चोर डाकू किसी के बाप से उसकी बेटी छीन कर ले जाए।” आपनी पति की तेजस्वी ललकार पर राजपूत खड़ा हो गया। उसके सिर पर लाल रंग का साफा था। उसकी बांकडली मूंछो पर उसका हाथ ताव देने चला गया। जोश में उसके नथूने फडकने लगे।फिर वह अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रखकर इतना ही बोल पाया “कुंवराणी !” कुंवराणी पूर्ववत स्वर से बोली, “आज सारे इतिहास को आग लगानी पड़ेगी। राजपूतों के शौर्य को मिटाना होगा। वरना एक राजपूत के होते हुए डाकू किसी लड़की को उठाकर ले जाए। छि: छि:!”

राजपूत चीख पडा। “क्षत्राणी,चुप रहो!”
“मैं चुप नहीं रहूंगी। मैं कहूँगी कि आप सब मर्दों को चूडियाँ पहन लेनी चाहिए।” उसने फटकारते हुए कहा।

सेठ की बेटी को जीप में डाल लिया था । वह क्रंदन करती हुई बेहोश हो गयी थी। खूंखार डाकू तेज सिंह बन्दूक  लेकर उसके समीप बैठ गया। 

उसने ड्राईवर को आज्ञा दी, “जीप रावाना करो।” पर जीप घर्र-घर्र करके रह गयी।
तेज सिंह ने बन्दूक के पिछले हिस्से से ड्राईवर को हल्का-सा धक्का देकर कहा, “जीप चलती क्यों नहीं?”

कुंवराणी ने सचमुच अपने हाथ की चूडियाँ खोलकर अपने पति की ओर बढ़ा दी, “लीजिए,इन्हें पहनकर आप बैठिये, और तलवार मुझे दीजिए।” राजपूत ने आवेश में कांपते हुए अपने स्वर पर काबू करके कहा, 

“कुंवराणी, मैं राजपूत तो वही हूँ पर समय बदल गया है।”
“समय कैसा बदल गया? राजपूत के लिए दूसरों की रक्षा करने का कोई समय नहीं होता।”
तेज सिंह पागलो की तरह चीखा, “जीप चलाओ!”

राजपूत ने किंचित व्यथित स्वर में कहा, “जरा होश में आकर बात करो। हम अभी गौना करके आये हैं। तुम्हारे हाथों की मेहंदी का रंग भी अभी नहीं उतरा है। घर पर ठुकराणी सा और ठाकुर सा हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे समय हमें मत ललकारो!” 

जीप ड्राईवर ने कहा, “सरदार, बैटरी बैठ गयी है।” तेज सिंह चीखा। “क्या बकते हो?”  “सरदार,सच कह रहा हूँ।” राजपूतानी ने हाथ जोड़कर विनीत स्वर में कहा, “आपके माता पिता जब सुनेंगे कि उनका बेटा एक लड़की की रक्षा नहीं कर पाया, तो जीते जी मर जायेंगे।”

“स्थिति  को देख लो। पल भर में तुम विधवा हो सकती ही !”

“विधवा?...कुंवर सा, विधवा तो मैं तब भी हो सकती हूँ जब आप खिलखिलाकर हँसे और हँसते ही परलोक सिधार जाएँ। पर यह मृत्यु कितनी महान और आदरमयी होगी ! यदि आपने उस अबला की रक्षा नहीं की, तो मैं समझूंगी कि मैं जीते जी विधवा हो गयी हूँ।”

राजपूत अब अपने आप को रोक नहीं सका। वह बावला हो गया। उसके नेत्र से अंगारे से दहकने लगे। वह तडपकर बोला। “तुम राजपूत के जौहर देखना चाहती हो?”

“मैं उसे अपने धर्म पथ पर चलते देखना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ, वह अपने अतीत को न भूले। वह अपने शौर्य और कर्तव्य को ना भूले।”

उसी समय एक कार आ गयी। तेज सिंह ने अपने ड्राईवर को तत्परता से कहा, “इस कार की बैटरी लगाओ।” उसने हाथ के इशारे से कार को रोक दिया। राजपूत ने अपने साथी की कटार  ली। भूखे बाज की तरह वह बस से उतरा। तेज सिंह बन्दूक लिए खड़ा था। राजपूत ने अपनी कटार फेंकी, कटार तेज सिंह की पीठ पर जा कर लगी। तेज सिंह ने बन्दूक तानी। राजपूत तलवार निकालकर उस पर झपटा। फायर! राजपूत का एक हाथ जख्मी हो गया। उसने उसकी कोई परवाह नहीं की, वह तेज सिंह पर टूट पडा। उसको इस तरह टूटते हुए देखकर राजपूत का साथी भी लपका। तेज सिंह दूसरा फायर करना चाहता ही था कि उसके साथी ने बन्दूक को पकड़ कर ऊपर कर दिया।

राजपूत ने तलवार के वार शुरू कर दिया। जिस डाकू के तलवार लग गयी, वह वहीँ ढेर हो गया। लेकिन तेज सिंह बलिष्ठ और साहसी था। उसने जोर के धक्के से राजपूत के साथी को गिरा दिया। बन्दूक को उस पर तानकर जैसे ही फायर करना चाहा, वैसे ही राजपूत ने तेज सिंह पर तलवार का वार कर दिया। तेज सिंह को एक बार धरती घूमती हुई लगी। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। लेकिन वह खूंखार भेडिया फिर से संभला। पूरे जोश के साथ फिर से वह राजपूत पर टूट पडा।

तभी राजपूतानी चिल्लाई, “आप सब बस में बैठे बैठे क्यों डर रहे हैं? जाइए न, उनकी मदद कीजिये!जाइए!”

उसकी ललकार पर एक जाट और ड्राईवर कूद पड़े। ड्राईवर के हाथ में एक लोहे की हथौड़ी थी। जाट ने आई हुई कार का हेंडिल खोल लिया। दोनों तेज सिंह पर टूट पड़े।
फायर!  चीखे।

लोगो ने देखा कि राजपूत एक ओर लुढक गया है। अब राजपूतानी अपने को रोक नहीं सकी। बेतहाशा अपने पति की ओर लपकी। पहली बात लोगो ने उस वीरता की तेजस्वी महान नारी के दर्शन किये। उसका चेहरा अद्भुत ओज से दीप्त था। आँखे बड़ी बड़ी और साहस की प्रतीक थी। राजपूतानी को उतरते देख बस की भीड़ डाकुओं पर टूट पड़ी। डाकू तेज सिंह भी बेहोश हो गया था। उसके साथी बस के कब्ज़े में थे।

राजपूत घायल अव्स्तहा में तड़प रहा था। वह अस्फुट स्वर में कह रहा था, “पानी!...पानी...!”
राजपूतानी ने आकुल स्वर में कहा, “पानी!”

तुरंत पानी लाया गया पानी की बुँदे जाते ही राजपूत ने आँखे खोली। उस समय तक सेठ भी सचेत होगया था। जब उसे मालूम हुआ कि उसकी बेटी की रक्षा के लिए एक वीर ने डाकुओं से संघर्ष किया है, तब वह राजपूत की और लपका। मन्नी को भी पानी छिडककर सचेत कर लिया गया था; वह भी राजपूत के पास आ गई थी।

राजपूत ने स्नेह विगलित स्वर से कहा, “कुंवराणी,वह लड़की कहाँ है?”

कुंवराणी ने सजल नयनों से देखा। तभी सेठ ने कहा, “यह रही मन्नी, मेरी बेटी, बिल्कुल ठीक है। आओ बेटी, इधर आओ। तुझे तेरा भैया पुकारता है।”

मन्नी राजपूत के पास आई। राजपूत का एक हाथ बिल्कुल घयाल हो चूका था। एक गोली सीने में लगी थी। लहूलुहान दूसरा हाथ भी था, किन्तु दूसरे हाथ से मन्नी को आशीष दिया। उसके सिर पर हाथ रखकर धीमे से बोला, “अच्छी है न बहन?”

मन्नी से कुछ बोला भी नहीं गया। वह फफक पड़ी। बाद में राजपूत ने राजपूतानी की ओर देखा। उससे वह टूटते हुए स्वर में बोला, “कुंवराणी! “मैंने तुम्हारी बात पूरी कर दी, वह लड़की अच्छी है...अच्छा कुंवराणी, भूल चूक माफ करना। मेरे माँ बाप की जिम्मेदारी अब तुम्हारी है। वे बहुत बूढ़े हो चुके हैं।”

कुंवराणी दहाड़ मार बैठी, “नहीं,नहीं! ऐसा नहीं हो सकता! इन्हें जल्दी से अस्पताल ले चलिए।”

राजपूत के चेहरे का ओज निस्तेज हो गया। वातावरण में मृत्यु की ख़ामोशी और सन्नाटा छाता गया। सारे यात्रियों की आँखे नम थी। समीप ही तेज सिंह अचेत पडा था। जो कार आई थी, उससे राजपूत को अस्पताल ले जाए और पुलिस को खबर करने की व्यवस्था की गयी। लेकिन राजपूत का रक्त बहुत बह चूका था। उसने एक बार फिर कुंवराणी की तरफ देखा। उसके हाथों से मेहंदी के फूल महक रहे थे। राजपूत अपनी आँखों से उन मेहँदी के फूलों को देखता रहा जो सुहाग के चिन्ह थे। राजपूतानी विपुल वेदना से तड़प रही थी। 

वह एक बार फिर चीखी, “इन्हें अस्पताल ले चलिए।”

लोगों ने राजपूत को उठाना चाहा। उसने हाथ से न उठाने का संकेत किया। उसका चेहरा स्याह हो गया। उसने एक बार फिर मेहँदी रचे कुंवराणी के हाथों को देखा। मुस्कुराया। उन्हें चूमा। कुंवराणी दर्द से काँप रही थी। उसने कांपते स्वर में कहा, “आप बिल्कुल ठीक हो जायेंगे, इन्हें जल्दी अस्पताल ले चलिए।” और राजपूत ने कुंवाराणी के हाथों को अपने सीने से लगा लिया। 

उसकी आँखे फट गयी। उसके हाथ फ़ैल गए। कुंवराणी और सारी उपस्तिथि सुबक पड़ी। कुंवराणी ने अपने हाथ उठाये। हाथों पर बने मेहंदी के फूल खून से विभत्स धरातल की तरह सपाट बन गए थे, जैसे हाथों पर कुछ था ही नहीं, सिर्फ रक्त ही रक्त !

- यादवेन्द्र शर्मा 'चंद्र' 

रविवार, जनवरी 06, 2013

पैसा और दोस्त

पच्चीस सालों बाद अचानक स्कूल के एक दोस्त का फोन नंबर मिला तो गोपाल खुशी के मारे उछल पड़ा। दोनों दोस्त 2 साल तक  साथ साथ पढे थे मगर बाद मे आगे की पढ़ाई के लिए  दोनों अलग अलग हो गए , मगर वर्षों तक दोनों के दरम्यान पत्रों का सिलसिला चलता रहा ।  पत्रों के माध्यम से दोनों दोस्तों की दोस्ती  लगातार चलती रही मगर अपनी अपनी मजबूरीयों के कारण कभी मिल न सके ।
 
 वक़्त गुजरता गया और   धीरे धीरे पत्रों का आदान प्रदान भी कम होंने लगा । हर महीने आने वाले पत्र अब छ:  महीने  और फिर एक साल के अंतराल से आने लगे । और फिर धीरे धीरे ये सिलसिला भी टूट गया। संचार क्रांति आई तो  दोस्तों ने एक दूसरे को संचार माध्यमों के द्वारा खोजना  शुरू  किया।  सोसल साइट्स से लेकर सर्च इंजनों मे तलाश चलती रही।  उनकी मेहनत रंग लाई और आज गोपाल को अपने दोस्त के बेटे का फोन नंबर मिला । अपने दोस्त के बेटे से बात करके बहुत खुश हुआ।  गोपाल ने  दोस्त के बेटे से अपने दोस्त सुदर्शन  के बारे मे पूछा और उससे  बात करवाने को कहा।  बेटे ने कहा अंकल ,"पापा शाम को मिलेंगे तब आप फोन करना"
 
गोपाल शाम होने का  इंतजार करने लगा और फिर आखिरकार पच्चीस साल पहले बिछुड़े दोस्त से  बात हुई तो  मारे खुशी के बरबस आँखों मे आँसू निकाल आए । दोनों  दोस्त देर तक बातें करते रहे , अपने स्कूल के दिनों से लेकर अब तक के सफर को दोनों ने एक दूसरे से शेयर किया।  फोन पर बातों का सिलसिला चल निकला और दोनों दोस्त घंटों बात करते  , एक दूसरे के परिवार के बारें मे पूछते , एक दूसरे के बच्चों से बातें करते ।
 
दो महीने  तक दोनों दोस्त आपस मे अपने स्कूल के दिनों के चर्चे करते और हँसते रहते । दोनों ने अपने बेटे बेटियों की शादी मे मिलने के वादे किए । 
 
 एक दिन बातों बातों मे सुदर्शन ने गोपाल से कहा ,"यार मेरे अकाउंट मे बीस  हज़ार रुपए ट्रान्सफर कर देना , मुझे कुछ जरूरत है "। 
 
"हाँ  ठीक  है , अपना अकाउंट डिटेल्स मुझे एसएमएस   कर देना ", गोपाल ने कहा। 
 
 कुछ दिन बाद सुदर्शन का फोन आया तो गोपाल ने रिसीव नहीं किया । कुछ अंतराल पे फिर सुदर्शन ने फोन किया मगर गोपाल ने काट दिया ।  
 
उसके बाद फिर किसी का फोन नहीं आया, और दोस्ती का सालों का सिलसिला सदा के लिए टूट गया ।
 
- "विक्रम"
 

सोमवार, दिसंबर 31, 2012

द्रोपदी

क्षितिज की
खोहों तक
पसरा सन्नाटा और
शाखाओं पर बैठे 
शोकाकुल पक्षी,
देकर  उलाहना
भौर की लालिमा को ,
को बता रहे हैं
बीती  रात
का वो स्याह सच ,
और दिखा रहे है
इशारों से
धरा का  वो
सलवटी हिस्सा
जिस पर मिलकर ,
दुशासनों ने
जी-भरकर ,
नोचा-खसोटा और
फेंक दिया जूठन सा
एक द्रोपदी को , मगर
सुनकर उसका 
कारुणिक क्रंदन
नहीं आया कहीं से
एक भी देवकीनंदन

-विक्रम

शनिवार, दिसंबर 15, 2012

तनहा सा मकान

सूनी-सी  पगडण्डी के
दुसरे  छोर पर ,
वो  तनहा  सा मकान
खड़ा है संजोये अतीत के
कुछ हसीन लम्हे,
निस्तेज, निस्तब्ध ,सुनसान !
उसकी बूढी दीवारों पे
हरी काली सिवार ,
लिपटी है लिए,
मिलन बिछोह के निशान .
टूटकर झूलता वो दरवाजा ,
किसी ने थामकर जिसे ,
गुजारे थे इन्तजार के
वो बोझिल लम्हे तमाम
-विक्रम 

नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

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