सोमवार, जनवरी 23, 2017

महाराव देवसिंह

यूं बून्दी राजवंश 'हाड़ा राजवंश' के नाम से जाना जाता है, मूलत: यह चौहान राजवंश है जिसने बून्दी प्राप्ति से पूर्व 200 वर्ष तक नाडोल पर राज किया। बाद में कुतुबुद्दीन एबक ने जब नाडोल पर आक्रमण किया तो चौहान राजवंश ने जालौर-सोनगिरि की ओर कूच किया वहाँ अपना राज स्थापित किया। इसी वंश में से माणिकराय द्वितीय जालोर पर अनवरत मुस्लिम आक्रमणों के कारण किसी सुरक्षित स्थान की तलाश में था और अंतत: इस दृष्टि से मेवाड़ का दक्षिण-पूर्वी भाग ठीक लगा और वह अपने परिवार व विश्वासपात्र सरदारों के साथ इधर आ गया। भैंसरोडगढ़ को अपना केन्द्र बनाया। उसने देखा कि इस भूभाग पर आदिवासी मीणा आदि जन-जातियों का बाहुल्य था और उनका प्रभाव भी था।

 माणिकराय को उन्हें अपने अधीन करने में अधिक जूझना नहीं पड़ा। वृद्धावस्था के कारण भैंसरोडगढ़ के बाहर उसने सीमा प्रसार का प्रयास नहीं किया लेकिन अन्तिम दिनों में पास ही के बम्बावदा पर अधिकार किया और उसे वहाँ की भौगोलिक स्थिति इतनी अच्छी लगी कि उसे ही अपनी राजधानी बना दी। माणिक राय के उत्तराधिकारी हुए जैतराव, अनंगराव, थुलसिंह और विजयपाल। इन सबके बारे में विस्तार से बहुत अधिक कुछ ज्ञात नहीं है लेकिन विजयपाल के पुत्र हरराय या हाडाराव के सम्बन्ध में अवश्य कुछ पढ़ने को मिलता है। जगदीशसिंह गहलोत के अनुसार इस हरराय से ही 'हाड़ाराव' शब्द का चलन इतिहास में हुआ। इसके उपरान्त हरराव के पुत्र बंगदेव (बाघा) ने बम्बावदा-भैंसरोडगढ़ के अतिरिक्त मांडलगढ, बिजौलिया, रतनगढ़ के परगनों पर कब्जा किया। अब चौहानों की इस हाड़ा शाखा के पास एक सम्मानजनक राज्य-सीमा हो गई थी, फिर भी बंगदेव के बड़े पुत्र देवसिंह की मंशा अब भी राज्य-प्रसार पर थी, चूंकि जो कुछ उसके पिता के पास था वह उसके परिजनों के लिए पर्यात नहीं था और न ही उसे सुरक्षा का अहसास था। इसलिए वह निरन्तर प्रयत्नशील था।

 इसी के बीच देवसिंह ने बुद्धिचातुर्यता का प्रदर्शन करते हुए मेवाड़ के सिसोदियों से सम्बन्ध जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ा और अपनी बेटी के लिए महाराणा लक्ष्मणसिंह के कुंवर अरिसिंह का हाथ मांगा। बस, अब क्या था ? बात बन गई। सिसोदियों को भी अपने इस दक्षिण पूर्वी भाग को सम्भालने के लिए एक विश्वासपात्र की आवश्यकता थी और देवसिंह के लिए मेवाड़ के सिसोदिया से सम्बन्ध होना बहुत बड़ी बात थी। कहते हैं कि अरिसिंह जब बारात लेकर देवसिंह के यहाँ गये और उसके हालात ठीक नहीं देखे तो लक्ष्मणसिंह ने कहा कि हम आपके साथ हैं, अपनी जागीर को और बढ़ा लो। देवसिंह तो यही चाहता था, वह तुरन्त भैंसरोडगढ़ के आगे मीणों के क्षेत्रों पर अधिकार करता हुआ निरन्तर बढ़ता गया और वह आज का बून्दी तक जो उस समय 'पथार' अंचल के नाम से विख्यात था, पहुँच गया। यहाँ मीणा शासक से लोहा लेना सरल नहीं था। जनश्रुति है कि बूंदी घाटी पर बूंदा मीणा का पोता जेता का देवसिंह के समय अधिकार था। वह एक ब्राह्मण कन्या से विवाह करना चाहता था। ब्राह्मण देवसिंह की शरण में गया, उसने ब्राह्मण को युक्ति सुझाई कि एक मंडप बनाओ, खूब शराब का प्रबन्ध करो। मंडप में बिठाकर इतना पिलाओ कि होश ही नहीं रहे। ऐसा ही किया गया, ब्राह्मण ने बारात बुलाई। मीणों की शराब से मेजबानी की। योजनानुसार देवसिंह आया और उसने शराब में मदमस्त मीणों को मारकर बूंदी पर अधिकार कर लिया।

 महाकवि सूर्यमल ने "वंश भास्कर' में एक अलग कथा लिखी है। उनके अनुसार उन दिनों बूंदी के आसपास मीणों का प्रभुत्व था और उनका सरदार जेता काफी शक्तिशाली था। उसकी दिली इच्छा थी कि वह राजपूतों से बेटी व्यवहार करे। इस निमित्त उसने अपने कामदार जसराज चौहान की पुत्रियों से अपने बेटों का विवाह करने का प्रस्ताव किया। जसराज इस पर सहमत नहीं था और पास ही के राज्य के देवसिंह से भेंट की और सारी बात बतलाई। देवसिंह तो ऐसा ही चाहता था, राज्य विस्तार का अच्छा अवसर जानकर जनश्रुति में बतलाई योजनानुसार ही जसराज को करने को कहा और जसराज ने उसके बताये अनुसार मंडप में आग लगवा दी। बहुत से मीणे आग में स्वाह हो गये और बच गये उन्हें देवसिंह ने मौत के घाट उतार दिया।

 बस, अब क्या था, मीणा सम्भल नहीं पाये और देवसिंह ने उन्हें बूंदी से खदेड़ दिया और स्वयं वहाँ का शासक बन गया। अब बूंदी   पर हाड़ा  चौहानों का  अधिकार हो  गया। देवसिंह बहुत नीतिज्ञ था।  उसे पता था कि   उस क्षेत्र  में  मीणाओं का बाहुल्य है, अत: उसने   उनके क ई   सरदारों  को अपने  विश्वास में  लिया और उन्हें राजकार्यों   में  लगाया।  इसका परिणाम  अच्छा रहा। कुछ ही समय में पूरे क्षेत्र में देवसिंह का प्रभाव जम गया और आम जन   में भी  उसे भरपूर सहयोग दिया। अब  राजधानी    बनानी थी।    देवसिंह  ने इस   कार्य को भी पूरा   किया और संवत  1398, आषाढ़ वदि नवमी, मंगलवार को बूंदी नगर की स्थापना की। इस समय देवसिंह के पिता बंगदेव जीवित थे और भैंसरोडगढ़ में  निवास करते थे, लेकिन राजधानी के रूप में बम्बावदा थी। पिता की मृत्यु के बाद देवसिंह बम्बावदा अपने पुत्र हरिदेव को  देकर स्वयं बून्दी रहने लगा।

 
यूं बून्दी पर हाड़ाओं के अधिकार को लेकर कई और जनश्रुतियां है पर देवसिंह के कौशल और प्रतिभा को लेकर इतिहासकारों में कोई मतभेद नहीं है। फिर भी बून्दी के इतिहास को लेकर कई तथ्यों का प्रकाश में आना शेष है। चूंकि देवसिंह से पूर्व उसके दादा विजयपाल (विजिपाल) का इस क्षेत्र में आगमन हो चुका था। इनसे सम्बन्धित एक शिलालेख वि.सं. 1354 का बून्दी से दो कि.मी. दूर स्थित केदारेश्वर महादेव के मन्दिर में लगा हुआ है जो ऐतिहासिक तिथियों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इस एक शिलालेख से ही यह बात धुंध में है कि अगर विजयपाल और उससे पूर्व किन-किन चौहान शासकों ने इस क्षेत्र में विजय प्राप्त करने की चेष्टा की थी?

 खैर, जो भी हो आज जो इतिहास हमारे पास है उसके अनुसार चौहान वंश का हाड़ा शाखा का शुभारम्भ भले ही बम्बावदा से हुआ हो पर उसे ख्याति बून्दी और फिर कोटा से मिली जिसका पूरा श्रेय देवसिंह को जाता है। देवसिंह ने मात्र बून्दी फतह नहीं की बल्कि दासों से पाटण, गोड़ों से गैणोली, लखेरी और दहिया जसकरणा से करवाड के परगने लेकर राज्य का विस्तार भी किया। यही नहीं अपने राज्य की सुरक्षा बनी रहे इस दृष्टि से मेवाड़ से भी देवसिंह पूर्ण आत्मिक सम्बन्ध बनाये रखे। देवसिंह को यूं बहुत कम समय मिला मगर जो भी समय मिला उसमें उसने अमरयूणा से पूर्व का और गंगेश्वरी देवी का मंदिर और एक बावड़ी अपने पिता की स्मृति में बनवाई। यहीं देवसिंह ने अपने संघर्षशील जीवन की अन्तिम सास ली।

 (लेखक – तेजसिंह तरुण “राजस्थान के सूरमा” )
 

कान्हड़देव

जालौर के वीर शासक कान्हड़देव का नाम आते ही लेखकों की कलमें ठहर जाती है तो पढ़ने वालों के कलेजे सिंहर उठते हैं। कारण यह नहीं कि उसने अपने से कई गुना शक्तिशाली दुश्मन को मात दी और अंत में बलिदान दिया। यह तो राजस्थान की उस समय की पहचान थी। कलम के ठहरने और कलेजों के कांपने का कारण यह था कि कान्हड़देव जैसे साहसी एवं पराक्रमी शासक का अंत ऐसा क्यों हुआ ? क्यों नहीं अन्य शासक उसके साथ हुए, क्यों नहीं सोचा कि कान्हड़देव की पराजय के बाद अन्य शासकों का क्या होगा। शायद डॉ. के.एस. लाल ने अपने इतिहास ग्रंथ 'खलजी वंश का इतिहास' में सही लिखा है कि'पराधीनता से घृणा करने वाले राजपूतों के पास शौर्य था, किंतु एकता की भावना नहीं थी। कुछेक ने प्रबल प्रतिरोध किया, किंतु उनमें से कोई भी अकेला दिल्ली के सुल्तान के सम्मुख नगण्य था। यदि दो या तीन राजपूत राजा भी सुल्तान के विरुद्ध एक हो जाते तो वे उसे पराजित करने में सफल होते।'
 
डॉ. के.एस. लाल की  उक्त  टिप्पणी  बहुत  ही   सटीक है।   कान्हड़देव  की   वंश  परम्परा के   सम्बन्ध में ही उदयपुर के ख्यातिनाम लेखक एवं इतिहासवेता डॉ. शक्तिकुमार शर्मा 'शकुन्त' ने लिखा है   कि- 'चाहमान   (चौहान) के वंशजों ने यायव्य कोण से आने वाले विदेशियों के आक्रमणों का न केवल तीव्र प्रतिरोध किया अपितु 300  वर्षों तक उनको जमने नहीं दिया। फिर चाहे वह मुहम्मद गजनी हो, गौरी हो  अथवा अलाउद्दीन खिलजी हो, चौहानों के   प्रधान पुरुषों ने उन्हें चुनौती दी, उनके अत्याचारों के रथ को रोके रखा तथा अन्त में आत्मबलिदान देकर भी देश और धर्म की रक्षा अन्तिम क्षण तक करते रहे।
 
बस, यही सब  कुछ  हुआ था  इस  चौहान वं श के  यशस्वी  वीर प्रधान पुरुष  जालौर के राजा कान्हड़देव के साथ भी। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद चौहानों की एक शाखा रणथंभौर   चली गई  तो दूसरी शाखा नाडौल और नाडौल से एक शाखा जालौर में स्थापित हो गई। कीर्तिपाल से प्रारम्भ हुई यह शाखा समरसिंह,  उदयसिंह, चा चकदेव, सामन्तसिंह से होती हुई कान्हड़देव तक पहुँची। किशोरावस्था से अपने पिता का हाथ बांटने के निमित्त कान्हड़देव शासन र्यों में रुचि लेना शुरूकर दिया था। संवत 1355 में दिली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात जाने के लिए  मारवाड़ का रास्ता चुना। कान्हड़देव को इस समय तक अलाउद्दीन के मनसूबे का पता लग चुका था। वह अपने इस अभिमान के तहत  सोमनाथ के  मन्दिर को  तोड़ना चाहता था। उसने कान्हड़देव को खिलअत से सुशोभित करने का लालच भी दिया मगर वह किसी भी तरह तैयार नहीं हुआ और सुल्तान के पत्र के जवाब में पत्र लिखकर साफ-साफ लिख भेजा-'तुम्हारी सेना अपने प्रयाण के रास्ते में आग लगा देती है, उसके साथ विष देने वाले व्यक्ति होते हैं, वह महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करती है, ब्राह्मणों का दमन करती है और गायों का वध करती है, यह सब कुछ हमारे धर्म के अनुकूल नहीं है, अत: हम तुम्हें यह मार्ग नहीं दे सकते हैं।
 
कान्हड़देव के इस उत्तर से अलाउद्दीन खिलजी का क्रोधित होना स्वाभाविक था। उसने समूचे मारवाड़ से निपटने का मन बना लिया। गुजरात अभियान तो उसने और रास्ते से पूरा कर लिया लेकिन वह कान्हड़देव से निपटने की तैयारी में जुट गया और अपने सेनापति उलुग खां को गुजरात से वापसी पर जालौर पर आक्रमण का आदेश दिया।उलुगखां अपने सुल्तान के आदेशानुसार मारवाड़ की और बढ़ा ओर सर्वप्रथम सकराणा दुर्ग पर आक्रमण किया। सकाराणा उस समय कान्हड़देव के प्रधान जेता के जिम्मे था। द्वार बन्द था। मुस्लिम सेनाओं ने दुर्ग के बाहर जमकर लूटपाट मचाई, लेकिन यह अधिक देर नहीं चली और जेता ने दुर्ग से बाहर निकलकर ऐसा हमला बोला जो उलुगखां की कल्पना से बाहर था, उसके पैर उखड़ गये और भाग खड़ा हुआ। जेता मुस्लिम सेना से सोमनाथ के मन्दिर से लाई पांच मूर्तियां प्राप्त करने में सफल रहा। इतिहास में अब तक इस युद्ध पर अधिक प्रकाश नहीं डाला गया है लेकिन गुजरात लूटनेवाली सुल्तान की सेना को पराजित करना आसान काम नहीं हो सकता था, अत: निश्चित ही जालौर विजय से पूर्व यह युद्ध कम नहीं रहा होगा। स्मरण रहे कि इस युद्ध में सुल्तान का भतीजा मलिक एजुद्दीन और नुसरत खां के भाई के मरने का भी उल्लेख है।
 
इस पराजय के बाद 1308 ई. में. अलाउद्दीन ने कान्हड़देव को अपने विश्वस्त सेनानायक व  कुशल राजनीतिज्ञ के द्वारा दरबार में बुलाया, बातों में आ गया और वह चला  भी गया। जब पूरा  दरबार लगा था,  अलाउद्दीन ने अपने आपको दूसरा सिकन्दर घोषित करते हुए कहा कि भारत में कोई भी हिन्दू या राजपूत राजा  नहीं है जो उसके सामने  किंचित् भी टिक सके।  कान्हड़देव को यह बात खटक गई, उसका स्वाभिमान जग उठा, उसने तलवार निकाल ली  और बोल पड़ा-"आप ऐसा न  कहें, मैं हूँ,  यदि आपको जीत नहीं सका तो युद्ध करके मर तो सकता हूँ, राजपूत अपनी इस मृत्यु को मंगल-मृत्यु मानता है।' यह कह  कान्हड़देव अलाउद्दीन खिलजी का दरबार छोड़कर वहाँ से चल पड़ा और जालौर आ गया। सुल्तान ने कान्हड़देव के इस व्यवहार को बहुत ही बुरा माना और 1311 ई. में तुरन्त दंड देने के लिए जालौर की ओर अपनी सेना भेजी। डॉ. के.एस. लाल का कहना है कि राजपूतों ने शाही पक्षों को अनेक मुठभेड़ों में पराजित किया और उन्हें अनेकबार पीछे धकेल दिया। उन्होंने यह भी माना कि जालौर का युद्ध भयानक था और संभवत: दीर्घकालीन भी। गुजराती महाकाव्य 'कान्हड़दे प्रबन्ध' के अनुसार संघर्ष कुछ वर्षों तक चला और शाही सेनाओं को अनेक बार मुँह की खानी पड़ी। इन अपमान जनक पराजयों के समाचारों ने सुल्तान को उतेजित कर दिया और उसने अनुभवी मलिक कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना भेजी। सुल्तान की सेना का जालौर से पूर्व ही सिवाणा के सामंत सीतलदेव ने सामना किया। दोनों के बीच ऐसा युद्ध हुआ जिसकी कलपना संभवत: सुल्तानी सेना नायकों के मस्तिष्क में थी भी नहीं। यही कारण था कि एक बार पुन: पराजय झेलनी पड़ी और वहाँ से दूर तक भागना पड़ा। सुल्तान को ज्यों ही पुन: पराजय का समाचार मिला, कहते हैं कि वह स्वयं इस बार पूरी शक्ति के साथ जालौर पर चढ़ आया।
 
अब तक सुल्तान को यह आभास अच्छी तरह हो गया था कि युद्ध में रणबांकुरे राजपूतों को पराजित करना कठिन ही नहीं असम्भव है। परिणाम स्वरूप अब सुल्तान की ओर से कूटनीतिक दांव-पेच शुरू हो गये और दुर्ग के ही एक प्रमुख भापला नामक व्यक्ति को प्रचूर धन का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। भापला ने दुर्ग के द्वार खोल दिये और मुस्लिम सेना ने दुर्ग में प्रवेश कर लिया। दुर्ग में तैयारियां पूर्ण थी। ज्यों ही सुल्तान की सेना का प्रवेश हुआ, अन्दर राजपूतों महिलाएं जौहर करने के लिए आगे बढ़ी तो पुरुष भूखे शेरों की तहर टूट पड़े। घमासान छिड़ गया। संख्या में राजपूत कम अवश्य थे लेकिन युद्ध को देखकर ऐसा लग रहा था मानो हजारों की सेना आपस में भिड़ रही हों। यहाँ यदि यह कहा जाए तो अतिश्योति नहीं होगी कि मुट्ठीभर राजपूतों ने पुन: यह बता दिया कि वे मर सकते हैं लेकिन हारते नहीं। देखते ही देखते जालौर के दुर्ग में मरघट की शान्ति पसर गई। 18 वर्ष का संघर्ष समाप्त हो गया। कान्हड़देव का क्या हुआ, इतिहास के स्रोत मौन है लेकिन जालौर का पतन हो गया और साथ ही उस शौर्य गाथा को भी विराम मिल गया जिसका प्रारम्भ चौहान वंशीय वीर-पुत्र कान्हड़देव ने किया था।
 
अलाउद्दीन को जालौर-विजय की खुशी अवश्य थी, लेकिन उसने यह समझने में किंचित् भी भूल नहीं की कि राजपूताने को जीतना कठिन है। यही कारण है कि इस विजय के उपरांत उसने यहाँ के राजपूत शासकों के संग मिलकर चलने में ही अपनी भलाई समझी और फिर कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया। स्वयं डॉ. के.एस. लाल ने अपनी पुस्तक 'खलजी वंश का इतिहास' के पृष्ठ 114 पर लिखा है.राजपूताना पर पूर्ण आधिपत्य असंभव था और वहाँ अलाउद्दीन की सफलता संदिग्ध थी।" अपनी इस बात को स्पष्ट करते हुए डॉ. लाल लिखते हैं कि-'राजपूताना में सुल्तान की विजय स्वल्पकालीन रही, देशप्रेम और सम्मान के लिए मर मिटनेवाले राजपूतों ने कभी भी अलाउद्दीन के प्रांतपतियों के सम्मुख समर्पण नहीं किया। यदि उनकी पूर्ण पराजय हो जाती तो वे अच्छी तरह जानते थे कि किसी प्रकार अपमानकारी आक्रमण से स्वयं को और अपने परिवार को मुक्त करना चाहिए, जैसे ही आक्रमण का ज्वार उतर जाता वे अपने प्रदेशों पर पुन: अपना अधिकार जमा लेते। परिणाम यह रहा कि राजपूताना पर अलाउद्दीन का अधिकार सदैव संदिग्ध ही रहा। रणथम्भौर, चित्तौड़ उसके जीवनकाल में ही अधिपत्य से बाहर हो गये। जालौर भी विजय के शीघ्र बाद ही स्वतन्त्र हो गया। कारण स्पष्ट था, यहाँ के जन्मजात योद्धाओं की इस वीर भूमि की एक न एक रियासत दिल्ली सल्तनत की शक्ति का विरोध हमेशा करती रही, चाहे बाद में विश्व का सर्वशक्तिमान सम्राट अकबर ही क्यों न हो, प्रताप ने उसे भी ललकारा था और अनवरत संघर्ष किया था।
 (लेखक तेजसिंह तरुण राजस्थान के सूरमा” )

गुरुवार, जनवरी 19, 2017

रावत चूंडा

स्वामिभक्ति, शौर्य, पराक्रम, कर्तव्य परायणता और न्याय की प्रतिमूर्ति के रूप में चूंडा को जाना जाता है। मेवाड़ में चूंडा और उसके वंशजों की जो ख्याति आज तक है उसका कारण उनकी मातृभूमि के प्रति निष्ठा व ललक का होना है। बात-बात में एक पुत्र द्वारा अपने पिता के मनोभावों को पढ़कर अपने लिए आये सगाई का प्रस्ताव पिता के हक में त्याग देना और फिर राजगद्दी के हक को भी अत्यन्त सहजता से छोड़ देना केवल और केवल चूंडा जैसे बिरले का ही काम था। यही वे कारण थे कि वह सभी के सम्मान का पात्र बन गया। इस सम्बन्ध में राजस्थान के अनेक कलम धर्मियों व इतिहासकारों ने खूब लिखा हैं।
 

सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने चूडा का यह सम्पूर्ण वृतांत इस प्रकार प्रस्तुत किया है-'महाराणा (लाखा) की वृद्धावस्था में राठौड़ रणमल की बहिन हंसाबाई के सम्बन्ध का नारियल महाराणा के कुंवर चूंडा के लिए आया, उस समय महाराणा ने हंसी में कहा कि 'जवानों के लिए नारियल आते हैं, हम जैसे बूढ़ों के लिए कौन भेजे ?" यह बात सुनते ही पितृभक्त चूडा के मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि मेरे पिता के मन में विवाह करने की इच्छा है, इसी से प्रेरित होकर उसने राव रणमल से कहलाया कि आप अपनी बहिन का विवाह महाराणा से करदे। उसने इस बात को अस्वीकार करते हुए कहा कि महाराणा के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण आप राज्य के उत्तराधिकारी है। अत: आपसे विवाह करने पर यदि मेरी बहिन के पुत्र उत्पन्न हुआ तो वह मेवाड़ का स्वामी बनेगा, परन्तु महाराणा के साथ विवाह करने से मेरे भांजे को चाकरी में निर्वाह करना पड़ेगा। इस पर चूंडा ने कहा कि यदि आपकी बहिन के पुत्र हुआ तो वह मेवाड़ का स्वामी बनेगा और मैं उसका सेवक बनकर रहूँगा। इसके उत्तर में रणमल ने कहा-मेवाड़ जैसे राज्य का अधिकार कौन छोड़ सकता है? यह तो कहने की बात है। तो चूंडा ने एकलिंग जी की शपथ खाकर कहा कि-मैं इस बात के लिए इकरार लिख देता हूँ, आप निश्चिंत रहिए। फिर उसने अपने पिता के विरुद्ध आग्रह करके उनको नई शादी हेतु बाध्य किया और इस आज्ञा का प्रतिज्ञा पत्र लिख दिया कि यदि इस विवाह से पुत्र उत्पन्न हुआ तो वह राज्य का स्वामी होगा महाराणा ने हंसाबाई से विवाह किया जिससे मोकल का जन्म हुआ।"
 

चूंडा द्वारा सत्ता त्याग के बारे में राजस्थानी गीतों, बड़वों व राणीमंगों की पोथियों में कुछ अलग-अलग रूप में मिलता है। सभी में चूंडा की प्रशंसा की गई, करें भी क्यों नहीं ऐसा उदाहरण और है कहाँ ? तभी तो जय माँ राठौड़ कल्याण संस्थान द्वारा प्रकाशित 'राजस्थान के सूरमा' में श्रीमती मायासिंह कुनाड़ी ने एक कवि की इन सुन्दर पंक्तियों के माध्यम से कहा कि चवरी चढ़ लाखो फिरे, फिरे बीनणी लार। चूंडा री कीरत फिरै, सात समुंदरा पार। सत्ता-त्याग के अतिरिक्त चूडा ने आगे भी वह किया, जो बहुत कम लोग ही कर सकते हैं। हंसाबाई और लाखा के इस विवाह के तेरह माह बाद राजकुमार मोकल का जन्म हुआ। लेकिन कुछ समय पश्चात ही महाराणा लाखा का स्वर्गवास हो गया। वीर विनोद के अनुसार पति के निधन के बाद सती होने को उद्धत हुई और हंसाबाई ने चूंडा को बुलाकर पूछा कि तुमने मेरे पुत्र के लिए कौनसा परगना देने की सोची है? इस पर चूंडा ने कहा-'हे माता, आपका पुत्र मेवाड़ का मालिक है और मैं उसका सेवक हूँ, आपको अभी सती नहीं होना चाहिए, आप तो राजमाता बनकर रहें।
 
चूंडा ने मोकल को चित्तौड़ के सिंहासन पर आरुढ़ कर सर्वप्रथम नज़र दिखलाई की रस्म निभाई  व मोकल के लिए सत्ता का परित्याग कर चूंडा ने अपने वचनों का निर्वाहन करते हुए मेवाड़ का राज्य प्रबन्ध-कार्य करने लगा। इसके प्रशासन के अधीन मेवाड़ में सुव्यवस्थित शासन चलने लगा। वीर विनोद (पृष्ठ310, भाग-1) में श्यामलदास चूंडा की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं-चूंडा बहुत लायक और बहादुर सरदार था, वह हर तरह से न्याय कर अपनी प्रजा को खुशहाल रखता था। उसके अच्छे प्रशासन-प्रबन्धन के कारण राज्य और प्रजा दोनों सुदृढ़ हुए।
 
मेवाड़-त्याग-कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति अच्छा कार्य करता है तो भी कुछ स्वार्थों से बंधे ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें उसके अच्छे कार्य नहीं भाते हैं। ऐसा ही कुछ चूंडा के साथ भी हुआ। उसके रहते सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन कतिपय सरदारों को ठीक नहीं लग रहा था। वे अपने को सुतावस्था में पा रहे थे। वे अपनी बहन के रहते मेवाड़ पर हावी होना चाहते थे, लेकिन जब ऐसा हुआ तो रणमल आदि ने हंसाबाई के कान भरने शुरू कर दिये। अंतत: हंसाबाई के मन में यह बिठाने में सफल हो गये कि अभी तो सब कुछ ठीक चल रहा है लेकिन चूंडा अवसर मिलते ही मोकल को पद्च्युत कर स्वयं मेवाड़ की राजगद्दी पर आसीन हो जायेगा। अपने बाल-पुत्र के मोह में हंसाबाई को राठौड़ सरदारों की बात ठीक लगी और एक दिन चूंडा को बुलाकर कहा-'या तो तुम मेवाड़ छोड दो या जहाँ तुम चाहो वहाँ मैं अपने पुत्र सहित चली जाऊँ।"
 

चूंडा को सब कुछ समझने में देर नहीं लगी और उसने तत्काल राज्य प्रबन्ध और मोकल की रक्षा का दायित्व अपने भाई राघवदेव को सौंपकर मेवाड़ राज्य की सीमा त्याग कर मांडू के सुल्तान होशंगशाह के पास चला गया।  सुल्तान चूंडा से बहुत पहले से प्रभावित तो था ही, उसने चूंडा का यथोचित सम्मान किया और 42 लाख का मंदसौर का पट्टा जागीर में दिया तथा रावत की उपाधि प्रदान की। इसके पश्चात् रणमल ने षड़यंत्रपूर्वक चूंडा के भाई राघवदेव की हत्या करवा दी और मेवाड़ पर अपना वर्चस्व बढ़ाने के निमित्त प्रमुख पदों पर राठौड़ सरदारों को बिठा दिया। इसी बीच रणमल ने मेवाड़ी सेना के सहयोग से अपने मंडोर पर विजय प्राप्त करली। अब वह अधिकतर मंडोर ही रहने लगा जिसके कारण मेवाड़ में भी यहाँ के चाचा व मेरा नामक पासवानिया पुत्रों का जोर बढ़ गया और मौका देखकर एक दिन मोकल की हत्या कर दी।


राव रणमल की जब महाराणा मोकल की हत्या की सूचना मिली तो उसने तत्काल चित्तौड़ आकर मोकल के पुत्र कुंभा को गद्दी पर बिठाया और शासन प्रबन्ध पुन: अपने हाथों में ले लिया। रणमल को लगा कि मेवाड़ की आन्तरिक स्थिति ठीक नहीं है तो वह मेवाड़-मारवाड़ को एक करने के षड़यन्त्र में लग गया। और वह मोकल के उत्तराधिकारी कुंभा को रास्ते से हटाने में लग गया। एकदिन नशे में रणमल ने अपने मन की बात अपनी प्रेमिका भारमली से कह दी तो भारमली जो प्रेमिका तो रणमल की थी लेकिन थी मेवाड़ की माटी में जन्मी मेवाड़ की बेटी। उससे रहा नहीं गया और उसने वह बात राजमाता को बतादी।
 
 इस सम्बन्ध में 'सलूम्बर का इतिहास' की विद्वान लेखिका विमला भण्डारी ने पृष्ठ 29 पर लिखा है कि राजमाता के नाम पर मतभेद है। ग्रंथों में कहीं राजमाता सौभाग्यदेवी व कहीं राजदादी हसाबाई का उल्लेख मिलता है।  जो भी हो लेकिन इस प्रसंग में भारमली की भूमिका अहं थी जिसके कारण मेवाड़ रणमल के हाथों में जाने से बच गया। विमला भंडारी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि राजमाता को इस संकट की घड़ी में चूंडा की याद ही आई और राणा कुंभा की सहमती पर एक पत्र लिखा, उसमें लिखा था-"तुम्हारे पिता का राज्य जाता है, अब यह कागज पढ़ते ही आओ और तुम ही इस राज्य को सम्भालो, नहीं तो कहोगे कि कैसी कुघराने की आई जिसने सीसोदिया का राज्य गवा दिया।'
 

चित्तौड़ के समाचार पाते ही चूंडा अपने कर्तव्य-निर्वहन के लिए मेवाड़ की और कूच कर गया। रणमल को जब पता लगा तो उसने बहुत विरोध किया लेकन स्थितियां बदल चुकी थी। पूर्व योजना के अनुसार एक दिन भारमली ने रणमल को जमकर शराब पिलाई और जब वह पूर्ण नशे में डूब गया तो नरबद और उसके साथियों ने रणमल का काम तमाम कर दिया।
 

रणमल की मृत्यु का समाचार तेजी से चित्तौड़ के किले पर और नीचे तलहटी में ज्योंही पहुँचा रणमल का पुत्र जोधा अपने साथियों के साथ वहाँ से भाग निकला। चूंडा ने उसका पीछा मंडोर तक किया लेकिन अंतत: वह जान बचाने में सफल रहा मगर मंडोर उसके हाथ से निकल गया और मेवाड़ के हाथों में आ गया।

चूंडा ने रणमल के सफाये के बाद मेवाड़ की सीमाओं का खूब प्रसार किया। कई छोटे-बड़े युद्धों में सफलता प्राप्त की। बाद में मंडोर पर भी जोधा का अधिकार तब हुआ जब राजदादी हंसाबाई के कहने पर कुंभा की मौन स्वीकृति हुई। ऐसे में चूंडा शांत रहा। चूंडा ने महाराणा के कार्यों में दखल न देने की सौगंध जो ली थी।
 

रावत चूंडा ने राज्य के अपने हक को त्यागकर  अपने वचन का निर्वहन जिस तरह किया वह न केवल राजस्थान के इतिहास में बल्कि सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय है, जो सदैव अविस्मरणीय रहेगा। राजत्याग और फिर वचनानुसार अपने छोटे भाई को राजगद्दी पर आसीन करना तथा उसके राज्य की रक्षा हेतु निरन्तर लगे रहने को देखकर तत्कालीन एवं बाद के कई कलमधर्मियों द्वारा चूंडा के लिए जितना लिखा गया वो और किसी के लिए फिर नहीं लिखा गया। चूंडा पर लिखी पंक्तियां तो आज भी जन-मानस के मुँह पर सहज ही आ जाती है कि
लाखा स्वर्ग सिधारता, मोकल बांधी पाग।
चित्रकूट रक्षा कारण, चूंडा बांधी खाग।
 

पुत्र की ऐसी पितृभक्ति देख महाराणा लाखा ने यह नियम पारित किया कि मेवाड़ राज्य की ओर से जो पट्टे-परवाने जारी हो उस पर भाले था अंकन चूंडा और उसके पाटवी वंशज ही करेंगे। कहने का तात्पर्य है कि चूंडा ने राज्याधिकार भले ही छोड़ दिया था किंतु मेवाड़ उसके त्याग और तत्पश्चात् राज्य की सुरक्षा हेतु उसके द्वारा किये गये प्रयासों को नहीं भूल सका। चूंडा का सुयश आज भी चिर अमर है और आगे भी वह अमर ही रहेगा।
 

 (लेखक तेजसिंह तरुण राजस्थान के सूरमा” ) 
 
 

बुधवार, जनवरी 18, 2017

महाराणा कुंभा

महाराणा मोकल के असामयिक निधन के बाद ज्येष्ठ पुत्र कुंभ कर्ण, जो मेवाड़ के इतिहास में कुंभा के नाम से प्रसिद्ध है, सन् 1433 ई. में राज्य सिंहासन पर बैठा।

शौर्य और पराक्रम की दृष्टि से यदि हम भारतीय इतिहास का अध्ययन करें तो   कुंभा अद्वितीय था।   सच तो यह है कि कुंभा बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। प्रसिद्ध इतिहासकार रामनारायण सन् 1915 में प्रकाशित 'मेवाड़ राज्य का इतिहास' में लिखते हैं-‘‘यह महाराणा   अपने समय   के अनुपम   शूरवीर, साहसी, युद्धप्रिय और   नीतिनिपूर्ण थे,   पैंतीस वर्ष के शासनकाल में बराबर  बड़े-बड़े    राजा-महाराजाओं  और प्रबल व   प्रतापी दिल्ली, मालवा,   गुजरात के बादशाहों से लड़ाइयां लड़ी और अपने खड़गबल से क्षात्र धर्म   की उज्ज्वल   कीर्ति के उत्कर्ष को   सिद्ध किया।' ऐसा ही उल्लेख सुविख्यात इतिहासवेत्ता गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने 'उदयपुर राज्य का इतिहास' में लिखा है-'वह (कुम्भा) शरीर का हृष्ट-पुष्ट और राजनीति था युद्ध विद्या में बड़ा कुशल था। अपनी वीरता से उसने दिल्ली और गुजरात  के सुल्तानों का कितना-एक प्रदेश अपने अधीन किया, जिस पर उन्होंने उसे छत्र भेंट   कर 'हिन्दू सुरताण'   का खिताब दिया अर्थात् उसको हिन्दू बादशाह स्वीकार किया था। उसने कई बार मांडू और गुजरात के सुलतानों को हराया, नागोर को विजय किया। यही नहीं गुजरात और मालवे से संयुक्त सैन्य बल को पराजित   किया और राजपूताने का अधिकांश एवं मांडू, गुजरात और दिल्ली राज्यों के कुछ अंश छीनकर मेवाड़ को महाराज्य बना दिया।

निश्चित ही कुंभा ने मेवाड़ राज्य की सीमाओं का जितना विस्तार किया  उसना मेवाड़ का और कोई शासक नहीं कर पाया। यूं कुंभा के पश्चात् महाराणा सांगा ने भी राजस्थान और राजस्थान के बाहर के कई शासकों को अपने अधीन किया था लेकिन सीमा-प्रसार की दृष्टि से कुंभा सांगा से आगे ही था। उसकी विजयों का स्पष्ट उल्लेख राणकपुर के शिलालेख में इस प्रकार है-'अपने कुलरूपी कानन (वन) के सिंह राणा कुंभकर्ण ने सारंगपुर, नागपुर (नागौर), गागरण, (गागासेन), नराणक (नराणा), अजयमेरु (अजमेर), मंडोर (मारवाड़), मंडलकर (मांडलगढ़) बून्दी, खाट (राजस्थान में खाटू नाम के तीन स्थान है, दो (बड़ी खाटू और एक छोटी खाटू) जोधपुर राज्य और एक जयपुर राज्य में है। रणकपुर के लेख का सम्बन्ध इतिहासकार ओझा के अनुसार संभवतः जयपुर राज्य के खाटूनगर से है।), चाटसू आदि सुदृढ़ और विषम किलों को लीला मात्र से विजय किया, अपने भुजबल से अनेक उत्तम हाथियों को प्राप्त किया और मलेच्छ महिपाल (सुलतान) रूपी सपों का गरूड़ के समान दलन किया था। प्रचण्ड भुजदण्ड से जीते हुए अनेक राजा उसके चरणों में सिर झुकाते थे। प्रबल पराक्रम के साथ दिल्ली (दिल्ली), गूजरत्रा (गुजरात) के राज्यों की भूमि पर आक्रमण करने के कारण वहाँ के सुलतानों ने छत्र भेंटकर उसे 'हिन्दू सुरत्राण' का विरुद (पद) प्रदान किया था। वह सवर्णसत्र (दान-यज्ञ) का आगार (निवास स्थान), छ: शाखों में कहे हुए धर्म का आधार, चतुरगिणी सेना रूपी नदियों के लिए समुद्र था और धर्म एवं कीर्ति के साथ प्रजा का पालन करने और सत्य आदि गुणों के साथ कर्म करने में रामचन्द्र और युधिष्ठिर का अनुकरण करता था और सब राजाओं का सार्वभौम (सम्राट) था।'

उपर्युक्त शिलालेख के आधार पर किसी भी इतिहासकार के लिए कुंभा के व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना आसान रहा और इसीलिए सभी ने एक मत से इतना तो स्वीकार किया है कि कुंभा बहुमुखी प्रतिभा का घनी था। वह जहाँ एक शक्तिपुत्र था वहीं वह माँ सरस्वती का भक्ति-पुत्र भी था। कवियों ने उसे अभिनय भरताचार्य की संज्ञा से सम्बोधित यूं ही नहीं किया; अनेकानेक लेख-आलेख कवियों के कथन के प्रमाण हैं जिनमें स्पष्ट उल्लेख है कि कुंभा कुशल वीणावादक, संगीत और नाट्यशास्त्र के ज्ञाता थे। कुंभा के इसी बहुमुखी व्यक्तित्व के कारण प्राप्त शिलालेखों व दान-पत्रों में उसे राजाधिराज, रायराण, राणेराय, दानपुरुष, शौर्यगुरु, अभिनव भरताचार्य व हिन्दू सुरत्राण आदि नामों से विभूषित किया गया है।

]कर्नल टॉड ने भी कुंभा के बहुमुखी व्यक्तित्व को इस प्रकार दर्शाया है कि-'कुंभा एक महान् यौद्धा, शासक और महान् विद्वान था। उसके एक हाथ में शास्त्र तो दूसरे हाथ में शस्त्र था। वर्तमान के इतिहास मर्मज्ञ डॉ. ऑकारसिंह राठौड़ केलवा (मेवाड़) ने तो यहाँ तक लिखा है कि-भारतीय इतिहास में इतनी बहुमुखी प्रतिभावाला व्यक्तित्व भगवान कृष्ण के पश्चात् अभी तक नहीं हुआ है।

कुंभा के समय के प्राप्त शिलालेखों व फारसी प्रशस्तियां उत्त विद्वानों के कथन को प्रमाणित करने के लिए पर्यात है। यदि हम उसके शौर्य-वृतांत को ही लें तो यह कहने में किसी भी विद्वान को किंचित् भी हिचक नहीं होगी कि कुंभा अपने समय का सर्वशक्तिमान शासक था। उसके पास विशाल सेना थी। इसी कारण वह 'टोडरमल की उपाधि से अलंकृत था। टोडरमल संभवतः 'त्रिदुहमल' शब्द से बना प्रतीत होता है जिसका अर्थ होता है-तीन प्रकार की सेनाओं का अधिपति। कीर्तिस्तम्भ के लेख में इसे स्पष्टत: वर्णित किया है कि कुंभा ने हयेश (अश्वपति) हस्तीश (गजपति) और नरेश (पैदल सेना का अधिपति) होने से 'तोडरमल का अलंकरण धारण किया था। फारसी तवारीख में भी कुंभा की विशाल सेना का उल्लेख बहुतायत से मिलता है। कुंभा चूंकि वीर एवं साहसी प्रकृति का था, संभवतः गुजरात, मालवा, दिल्ली व राजस्थान का उत्तर-पूर्वी भाग. में मुस्लिम शासकों के बढ़ते कदमों के कारण संगीत एवं साहित्य की इस प्रतिभा को विशाल सेना रखना आवश्यक था। उसने अपने शासनकाल में किसी को भी मेवाड़ की ओर आँख दिखाने अवसर नहीं दिया, बल्कि जिसने भी यह दु:साहस किया उसे कुंभा ने कहीं का नहीं रखा। अपनी इसी नीति के तहत कुंभा ने मेवाड़ की सुरक्षा के लिए 32 दुर्गों का निर्माण करवाया। चित्तौड़गढ़ स्थित कीर्ति स्तम्भ उसके साहस, शौर्य एवं शक्ति की अमर गाथा कहता हुआ। आज हमारे सम्मुख है। अगर यह कहा जाए कि वीर प्रसविनी मेवाड़ को विश्व इतिहास में जो सम्मान आज प्राप्त है उसमें कुंभा के यशस्वी व्यक्तित्व की मुख्य देन है। बाद में चूंडा, सांगा, प्रताप व अन्यान्य वीर-सपूतों ने और ख्याति देकर विश्व विख्यात किया।

महाराणा का शिल्पप्रेम-'उदयपुर राज्य का इतिहास' नामक ग्रंथ में गौरीशंकर  हीराचन्द  ओझा ने कुंभा के शिल्पप्रेम के दर्शाते हुए स्पष्ट लिखा है कि-'महाराणा कुंभा शिल्पशास्त्र   का ज्ञाता  होने के  अतिरिक्त शिल्प कार्यों  का बड़ा प्रेमी था। 'वर्तमान के बहुचर्चित साहित्यकार एवं शिल्पशास्त्रीय ग्रंथों के विद्वान लेखक डॉ. श्री कृष्ण जुगनू ने कुंभाकालीन विख्यात शिल्पियों के नामों का  अपनी  पुस्तक 'कला निधि' में  जिस तरह उलेख किया  इससे  स्पष्ट है कि कुंभा की इस विद्या में विशेष रुचि थी। डॉ जुगनू ओझा के मत का  समर्थन करते हुए  लिखते है-'कुंभा स्वयं  स्थापत्यशास्त्र का  ज्ञाता था। जय और अपराजित के मतानुसार उसने स्थापत्य शास्त्र  को लिखा व  शिलोत्कीर्ण करवाकर   चित्तौड़गढ़ के कीर्तिस्तम्भ के निकट स्थापित  करवाया था।” कुंभा  कालीन मण्डन, जैता (जयता) व  उसका पुत्र  बलराम, चौथा, पउमी, तथा क्षेत्राक, नाथा , भीम,  वेला, टीला,  पोमा,  गोरा,  ढोला, देवा,  गोविन्द, वच्छा,  भान, छाया, दामोदर  व हरराज  आदि के नाम उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने मेवाड़ में एक से बढ़कर एक स्थापत्य कला के कई  श्रेष्ठ नमूने गढ़े जो  आज भी मेवाड़ के गौरव में चार चांद लगा रहे हैं।

चित्तौड़गढ़ पर कई भवनों के साथ तलहटी से दुर्ग तक रथ मार्ग व कुछ-कुछ दूरी पर कई पोलों (द्वारा) का निर्माण करवाया। जगत-विख्यात कीर्तिस्तम्भ, कुंभस्वामी व आदिवराह मंदिर, रामकुंड सहित कई बावड़ियों का निर्माण करवाया। कुंभलगढ़ व उसमें स्थित द्वार, कुंभस्वामी का मंदिर, जलाशय व बाग कुंभा के निर्माण कार्यों के अप्रतिम उदाहरण हैं। अकेला दुर्ग ही आज के शिल्पशास्त्रियों को और युद्ध शास्त्रियों के सोचने के लिए काफी है। एकलिंगजी का मन्दिर जिसे हम आज देख रहे हैं, यह कुंभा द्वारा किये पुनरुद्वार का ही प्रतिफल है। उपरोक्त कार्यों तक ही कुंभा के स्थापत्य प्रेम के दर्शन नहीं होते बल्कि जावर, अचलगढ़, बसन्तपुर आदि स्थानों पर भी एक से बढ़कर एक शिल्पकला की कई श्रेष्ठ कृतियां देखने में आती है। यदि कुंभाकालीन शिल्प पर दृष्टि डाले तो कोई भी व्यक्ति दाँतों तले अंगुली दबाये बिना नहीं रह सकता है। रणकपुर का मंदिर ही पर्यात है किसी को चकित करने के लिए, कला एवं विज्ञान (शिल्प) का अनुपम उदाहरण है। यह कभी भी यदि दुनिया के आश्चर्यों में आजाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। स्थापत्य की ऐसी ही कई कृतियां जावर के आसपास बिखरी पड़ी हैं जिनका निर्माण कुंभा की बहन रमाबाई के हाथों अथवा उनके समकालीन जैन श्रेष्ठियों द्वारा हुआ।

पुन: संक्षेप में यहाँ हम यही कह सकते हैं कि कुंभा स्वयं तो शिल्प -विज्ञान का ज्ञाता था ही, साथ ही उनके समय के उनके अपने लोगों ने भी उनके इस ज्ञान व प्रेम से प्रेरित होकर मेवाड़ को जो अनुपम उपहार दिये, स्तुत्य हैं।

कुंभा का साहित्य व संगीत प्रेम-महाराणा कुंभा के साहित्यिक एवं संगीत प्रेम के सम्बन्ध में इतिहासवेता राम वलम सोमानी ने बहुत ही सटीक लिखा है कि-'दुर्भाग्य की बात है कि इस महान् राजा के सम्बन्ध में इतना अध्ययन नहीं किया गया है जितना किया जाना चाहिए था। इसका सबसे उल्लेखनीय ग्रंथ संगीतराज है। संगीतराज के अतिरिक्त गीतगोविन्द की टीका, चंडीशत की टीका,


सूड़प्रबन्ध, कामराजरतिसार आदि प्रसिद्ध हैं। ओझा, हरविलास शारदा, कृष्णामा चारी आदि इतिहासकारों ने अपने ग्रंथों में संगीतरत्नाकर पर टीका लिखने का उल्लेख किया है। इसी तरह संगीतक्रमदीपिका, गीतगोविन्द, वाद्यप्रबन्ध, नाटकग्रंथ व शिल्पशास्त्रीय ग्रंथ लिखने के सम्बन्ध में समकालीन प्रशस्तियों में वर्णन मिलता है।

उत्त ग्रंथों की रचना स्वयं कुंभा ने की लेकिन इससे भी अधिक महत्व की बात यह है इसके राज्यश्रय में साहित्य की विभिन्न विधाओं में जो सृजन हुआ वो उसके साहित्यक प्रेम को दर्शाता है। यूं कुंभा स्वयं संस्कृत का विद्वान था। उसके आश्रित विद्वानो में अत्रि, महेश, एकनाथ कन्हव्यास के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति की रचना अत्रि एवं उसके पुत्र महेश ने की और इसी उपलक्ष्य महाराणा कुंभा ने इसे सोने की डंडीवाले 2 चंवर और एक छत्र दिया। निश्चित ही यह कुंभा का साहित्य एवं रचनाकारों के प्रति अनुराग दर्शाता है।

कुंभा के काल में जैन साहित्य की अपूर्व रचना हुई। संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत और राजस्थानी भाषाओं का विकास हुआ। सकलकीर्ति, भुवनकीर्ति, सोमसुन्दर, मेरुसुन्दर आदि रचनाकारों के नाम विशेष हैं जिनकी रचनाएँ आज साहित्य की विशेष धरोहर है। दीर्घकाल तक महाराणा कुंभा युद्ध में व्यस्त रहते हुए भी उनकी साहित्यिक रुचि के कारण इतना विशाल साहित्य पल्लवित हो सका था। समुचित शोध के अभाव के कारण इस बहुमुखी प्रतिभा के धनी कुंभा का पूरा मूल्यांकन नहीं हो सका, यह निश्चित ही विडम्बना है।

 (लेखक – तेजसिंह तरुण “राजस्थान के सूरमा” )

शुक्रवार, जनवरी 13, 2017

मेड़तिया राठौड़ ( भाग -4 )

---भाग 3 का शेष...


11. बलुन्दा-जिला पाली, गाँव साढ़ेसात, कुरब हाथ, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार,
     रेख  19375 रु.। चाँदावत मेड़तिया।

12. मोंडा-जिला नागौर, गाँव 181/2 कुरब हाथ दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार 
      रेख 34803   रु.। रूघनाथसिंघोत मेड़तिया। 
13. बोरावड़-जिला नागौर,इकेवड़ी  ताजीमगांव4, रेख 13000 रु.। केशोदासोत मेड़तिया।
14. पाँचवा-जिला नागौर,गांव 18  कुरब हाथ,दोवड़ी ताजीमरेख26000 रु.। गोयन्ददासोत  मेड़तिया।
15. पाँचोता (पानाशक्तिसिंह) -जिला नागौर, इकेवड़ी ताजीमकुरब हाथ,रेख 13385 रु.  गांव 
      पौने  सात। गोयन्द दासोत मेड़तिया।
16. पाँचोत(पाना उम्मेदसिंह) -जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ, गांव सवा नौ,
       रेख     22375 रु.।    गोयन्ददासोत मेड़तिया।
17. चाँदारूण-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ,गांव6, रेख 9850 रु.। माधोदासोत   मेड़तिया।
18. बरकाना-जिला पाली, कुरब हाथ जागीर इकेवड़ी रेख 10000  रु. गांव 91 गोपीनाथोत मेड़तिया।

19 सरगोठ-जिला नागौर, इकेवड़ी ताजीम, कुरब हाथ, गांव सवा आठ, रेख 22500  गोयन्ददासोत
     मेड़तिया।

20. कुड़ल-जिला पाली, इकेवड़ी ताजीम, कुरब हाथ, गांव 6, रेख 16500 रु.।
    चांदावत   मेड़तिया।

21. मनाणा-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, गांव 8, रेख26700 रु.
    कुरब  हाथ। मेड़तिया।

22. सबलपुर-जिला नागौर, इकेवड़ी ताजीम, तीसरे दर्जे के अदालती अधिकार, गांव 5, रेख 18250,
      कुरब  हाथ। केशोदासोत मेड़तिया।
23. बेरी-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ,गांव 10/12, रेख 29244 रु.मेड़तिया।
24. दोबड़ी बड़ी-जिला नागौर। महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर पर अधिकार के बाद श्री
      जगराम  माधवदासीत को यह जागीरप्रदान की। जोधपुर महाराजा हनुवन्तसिंह  ने  ताजीम व
     सोना प्रदान कर ठाकुर सवाईसिंह जी दोबड़ी को  सम्मानित किया। माधोदासोत  मेड़तिया
      ठिकाना है।
25. रायण-जिला नागौर,रेख 14000 रु.कुरब  हाथ,इकेवड़ी ताजीम । रायमलोत मेड़तिया।

26.सेवरिया-जिला पाली, कुरब बांह, गाँव 4, ताजीम इकेवड़ी ताजीम,रेख 10875 रु.   
    चाँदावत  मेड़तिया।
27. सुमेल-जिला नागौर, गाँव 7, कुरब बांह, ताजीम इकेवड़ी,रेख 14000 रु.ईशरदासोत     मेड़तिया।
 
28. मंगलाणा-जिला नागौर, गाँव 7, कुरब  बांह, ताजीम इकेवड़ी, रेख 12625.50 रु.  गोयन्ददासोत। 28. बाजोली-जिला नागौर,गाँव2, कुरब  बांह,इकेवड़ी ताजीम,रेख8225 रु.। माधोदासोत     मेड़तिया।
 
29. बिदीयाद-जिला नागौर, गाँव 2, कुरब बांह, इकेवड़ी ताजीम,रेख9000 रु.। सुरताणोत  मेडतिया ।
31. रोहंडी-जिला नागौर, गाँव 3, इकेवड़ी, ताजीम कुरब  बांह,रेख 10500 रु.। सुरतांणोत    मेड़तिया।

32. सरनावड़ा-जिला नागौर, गाँव पौने चार, कुरब बांह, इकेवड़ी ताजीम, रेख 10600  गोयन्ददासीत
      मेड़तिया।
33. नवो-जिला नागौर, गाँव साढे तीन, कुरब हाथ, इकेवड़ी  ताजीम,रेख 18012 रु.। 34.
       धनकोली-जिला नागौर, कुरब बांह, दोवड़ी ताजीम, रेख 7000 रु.। गोयन्ददासोत मेड़तिया।
35. तोसीना-जिला नागौर, गाँव 3, कुरब हाथ, ताजीम इकेवड़ी,रेख 9500 रु.। सुरताणोत   मेड़तिया।
36. केराप-जिला नागौर, गाँव 3, ताजीम इकेवड़ी,रेख 8500 रु.। 
37. भदलिया-जिला नागौर, गाँव 4, कुरब बांह, ताजीम  इकेवड़ी, रेख 13000 रु.।
       गोयन्ददासीत मेड़तिया।
38. बांसा-जिला नागौर, कुरब बांह, इकेवड़ी ताजीम, गाँव5, रेख 12512 रु.।
39. नाराणपुरा-जिला नागौर, गाँव 8, कुरब हाथ, ताजीम  इकेवड़ी, रेख 15925 रु.। गोयन्ददासीत
      मेड़तिया।
40. जौलिया-जिला नागौर, गाँव साढ़े तीन, कुरब बांह, इकेवड़ी  ताजीम, रेख 7317  गोयन्ददासोत
       मेड़तिया।
41. अभयपुरा-जिला जोधपुर, गाँव पोने सात, कुरब हाथ, ताजीम  दोवड़ी,रेख 9889 रु.।
42. मीठड़ी-जिला नागौर, गाँव सवा ग्यारह, मीठड़ी ठिकाने की कुल रेख 33400  रु. में से 15000 रु.
     की रेख व ताजीम जब्त कर ली गई थी।
43. खोड़-जिला पाली, गाँव 5, कुरब हाथ, ताजीम इकेवड़ी।
44. फालना-जिला पाली, गाँव साढ़े आठ, कुरत हाथ, इकेवड़ी जागीर, रेख 11600 रु. गोपीनाथोत
     मेड़तिया।
45. बोरुन्दा-जिला पाली, कुरब बांह, इकेवड़ी ताजीम, रेख6250 रु.।
46. टांगला-जिला नागौर, कुरब बांह, ताजीम इकेवड़ी,रेख 6500  रु.।
इनके  अलावा मारवाड़ में  मेड़तियों के अनेकों  ताजीमी ठिकाने थे। ठिकानों में प्रमुख लूणवा व नीबोद  माधोदासोत के मेड़ास, वीजाथल ,  चीखरणीयावड़ो,  ईडवा, सुरियास,  कीतलसर, का नीबी खास, द्वारकादासोत  का  बछवारी, सनदासोतों  के खोड़कास, तामड़ोली,  वा,तिलागेस  आदि ठिकाने थे।   मेड़तिया राठौड़ों का मेवाड़ में प्रसिद्ध ठिकाना था बदनौर। बदनौर-यह ठिकाना वीरवर  जयमल मेड़तिया को जागीर में  राणा  उदयसिंह ने प्रदान किया था। जो उनकी मृत्यु के  बाद उनके  पुत्र  मुकुन्ददास एवं  उनके  वंशजों के अधिकार में रहा। अत: ये अपने को टीकाई भी मानते हैं।  मेवाड़ राज्य का यह प्रथम श्रेणी का ठिकाना था।  इसकी गिनती मेवाड़ के प्रमुख सौलह उमरावों में थी। इसे हासिल लगान वसूली एवं दीवानी व फौजदारी के उच्च अधिकार प्राप्त थे।
अजमेर मारवाड़ के ठिकाने
मसूदा-जगमाल के अधिकार  में मेड़ता था। उसके पुत्र हनुवन्त सिंह को बादशाह अकबर ने ई.1558 में मसूदा ठिकाना मनसब में  दिया। उन्होंने मसूदा पंवारों से विजय किया (अजमेर पृ.289) उनके  छोटे भाई लालसिंह ने बागसुरी बसाई। उनके बड़े भाई कल्लाजी के वंश में जयपुर में  बूढ़ा देवल का ठिकाना था। अजमेरा के ठिकानों में मसूदा आमद में सबसे बड़ा ठिकाना था जिसे ज्यूडिशियल अधिकार प्राप्त थे। मसूदा ताजीमी इस्तमुरार ठिकाना था। मसूदा  के राव विजयसिंह बड़े प्रगतिशील शासक थे। इनको विशेष योग्यता के कारण मेयो कॉलेज से सोर्ड ओफ ओनर दिया गया था।
राव विजय सिंह के पुत्र राव नारायण सिंह सन् 1952 के प्रथम चुनाव में अजमेर असेम्बली के सदस्य चुने गये। आप राजस्थान विधान सभा के लम्बे असें तक सदस्य रहे हैं। 15 साल तक राजस्थान मन्त्रीमंडल के विभिन्न पदों पर रहे तथा राजस्थान विधान सभा के उपसभापति भी रहे हैं। राव साहब भारतीय दर्शन के विद्वान और हिन्दी के श्रेष्ठ लेखक हैं। आपकी वेदान्त पर कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं।
रानी उर्मिला देवी जी मसूदा राजस्थान समाज कल्याण  बोर्ड की अध्यक्षा रह चुकी हैं। आपके बड़े पुत्र इन्द्रजीतसिंह दो बार विदेशों के  राजदूत रह चुके हैं।
बाघसुरी-अजमेर मेरवाड़ा  का मेड़तियों का दूसरा ताजीमी इस्तमुरार ठिकाना था। मसूदा के हनुवन्तसिंह के छोटे भाई लालसिंह ने जंगल में बाघ और सूअर को लड़ते देखा। सूअर ने बाघ को जिस स्थान पर पछाड़ा था उसी जगह गड़ें बनवाकर  गाँव बसाया जिसका नाम बाघसुरी रखा ।
जनरल नाथूसिंह-डुंगरपुर  राज्य के ठिकाना गुमानपुरा के निवासी ले. जनरल नाथूसिंह हुतियागी हैं। स्वभाव  सेनाके हासमेंआने सशक या वृद्धि की है।
भगवानपुरा के ले. जनरल  कल्याणसिंह जालिमसिंहोत मेड़तिया एक सुयोग्य जनरल थे। यह समाज सेवा में भी बड़ी रुचि लेते थे। दमोई के मेड़तिया गोविन्दसिंह  ब्रिटिश सेना में अधिकारी थे।  प्रथम विश्व युद्ध में साहसिक कार्य के लिए उन्हें विक्टोरिया क्रास सैनिक सेवा का सर्वोच्च पदक मिला था।
मेड़तिया राठौड़ जहाँ  मेवाड़ की गौरव गरिमा और स्वतन्त्रता के लिए चित्तौड़ के तृतीय साके में,मारे गए थे उसी प्रकार महाराजा  रामसिंह जोधपुर और उनके चाचा राजाधिराज  बख्तसिंह के  पारस्परिक गृहकलह, मरहठों की मारवाड़ की मेड़ता की लड़ाई आदि में भी काम आये थे। मेड़तियों  की अकेली रघुनाथसिंहोत प्रशाखा के ही वीरमारवाड़ के शासकों की ओर से बहुसंख्या में रण में जूझ मरे हैं।

महाराजा रामसिंह के पक्ष में  मीठड़ी के ठाकुर  सगतसिंहकुचामन के ठाकुर जालिमसिंह, ठाकुर देवीसिंह पांचौता  का ठाकुर, कुंवर चैनसिंह सुद्रासरण वालों का पूर्वज, कुंवर नाहरसिंह इन्द्रसिंघोत मारोठ, बैरीशाल इन्द्रसिंहोत, देवीसिंह शंभुसिंहोत, दुर्जनसिंह  शंभूसिंहोत पांचोता,सरगोढ़, आदि रघुनाथसिंह की संतति के कई ठिकानों के ठाकुर और कुंवर मारे गए थे।    मेड़तिया राठौड़ों ने देश  व धर्म के लिए जब भी आव्हान किया गया अपना सर्वस्व न्यौछावर  किया है। आजादी  के  बाद  इन्होंने  लोकतांत्रिक  प्रवृतियों   में भाग  लेते  हुए देश व राज्य की सेवा  की है। राव नारायणसिंह जी मसूदा व रानी साहिबा उर्मिला देवी के  अलावा श्री गोपाल  सिंह गोठड़ा , श्री भैरुसिंह बरकाना, श्री कर्नल गोपाल सिंह बदनोर ,श्री विजय सिंह  राजपुरा, श्री उम्मेद सिंह खोजाबास (दो बार) व श्री विजेंद्र सिंह बदनोर  (दो बार) राजस्थान विधान सभा के सदस्य रहे हैं, तथा प्रांत की शासकीय प्रक्रिया मे जिम्मेदार भागीदारी का निर्वाह किया है।


 




[          भाग-1            भाग - 2              भाग - 3             भाग -4      ]
लेखक - देवी सिंह मंडावा
(क्षत्रिय राजवंशों का इतिहास)


 

नुकीले शब्द

कम्युनल-सेकुलर,  सहिष्णुता-असहिष्णुता  जैसे शब्द बार बार इस्तेमाल से  घिस-घिसकर  नुकीले ओर पैने हो गए हैं ,  उन्हे शब्दकोशों से खींचकर  किसी...

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